एनआरसी: असम के हैदर अली की कहानी जिन्होंने लड़ी ख़ुद को भारतीय साबित करने की लड़ाई

हैदर अली

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए

"मैंने विदेशी ट्रिब्यूनल को अपने भारतीय होने के सभी दस्तावेज़ दिखाए थे लेकिन फिर भी उन लोगों ने मुझे विदेशी नागरिक घोषित कर दिया. आप सोचिए किसी भी व्यक्ति से अगर उसकी नागरिकता ही छीन ली जाए तो उस पर क्या गुज़रेगी? हम ग़रीब लोग है. यहां ग़ाज़ियाबाद की झुग्गियों में रहकर अपने बच्चों को किसी तरह पाल-पोस रहें है. कोर्ट कचहरी के लिए जो पैसे ख़र्च हुए हैं, उस उधार को चुकाने में सालों लग जाएंगे. जीवन में इतना आघात पहले कभी नहीं लगा था."

35 साल के हैदर अली जब ये बातें कहते हैं तो उनकी आवाज़ में नागरिकता खोने का डर आज भी आसानी से महसूस किया जा सकता है.

दरअसल, असम के बारपेटा की एक फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल (एफ़टी) ने 30 जनवरी, 2019 को हैदर अली को विदेशी नागरिक घोषित कर दिया था. लेकिन, क़रीब दो साल अदालतों के चक्कर काटने के बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में उन्हें भारतीय नागरिक बताया है.

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने हैदर अली के मामले पर सुनवाई के बाद एफ़टी के आदेश को रद्द करते हुए उनके नाम के आगे लगाए गए विदेशी टैग को हटाने का निर्देश दिया है.

जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह और जस्टिस मनीष चौधरी की अदालत ने 30 मार्च 2021 को अपने इस फ़ैसले में कहा, "हमारा दृढ़ मत है कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में सक्षम हैं कि उनके पिता हरमुज अली थे और उनके दादा नादू मिया थे. दस्तावेज़ों में स्पष्ट रूप से याचिकाकर्ता का अपने पिता हरमुज अली और दादा नादू मिया के साथ संबंध बताया गया है और इसके अनुसार, हमें यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि याचिकाकर्ता एक भारतीय नागरिक हैं न कि कोई विदेशी है."

दरअसल, असम में फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की वजह से लोगों में दहशत फैली हुई है.

प्रदेश में 19 लाख से अधिक लोगों को एनआरसी यानी नागरिकता सूची से बाहर कर दिया गया है. लिहाज़ा अब इन लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए इसी ट्रिब्यूनल में ही जाना होगा.

इस ट्रिब्यूनल के कामकाज पर काफ़ी पहले से सवाल उठ रहे हैं और हैदर अली के इस मामले से राज्य में एक बार फिर नागरिकता साबित करने का यह मुद्दा गंभीर हो गया है.

विदेशी ट्रिब्यूनल, गोलपारा

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हैदर के साथ क्या हुआ

हैदर अली बारपेटा ज़िले में सरथेबारी थाना क्षेत्र के कवाईमारी ब्लॉक नंबर 12 गांव के निवासी हैं. साल 2002 में 10वीं की परीक्षा पास करने के बाद हैदर ने घर की माली हालत के कारण पढ़ाई छोड़ दी थी और फिर कुछ दिनों तक यहीं रहकर मज़दूरी की. बाद में वे अपनी आर्थिक स्थिति को देखते हुए काम करने दिल्ली चले गए. इस गांव में उनके पिता, मां और उनसे छोटे चार भाई रहते हैं. उनकी एक बहन भी है.

चूंकि हैदर के नाम पर फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामला (एफ़टी नं-1444 (III)/2013) चल रहा था इसलिए उनके पूरे परिवार का नाम फ़िलहाल एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है.

तक़रीबन 14 साल से ग़ाज़ियाबाद के सिहानी गेट विश्वास नगर में बनी झुग्गियों में रह रहे हैदर ट्रिब्यूनल में हुई परेशानी पर कहते हैं, "यह साल 2018 की बात है. एक दिन मेरे छोटे भाई ने फ़ोन पर मुझे बताया कि फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से नोटिस आया है. मुझे काफ़ी चिंता हुई और मैं तुरंत गांव चला गया.''

''जब एफ़टी कोर्ट में हाज़िर हुआ तो तमाम दस्तावेज़ होने के बाद भी वे 1971 के पहले की मतदाता सूचियों में हमारे चाचा, फूफा सभी रिश्तेदारों के साथ संबंध स्थापित करने की बात कहने लगे. जबकि मैंने अपने पिता और दादा के साथ संबंध से जुड़े दस्तावेज़ के तमाम लिंकेज विदेशी ट्रिब्यूनल को दिए थे फिर भी उन लोगों ने मुझे विदेशी नागरिक घोषित कर दिया."

सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

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24 मार्च, 1971 से पहले भारत में बसे या निवास करने वाले लोगों को अपने वंशावली स्थापित करनी होती है. साल 1985 में हुए असम समझौते में विदेशियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने की यह कट-ऑफ़ तारीख़ तय की गई थी.

हैदर बताते हैं, "एफ़टी के इस फ़ैसले से मेरा पूरा परिवार दहशत में आ गया था. हम भारतीय नागरिक होते हुए भी अपनी नागरिकता को लेकर समस्याओं से घिर गए थे. काम-धंधा सबकुछ छोड़कर कोर्ट में मामले को ले जाने के लिए पैसों का इंतज़ाम करना पड़ा.''

''मेरे साथ स्कूल में पढ़ाई करने वाले कई दोस्त सीआरपीएफ़-बीएसएफ़ में नौकरी करते हैं, वे भी इस बात को सुनकर हैरान रह गए क्योंकि एफ़टी ने मुझे बांग्लादेशी बना दिया था. मैंने तय कर लिया था कि मैं अपनी नागरिकता साबित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाऊँगा क्योंकि यह हमारे पूरे परिवार की ज़िंदगी की बात थी."

असम

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जब गए निचली अदालत

एफ़टी के फ़ैसले के बाद जब हैदर अली अपने मामले को निचली अदालत ले गए वहां भी उन्हें विदेशी ही घोषित किया गया.

वो कहते हैं, "नागरिकता से जुड़े मामलों में कई बार वकील की ग़लती के कारण भी फ़ैसले निराश करते हैं. निचली आदालत में मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था. क्योंकि मेरे वकील ने वंशावली से संबंधित दस्तावेज़ों को सही तरीक़े से अदालत के सामने रखा ही नहीं. फिर हम गुवाहाटी हाई कोर्ट गए."

"मैं निचली अदालत के फ़ैसले के बाद बहुत डर गया था. उस समय मेरी मां बहुत बीमार थीं लेकिन मैं उनसे मिलने गांव नहीं गया. मुझे इस बात का डर था कि मुझे डिटेंशन कैंप में डाल देंगे. अगर ऐसा हुआ होता तो हम पूरी तरह बर्बाद हो जाते क्योंकि कोर्ट कचहरी के ख़र्च के लिए मुझे ही पैसों का बंदोबस्त करना था. घर की हालत भी ठीक नहीं है इसलिए मैं जो पैसा कमाता था उसमें से कुछ पैसा गांव में माता-पिता को भेज देता था. यह मुसीबत ऐसे समय में आई थी कि कई बार लगता था कि इससे अच्छा तो मौत आ जाती."

हैदर सवालिया अंदाज़ में कहते हैं," मुझे कई बार संदेह होता है कि एफ़टी में मेरे साथ ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं. ज्यादातर मुसलमान लोगों के साथ ही ऐसी परेशानी हो रही है. मुझे विदेशी घोषित कर दिया गया जबकि मतदाता सूची में मेरा नाम है. मैंने इस बार (2021) भी वोट दिया है. मैं सरूखेत्री विधानसभा का वोटर हूं."

डिटेंशन सेंटर

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जाँच में समस्या

गुवाहाटी हाई कोर्ट में हैदर अली का मामला लड़ने वाले वकील एम.जे. क़ादिर भी भारतीय नागरिकों को हो रही इस परेशानी के पीछे उचित और निष्पक्ष जाँच नहीं करवाने को कारण मानते हैं.

क़ादिर कहते हैं, "फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से जुड़े जो भी मामले हाई कोर्ट में आते हैं, अधिकतर मामलों में जाँच की ही समस्या देखने मिलती है. दरअसल देखा गया है कि ट्रिब्यूनल को मामले भेजने से पहले उनकी सही तरह से जाँच नहीं की जाती. जबकि 2013 में मोसलेम मंडल मामले के बाद हाई कोर्ट ने दिशानिर्देश तैयार करते हुए कहा था कि ट्रिब्यूनल में मामले भेजने से पहले उसकी उचित और निष्पक्ष जाँच की जानी चाहिए लेकिन दिशानिर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है. हैदर अली के मामले में भी ऐसा ही हुआ है."

अगर अदालत द्वारा बनाए गए दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है तो इसके लिए किसकी जवाबदेही है?

इस सवाल का जवाब देते हुए वकील क़ादिर कहते हैं, "इसके लिए जवाबदेही ट्रिब्यूनल की है. क्योंकि फ़ॉरेनर्स ऑर्डर 1964 में साफ़ लिखा हुआ है कि किस संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति को विदेशी घोषित किया गया है और ट्रिब्यूनल की तरफ़ से पहली दफ़ा जारी किए गए नोटिस में इस बात का उल्लेख करना पड़ता है. लेकिन हाईकोर्ट में आने वाले ट्रिब्यूनल के क़रीब सभी मामलों में ग्राउंड ऑफ़ सस्पिशन का कॉलम ख़ाली रहता है. इस पॉइंट पर ही हैदर अली के संदर्भ में हमने ट्रिब्यूनल के फ़ैसले को चुनौती दी थी."

वो बताते हैं, "कोई भी मामला ट्रिब्यूनल को भेजने से पहले संदिग्ध व्यक्ति से उचित पूछताछ करने के साथ ही उसके स्थाई ठिकाने पर जाकर जाँच पड़ताल करनी होती है. लेकिन अधिकतर मामलों में बॉर्डर पुलिस न तो संदिग्ध व्यक्ति से मिलती है और न ही उसके गांव या फिर स्थाई पते पर जाकर पूछताछ करती है और मामले को ट्रिब्यूनल को भेज दिया जाता है."

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

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डी-वोटर की सूची

भारत निर्वाचन आयोग ने 17 जुलाई 1997 को असम सरकार के लिए एक सर्कुलर जारी कर ग़ैर-नागरिकों को चुनावी सूची से हटाने का निर्देश दिया था. दरअसल, यह ऐसे लोगों की सूची होती है जो अपनी भारतीय नागरिकता के पक्ष में सबूत नहीं पेश कर पाते.

उस दौरान चुनाव आयोग द्वारा लगभग 3 लाख 70 हज़ार लोगों को इस प्रकार डी-वोटर अर्थात संदिग्ध मतदाता घोषित किया गया था. हाल ही में संपन्न हुए असम विधानसभा के चुनाव में एक लाख 8 हज़ार डी-वोटरों को वोट डालने की अनुमति नहीं दी गई. असम के अलावा डी-वोटर की यह सूची देश के किसी भी हिस्से में नहीं है.

एम.जे. क़ादिर के अनुसार जिन लोगों को डी-वोटर बनाया गया था उन्हीं लोगों के मामले अब एक-एक कर ट्रिब्यूनल को भेजे जा रहे हैं.

वह कहते हैं, "हैदर अली के मामले में बरपेटा ट्रिब्यूनल को जो 1966 से पहले का इलेक्टोरल रोल दिया गया था उसमें उसके दादा और चाचा के नाम थे लेकिन वहां अली ने जो लिखित बयान दिया था उसमें उन्होंने परिवार के बाक़ी रिश्तेदारों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी थी और उसी ग्राउंड पर अली को विदेशी घोषित कर दिया गया.''

''लेकिन इस पर हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि उन सभी व्यक्तियों की कड़ी (फ़ैमली ट्री) को साबित करना आवश्यक नहीं है जो पिता या दादा के साथ जुड़े रिश्तों से ताल्लुक़ रखते हैं. अर्थात अन्य व्यक्तियों के बारे में लिखित बयान या साक्ष्य में उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं है. हाईकोर्ट ने मुख्य तौर पर इसी प्वाइंट पर हस्तक्षेप किया और अपना फ़ैसला सुनाया."

हैदर अली

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छोटी-छोटी ग़लतियों के कारण विदेशी घोषित

क़ादिर गुवाहाटी हाईकोर्ट में नागरिकता से जुड़े क़रीब 10 मामले लड़ रहे हैं.

वह बताते हैं कि कई मामलों में लोगों के नाम, उपनाम और उम्र में मामूली-सी ग़लती के कारण भी उन्हें विदेशी घोषित कर दिया जाता है. जबकि इस संदर्भ में गुवाहाटी हाईकोर्ट के फ़ैसले में ट्रिब्यूनल को विचार करने का सुझाव दिया गया है. लेकिन, हैदर अली का यह ऐसा मामला है जिसमें हाई कोर्ट ने उन्हें भारतीय घोषित किया है.

एनआरसी में जिन लोगों के नाम नहीं आए हैं उनके लिए ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया से गुज़रना कितना मुश्किल होगा?

इसके जवाब में क़ादिर का कहना है, "अभी तो ट्रिब्यूनल के पास कम मामले हैं लेकिन जब एनआरसी में शामिल नहीं किए गए 19 लाख से अधिक लोगों को नोटिस भेजा जाएगा उस समय लोगों को ट्रिब्यूनल की प्रक्रिया से गुज़रने में बहुत परेशानी उठानी पड़ेगी. उन सभी लोगों को नागरिकता से जुड़े वही सारे दस्तावेज़ फिर से दाख़िल करने पड़ेंगे.''

''ऐसे लोग भी हैं जिन्हें एक ही समय में एनआरसी और ट्रिब्यूनल के समक्ष अपनी नागरिकता साबित करने का प्रयास करना पड़ रहा था. उस समय एनआरसी भी चल रही थी और ट्रिब्यूनल में भी उनके मामले थे. लिहाज़ा इस तरह की प्रक्रिया को कैसे सही कहा जा सकता है?"

असम सरकार ने पिछले सितंबर को विधानसभा में एक जानकारी देते हुए बताया था कि राज्य में इस समय 100 ट्रिब्यूनल चल रहे हैं जहां डी-वोटरों के 83,008 मामले लंबित हैं. सरकार ने अपनी जानकारी में यह भी बताया था कि 221 पूर्व न्यायाधीशों, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और वकीलों को 200 नए एफ़टी की मंज़ूरी के लिए सदस्यों के रूप में नियुक्त किया गया था लेकिन कोविड महामारी के कारण नए ट्रिब्यूनल का काम शुरू नहीं हो पाया.

असम में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता

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ट्रिब्यूनल पर सवाल

असल में ट्रिब्यूनल व्यवस्था के तहत एफ़टी में नियुक्त सदस्य विदेशी अधिनियम,1946 के अंतर्गत यह देखता है कि जिस व्यक्ति पर मामला है वो इस क़ानून के भीतर एक विदेशी है या नहीं है.

लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में विदेशी ट्रिब्यूनल के कामकाज की आलोचना होती रही है. ऐसे आरोप भी लगे कि ट्रिब्यूनल में काम करने वाले सदस्य सरकार के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर अपना काम करते हैं वरना उन्हें वहां से हटा दिया जाता है. दरअसल, विदेशी ट्रिब्यूनल एक पूर्ण अदालत नहीं होती है.

असम में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता एफ़टी के कामकाज पर लग आरोपों पर कहते हैं, "फ़ॉरेनर्स ट्रिब्यूनल से अगर कोई विदेशी घोषित हुआ है और उसके बाद गुवाहाटी हाईकोर्ट ने उस व्यक्ति को भारतीय बताया है तो निश्चित रूप से यह तथ्य अप्रियकर लगता है. अगर ऐसा हुआ है तो एफ़टी की कार्यशैली में सुधार की आवश्यकता है. क्योंकि किसी भी भारतीय को विदेशी घोषित कर देना और सारी प्रक्रियाओं का सही से पालन नहीं करना कहीं से उचित नहीं माना जाएगा. एफ़टी के सदस्यों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी ग़लती दोबारा ना हो."

हैदर अली कहते हैं कि सरकार को ट्रिब्यूनल व्यवस्था ही ख़त्म कर देनी चाहिए. इस व्यवस्था में बूढ़े, बीमार लोगों को एफ़टी के चक्कर काटने पड़ रहें है. अगर किसी की नागरिकता पर संदेह है तो घर-घर जाकर उसकी जाँच की जाए और उसका फ़ैसला अदालत करे.

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