असम में कांग्रेस-एआईयूडीएफ़ गठबंधन बीजेपी को सत्ता से बाहर कर पाएगा?

असम में कांग्रेस समर्थक

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    • Author, दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए

ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने हाल ही में कहा था कि आगामी असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी को राज्य की सत्ता से बाहर करने के लिए उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है.

मौलाना अजमल को पता था कि कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के बाद बीजेपी हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण करने के लिए उन पर निशाना साधेगी, इसलिए उन्होंने सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा कर दी है कि अगर प्रदेश में महागठबंधन को बहुमत मिलता है तो मुख्यमंत्री कांग्रेस पार्टी का ही होगा. अर्थात एआईयूडीएफ ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी हालत में कांग्रेस पार्टी से नाता नहीं तोड़ेगी.

असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए इसी महीने 27 मार्च से तीन चरणों में चुनाव होने है और इस बार का चुनाव राजनीतिक पार्टियों में बने गठबंधन के बीच है.

इस चुनाव में बीजेपी ने अपने पुराने सहयोगी क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) को तो साथ रखा है लेकिन बोडोलैंड के अपने पुराने पार्टनर बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) को गठबंधन से बाहर कर यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) को अपना नया साथी बनाया है.

दरअसल पिछले साल 40 सीटों वाली स्वायत्तशासी बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल के चुनाव में हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बीपीएफ ने सबसे अधिक 17 सीटें जीती थी और उस दौरान वे असम सरकार में बीजेपी के पार्टनर भी थे लेकिन बोडोलैंड इलाके में बीजेपी ने बीपीएफ को अलग कर 12 सीटें जीतने वाली यूपीपीएल के साथ मिलकर परिषद का गठन कर लिया था.

इस चुनाव में बीजेपी ने 92 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, उनकी सहयोगी एजीपी ने 26 सीटों पर और यूपीपीएल 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन में एआईयूडीएफ, सीपीआई, सीपीएम,सीपीआई (एमएल) आंचलिक गण मोर्चा और बीपीएफ शामिल हैं.

कांग्रेस ने पहले चरण के लिए 40 उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है वहीं एआईयूडीएफ 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी.

बदरुद्दीन अजमल की रैली

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नागरिकता संशोधन क़ानून अर्थात सीएए के विरोध से बनी राज्य की दो नए क्षेत्रीय पार्टियों के मैदान में उतरने से इस बार का चुनावी मुकाबला तीन तरफा हो सकता है.

अभी कुछ महीने पहले ही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के समर्थन से असम जातीय परिषद (एजेपी) का गठन हुआ है जबकि जेल में बंद जानेमाने आरटीआई कार्यकर्ता अखिल गोगोई के संगठन कृषक मुक्ति संग्राम समिति ने रायजोर दोल नाम से एक राजनीतिक पार्टी बनाई है और इन दोनों दलों ने आपस में गठबंधन किया है.

हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महज़ कुछ सीटों में ये नई क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी-कांग्रेस दोनों के थोड़े वोट काट सकती है.

गठबंधन से कांग्रेस को कितना फ़ायदा

प्रदेश में आए दिन बीजेपी के बड़े नेता स्टार प्रचारक के तौर सभाएँ कर रहे हैं वहीं कांग्रेस तथा अन्य पार्टियां भी चुनावी प्रचार में जुट रही भीड़ के आधार पर अपनी-अपनी जीत का दावा कर रही हैं. लेकिन क्या सही में कांग्रेस के नेतृत्व में बनाया गया महागठबंधन बीजेपी को सत्ता से बाहर कर सकता है?

इस सवाल का जवाब देते हुए न्यूज़ वेबसाइट नॉर्थ ईस्ट नाउ के मुख्य संपादक अनिर्बान रॉय कहते है, "2016 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार बीजेपी की स्थिति को बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. कांग्रेस-एआईयूडीएफ के साथ आने से बीजेपी की चुनौतियां काफी बढ़ गई है. पिछले चुनाव में जो मुसलमान वोट कांग्रेस-एआईयूडीएफ के उम्मीदवारों में बंट गए थे अब एक साथ आने से इसका सीधा फायदा मिलेगा.'

रॉय कहते हैं, 'ज़ाहिर सी बात है कि बदरुद्दीन मुसलमान वोटों का ध्रुवीकरण करेंगे और उनके अब तक के चुनावी बयान इस बात की गवाही भी है. यही वजह है कि बीजेपी अपनी सरकार के पिछले पांच साल के काम गिनवाने की वजाए चुनावी सभाओं में हिंदुत्व, मुगलों का शासन आ जाएगा जैसी बातें कर रहीं है ताकि हिंदू वोट एक साथ आ जाए."

वीडियो कैप्शन, असम के चाय मज़दूरों के कैसे हालात हैं?

पत्रकार रॉय कहते हैं, "2016 के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो राज्य में कांग्रेस को करीब 31 फीसदी वोट मिले थे जो किसी भी पार्टी को मिलने वाले सबसे ज्यादा वोट शेयर थे. जबकि उस चुनाव में तरुण गोगोई सरकार के लगातार 15 साल शासन के खिलाफ एक मजबूत एंटी इनकंबेंसी फैक्टर था. राज्य में परिवर्तन के लिए मोदी की लहर भी थी. उस चुनाव में बीजेपी को 29.5 फीसदी वोट मिले थे. बीजेपी ने 60 सीटें जीती थी और कांग्रेस को 26 सीटें मिली थी. लेकिन कांग्रेस का प्रत्येक सीट में मुकाबला बहुत नज़दीकी था. इसका बड़ा कारण था कि कांग्रेस-एआईयूडीएफ ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. इसलिए उन सीटों पर खासकर मुस्लिम वोट बंट गए थे जिसका बीजेपी को फायदा मिला. लेकिन इस बार दोनों साथ है, लिहाजा बीजेपी के लिए यह मुकाबला आसान नहीं होगा."

असल में रैली करते छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल

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"इसके अलावा बराक वैली इलाका भाजपा का गढ़ माना जाता है वहां 15 सीटें है लेकिन इस बार वहां भी नुकसान होता दिख रहा है. क्योंकि बराक वैली राज्य की एक ऐसी जगह है जहां सीएए का लोग समर्थन कर रहे थे लेकिन सीएए को पास हुए डेढ़ साल होने को है परंतु अभी तक नियम ही नहीं बनाए गए है लिहाजा लोग अनिश्चितता में है."

हाल ही में गृह मंत्रालय ने लोकसभा में यह जानकारी थी कि सीएए के संबंध में नियमों को लागू करने के लिए 9 अप्रैल, 2021 और 9 जुलाई, 2021 तक का समय दिया गया है.

राजनीति के जानकारों की मानें तो बीजेपी ने सीएए के नियमों को लागू करने में विलंब इसलिए किया है ताकि पश्चिम बंगाल के चुनाव में पार्टी को नुकसान ना उठाना पड़े.

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दरअसल असम में 2019 के अगस्त महीने में जारी की गई एनआरसी की फाइनल लिस्ट में जिन 19 लाख लोगों के नाम काट दिया गया था उनमें तकरीबन 12 लाख बंगाली हिंदू वोटर हैं.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाली हिंदुओं के इस मुद्दे को अपने राज्य में जोरशोर से उठाया था. बताया जाता है कि इसी कारण से बीजेपी ने बंगाल चुनाव को ध्यान में रखते हुए सीएए के नियमों लागू नहीं किया. जबकि कानून के नियमों को बनाने के मानदंडों के अनुसार किसी भी कानून के लागू होने के छह महीने के भीतर नियम बन जाने चाहिए.

कांग्रेस का चुनाव अभियान

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2016 से पहले असम में जब 15 साल तक कांग्रेस की सरकार थी उस समय बदरुद्दीन अजमल को बिलकुल अहमियत नहीं दी गई. कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने तो यहां तक कहा था कि बदरुद्दीन अजमल कौन है? लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली जीत के बाद 26 अक्टूबर को गोगोई ने सार्वजनिक तौर पर सबसे पहले मौलाना बदरुद्दीन के साथ हाथ मिलाने की बात कही थी.

जब से कांग्रेस-एआईयूडीएफ ने गठबंधन की घोषणा की है राज्य में चुनावी दौरा कर रहें गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राजनाथ सिंह तक बीजेपी के सभी बड़े नेता इस गठबंधन पर निशाना साध रहे हैं.

असम की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहें वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी कहते है,"कांग्रेस-एआईयूडीएफ के साथ आने से महागठबंधन को फायदा होगा. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 26 सीटें जीती थी उसमें 15 विधायक मुसलमान थे. इसलिए पिछले चुनाव में एआईयूडीएफ की कम सीटें आई थी. केवल 13 विधायक ही जीत पाए. इस तरह दोनों पार्टियों में कुल मुस्लिम विधायकों की संख्या 28 थी और एक मुसलमान विधायक बीजेपी से जीतकर आए थे. इस तरह कांग्रेस-एआईयूडीएफ अलग-अलग चुनाव लड़ने से उन्हें 12 सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा और बीजेपी बहुत कम अंतर से उन सीटों पर जीत गई.

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"अगर कांग्रेस-एआईयूडीएफ के उम्मीदवारों को प्राप्त वोटों को जोड़ दिया जाए तो बीजेपी को जीतने वाले उम्मीदवार के कुल वोटों से ज़्यादा वोट हो जाएंगे. लिहाजा साथ आने से उन सीटों पर इस बार फायदा मिलेगा. इसके अलावा हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बीपीएफ के महागठबंधन में शामिल हो जाने से बीजेपी के लिए चुनौती और बड़ी हो गई है. क्योंकि असम में 2005 से जिस भी पार्टी की सरकार रही है उसमें हाग्रामा सहयोगी रहे हैं. पिछले चुनाव में उनके पास 12 विधायक थे."

बीजेपी सत्ता पर फिर कैसे काबिज़ हो सकती है?

असम में अमित शाह की रैली

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पत्रकार गोस्वामी कहते हैं,"2016 के विधानसभा चुनाव ने लोगों को यह बात अच्छी तरह समझा दी कि हिंदू-मुसलमान के बीच विभाजन करने से वोट आसानी से मिल जाते है. असम विधानसभा के किसी भी चुनाव में आजतक 32 से ज्यादा मुसलमान उम्मीदवार जीत कर नहीं आए है. यह संख्या 30 से 32 के बीच रही है. 2016 के चुनाव में सभी दलों को मिलाकर मुसलमान विधायकों की कुल संख्या 26 थी. लिहाजा बाकी के 100 विधायक हिंदू है. अगर हिंदू-मुसलमान के बीच राजनीतिक विभाजन कर दिया जाए और बीजेपी हिंदू वोटो का ध्रुवीकरण करें तो इससे सत्ता हासिल करना आसान हो जाता है"

अभी दो दिन पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर कहा था कि चार राज्यों में बीजेपी की ज़बरदस्त हार होगी. बीजेपी केवल असम में जीत सकती है.

कांग्रेस गठबंधन के पास चेहरों की कमी

कांग्रेस की चुनावी रैली में प्रियंका गांधी

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लेकिन पत्रकार रॉय कहते है कि हिमंत बिस्व सरमा जिस तरह से मेहनत कर रहें है दरअसल उनका मुकबला करने के लिए महागठबंधन में शामिल किसी भी पार्टी के पास उस कद का नेता नहीं है. खासकर तरुण गोगोई के निधन से कांग्रेस को काफी नुकसान हुआ है.

वो कहते हैं,"गोगोई कांग्रेस के लिए एक फ़ादर फ़िगर थे. अगर वे ज़िंदा होते तो कांग्रेस और मज़बूती से मुकाबला करती. जिस तरह प्रदेश में बीजेपी नेता हिमंत अपनी रैलियों में भीड़ को आकर्षित कर रहें है उसी तरह तरुण गोगोई की स्वीकार्यता भी बहुत थी. कांग्रेस के अन्य नेताओं के मुकाबले गोगोई का काउंटर अटैक ज्यादा प्रभावी होता. क्योंकि गोगोई को असम के लोग बहुत प्यार करते थे.

वीडियो कैप्शन, प्रियंका गांधी ने असम के चाय बागान में तोड़ी चायपत्ती

असम में खासकर मुसलमानों को लेकर होने वाली राजनीति को समझने वाले गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील हाफिज रशीद अहमद चौधरी कहते है,"पहले चरण में जिन 40 सीटों पर मतदान होना है वहां ज्यादा हिंदू वोट है और बीजेपी उन सीटों पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का प्रयास कर रही है. लेकिन उन सीटों में कांग्रेस का भी पुराना आधार रहा है. पिछले चुनाव में कांग्रेस ने इन्हीं असमिया हिंदू बहुल इलाकों में 9 सीटें जीती थी. जबकि जिन असमिया लोगों ने पिछली बार भाजपा को वोट किया था उनमें काफी लोग सीएए को लेकर नाराज है. इसलिए कांग्रेस को यहां ज्यादा नुकसान नहीं होगा."

रशीद कहते हैं, "बीजेपी अजमल के नाम से हिंदू वोटरों को डराने की कोशिश कर रही है लेकिन अजमल ने तो घोषणा ही कर दी है कि अगर कांग्रेस नेतृत्व वाले महागठबंधन को बहुमत मिलता है तो सीएम कांग्रेस का ही होगा. जो पढ़े-लिखे लोग है वे इस तरह की राजनीति को अब समझने लगे हैं. इसके अलावा जोरहाट, शिवसागर, डिब्रूगढ़ जहां थोड़े बहुत मुसलमान वोट है वो कांग्रेस को ही मिलेंगे क्योंकि वहाँ अजमल की पार्टी का कोई उम्मीदवार ही नहीं होगा. ऐसा लगता नहीं है कि अजमल के नाम से कांग्रेस को नुकसान होगा."

अभी हाल ही में बदरुद्दीन ने पत्रकारों के समक्ष कहा था, "असम में कांग्रेस ही एक पार्टी है जो बीजेपी को टक्कर दे सकती है इसलिए हमने कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा ताकत पहुंचाने की कोशिश की. हमने कांग्रेस की लिए जो सीटें छोड़ी है और जहां 20-25 हज़ार अल्पसंख्यक वोट है मैं वहां कांग्रेस के लिए प्रचार करने जाउंगा और उन सीटों को कांग्रेस के लिए निकाल कर लाने की पूरी कोशिश करूंगा. हमारा एक ही लक्ष्य है कि बीजेपी असम से विदा हो जाए."

बीजेपी के निशाने पर कांग्रेस नहीं बल्कि अजमल

सर्बानंद सोनोवाल

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इस चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी नेता अजमल पर निशाना साध रहे हैं, क्यों? इस सवाल का जवाब देते हुए बदरुद्दीन कहते है,"बीजेपी अगर किसी को निशाना बना रही है तो वह केवल मैं हूं. वह चाहते है कि इसको (अजमल) खत्म कर दो तो 35 फीसदी वोट एक तरफ खत्म हो जाएगा. बीजेपी को डर है कि ये 35 फीसदी मुसलमान मतदाता अजमल की बात सुनते है. इस डर की वजह से वो लोग मुझे अपना दुश्मन समझते है."

एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन से कांग्रेस को खासकर हिंदू बहुल ऊपरी असम में नुकसान होने के सवाल पर बदरुद्दीन कहते है,"कांग्रेस 134 साल पुरानी पार्टी है लिहाजा उनका मतदाताओं में अपना आधार है. चाय बागान के लोग हमेशा कांग्रेस के साथ रहें है. पिछली बार बीजेपी ने चाय जनजातियों को झूठे प्रलोभन देकर अपनी तरफ कर लिया था लेकिन इस बार वे लोग कांग्रेस के साथ है. इसलिए कांग्रेस इस बार अच्छी सीटें लेकर आएगी. हमारे गठबंधन की सरकार बनने के बाद चाय मजदूरों की मजदूरी 365 रुपए की जाएगी. हम सीएए को किसी भी कीमत पर असम में लागू नहीं होने देंगे और एक पूर्ण एनआरसी राज्य में लागू की जाएगी."

वीडियो कैप्शन, पहचान के लिए लड़ रहे हैं असम के ये लोग

प्रदेश में चुनाव आचार संहिता लागू होने से पहले असम सरकार ने अपनी कैबिनेट की आखिरी बैठक में चाय मजदूरों की दिहाड़ी 167 रुपए को बढ़ाकर 217 रुपए करने की घोषणा की थी और तत्काल एक अधिसूचना भी जारी कर दी थी. लेकिन इंडियन टी एसोसिएशन और 17 चाय कंपनियां इस मामले को अदालत ले गई हैं.

फिलहाल गुवाहाटी हाई कोर्ट ने असम सरकार को एक आदेश जारी करते हुए कहा है कि जब तक इस मामले में सुनवाई पूरी नहीं हो जाती तब तक दिहाड़ी को बढ़ाने के संबंध में जारी अधिसूचना पर आगे कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी.

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