असम चुनावः बदरुद्दीन अजमल के कारण बीजेपी से पिछड़ गई कांग्रेस?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस और मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ़) के गठबंधन को पछाड़कर नया रिकॉर्ड बनाते हुए सत्ता में वापसी की है.
दरअसल बीजेपी असम में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने वाली पहली ग़ैर कांग्रेस पार्टी है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असम में अपनी पार्टी की जीत पर एक ट्वीट कर कहा, "असम के लोगों ने एनडीए के विकास एजेंडे और राज्य में लोक समर्थक ट्रैक रिकॉर्ड वाली हमारी सरकार को फिर से आशीर्वाद दिया है. मैं असम के लोगों को इस आशीर्वाद के लिए धन्यवाद देता हूँ. मैं एनडीए के कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत और लोगों की सेवा में उनके अथक प्रयासों की सराहना करता हूँ."
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भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने भी असमिया भाषा में एक ट्वीट कर शांति, सुशासन और विकास की राजनीति को फिर चुनने के लिए असम की जनता का हृदय से आभार व्यक्त किया.
लेकिन क्या सही में इस बार असम का विधानसभा चुनाव विकास की राजनीति के इर्द गिर्द रहा या फिर सामने आए चुनावी नतीजे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण ज़्यादा प्रभावित हुए?
असल में इस बार के असम विधानसभा चुनाव में एनआरसी, नागरिकता संशोधन क़ानून, चाय श्रमिकों की मज़दूरी, छह जनजातियों के जनजातिकरण से लेकर बेरोज़गारी जैसे कई अहम मुद्दे थे, लेकिन इन सबसे बीजेपी के प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ा.

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क्या रहे कारण?
वैसे तो इन चुनावी नतीजों को लेकर राजनीतिक समीक्षक कई अलग-अलग कारण बता रहे हैं, लेकिन इनमें अधिकतर लोगों का यह मानना है कि कांग्रेस के लिए मौलाना बदरुद्दीन अजमल को साथ लेना बहुत महंगा साबित हुआ.
असम के वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी की मानें, तो कांग्रेस-एआईयूडीएफ़ के गठबंधन के सहारे बीजेपी को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का अच्छा मौक़ा मिल गया.
असम में बीजेपी की इस जीत पर गोस्वामी ने बीबीसी से कहा, "इस बार के चुनाव में सीएए-एनआरसी, जनजातिकरण, चाय श्रमिकों की मज़दूरी जैसे मुद्दों को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि बीजेपी के लिए इस बार का चुनाव बेहद कठिन होगा. लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में जो महागठबंधन बना, उसमें बदरुद्दीन अजमल की पार्टी को साथ लेने से बीजेपी के लिए हिंदू वोटरों को एकजुट करना आसान हो गया. "

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"बीजेपी नेताओं ने अपनी चुनावी रैलियों में इस गठबंधन को लेकर आक्रामक रवैया अपनाया. लोगों से यह कहा गया कि अगर महागठबंधन की जीत होती है तो बदरुद्दीन अजमल राज्य के मुख्यमंत्री बन जाएँगे और असम में घुसपैठियों का बोलबाला हो जाएगा. राज्य में हर तरफ़ मस्जिदों का निर्माण किया जाएगा. लिहाज़ा चुनावी रैलियों में आए मतदाता ख़ासकर ग्रामीण मतदाता सीएए जैसे मुद्दे भूल गए."
"सामने आए चुनावी नतीजों से यह बात अच्छी तरह समझी जा सकती है कि ऊपरी असम की जिन 60-62 सीटों पर बीजेपी को नुक़सान होने का अनुमान लगाया जा रहा था, वहां पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन कर दिखाया. क्योंकि सीएए का सबसे ज़्यादा विरोध ऊपरी असम में ही हुआ था. लेकिन इसके बाद भी वहाँ लोगों ने बीजेपी को ही वोट डाला."
गोस्वामी कहते है, "इसके अलावा प्रमुख विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस यहाँ के मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रही कि राज्य में वह बीजेपी का विकल्प है. प्रदेश कांग्रेस के नेताओं के बीच जो आपसी मतभेद थे वो जनता के सामने आ गए थे. "
"दूसरी तरफ बीजेपी सरकार की कुछ प्रमुख योजनाओं में महिला मतदाताओं को काफी फायदा दिया गया. ओरुनोदोई योजना में महिलाएँ लाभार्थी काफ़ी थी, वो वोट भी पार्टी के पक्ष में गया. इसके अलावा पिछली बार बोडोलैंड में 12 सीटें जीतने वाली बीपीएफ़ पार्टी बीजेपी से अलग होने के बाद महागठबंधन में तो शामिल हुई, लेकिन उसके खराब प्रदर्शन के कारण महागठबंधन को कोई फ़ायदा नहीं हुआ. बीपीएफ़ बोडोलैंड में आधी सीट भी नहीं ला सकी."
महिलाओं का समर्थन

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बीजेपी सरकार ने परिवार की प्राथमिक देखभाल करने वाली महिलाओं को ओरुनोदोई योजना के तहत 830 रुपए प्रतिमाह बतौर वित्तीय सहायता देने की योजना शुरू की थी, जिसका फायदा करीब 17 लाख परिवार को पहुँचाया गया था. आँकड़े बताते है कि इस योजना का फ़ायदा मुसलमान महिलाओं को भी मिला. लिहाज़ा इस बार बड़ी संख्या में महिलाओं ने बीजेपी को वोट किया.
गोस्वामी की मानें, तो सीएए के विरोध के बाद राज्य में बने दो राजनीतिक दल असम जातीय परिषद और राइजोर दल ने भी महागठबंधन को काफ़ी नुकसान पहुँचाया. इन दो पार्टियों ने जो किया वही काम असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी कई राज्यों के चुनावों में करती रही है.
एक नई क्षेत्रीय पार्टी होने के बावजूद असम जातीय परिषद ने सत्तारूढ़ बीजेपी के बराबर 92 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए. इससे महागठबंधन के उम्मीदवारों के वोट बँट गए.
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

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असम की राजनीति को लंबे समय कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार नव कुमार ठाकुरिया बीजेपी की जीत के पीछे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को सबसे बड़ा कारण मानते है.
वो कहते है, "कांग्रेस-एआईयूडीएफ़ के एक साथ आने से असम के निचले इलाक़े के मुसलमान वोटर एक साथ आ गए. ठीक उसी तरह ऊपरी असम में इसके ख़िलाफ़ हिंदू वोटर भी एकजुट हो गए. "
"एआईयूडीएफ़ के साथ गठबंधन कर कांग्रेस ने केवल इस चुनाव में ही नुक़सान नहीं उठाया है, बल्कि आगे भी पार्टी को नुक़सान उठाना पड़ेगा. क्योंकि कांग्रेस में अब इस बात को लेकर काफी घमासान होने वाला है और हो सकता है कि पार्टी में जो ग़ैर-मुसलमान विधायक और नेता है वो बीजेपी में चले जाएँ."
लेकिन क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद (एजीपी) के इस अच्छे प्रदर्शन के पीछे क्या कारण है?
इस सवाल का जवाब देते हुए पत्रकार ठाकुरिया कहते है, "असम गण परिषद के अच्छे प्रदर्शन का कारण बीजेपी का एलायंस पार्टनर होना है. असमिया क़ौमपरस्ती और भारतीय राष्ट्रवाद दोनों साथ में है लिहाजा जो वोटर क्षेत्रीयतावादी पार्टी के लिए वोट डाल रहा है वो खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा है. वह कांग्रेस के महागठबंधन में इसलिए नहीं गया क्योंकि उसके वोट का फायदा अजमल की पार्टी को मिलेगा."

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ठाकुरिया की मानें तो सीएए विरोध से बने नए राजनीतिक दलों से कांग्रेस महागठबंधन को कोई ख़ास नुक़सान नहीं हुआ. क्योंकि असम आंदोलन के बाद जब 1985 में एजीपी ने सरकार बनाई थी उस समय भी पार्टी ने 126 सीटें नहीं जीती थी.
वो कहते हैं कि, "किसी भी पार्टी के लिए लोगों का सेंटीमेंट जरूर होता है लेकिन ऐसा नहीं है कि पूरा बहुमत किसी एक पार्टी को ही मिल जाए. सीएए का विरोध करने वाले जो वोटर थे वो भी बँट जरूर गए और उसका कुछ हिस्सा नई पार्टियों को गया होगा."
लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 2021 के विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति को एक तरह से बदल दिया है. ऐसा कहा जा रहा है कि अब राज्य में प्रमुख मुक़ाबला बीजेपी और एआईयूडीएफ़ के बीच ही होगा जो पूरी तरह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए लड़ा जाएगा.
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