बदरुद्दीन अजमल कौन हैं, जिन्हें बीजेपी नेता असम का 'दुश्मन' बता रहे हैं?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, होजाई (असम) से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की असम यूनिट ने 3 अप्रैल 2005 को गुवाहाटी में एक विशाल रैली का आयोजन किया था. उस रैली में जमीयत के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना असद मदनी जब अपने भाषण में मुसलमानों की मांगों को लेकर उस समय प्रदेश की काँग्रेस सरकार को गिराने की धमकी दे रहे थे तब तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई उसी मंच पर साथ बैठे हुए थे.
उस दौरान रैली में उपस्थित प्रदेश के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) अजय सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत समेत कई बड़े राजनेता मदनी का भाषण सुनकर चकित रह गए थे.
दरअसल यह वही जमीयत उलेमा-ए-हिंद है जिसकी ताकत और प्रभाव के सहारे मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने असम की राजनीति में कदम रखा था. असम की राजनीति में मुस्लिम आबादी की दख़ल और जमीयत की ताकत की बदौलत ही रैली में मदनी ने एक मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सरकार गिराने की बात कह दी थी.
साल 2005 में असम की राजनीति में उस रैली समेत ऐसी तीन महत्वपूर्ण घटनाएँ हुई थी. उस साल (जुलाई, 2005) सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद अवैध प्रवासी (निर्धारण) अधिनियम 1983 अर्थात आईएमडीटी क़ानून को निरस्त कर दिया था. जमीयत की रैली के क़रीब छह महीने बाद किंग मेकर से किंग बनने का रास्ता तलाशते हुए बदरुद्दीन अजमल ने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट अर्थात एआईयूडीएफ नाम से एक अलग राजनीतिक पार्टी बना ली थी.

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असल में मदनी का वह भाषण असम में मुसलमानों के लिए एक नई पार्टी के जन्म का संकेत था. असम में बंगाली मूल के मुसलमानों के राजनीतिक फ़ैसले को प्रभावित करने में जमीयत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
एआईयूडीएफ का जब गठन किया गया था उस समय बदरुद्दीन अजमल जमीयत के असम यूनिट के अध्यक्ष थे और आज भी वे इस पद पर बने हुए है.
असम में 2021 के विधानसभा चुनाव की तारीख़ों का एलान हो चुका है और इस बार के चुनाव में भी बदरुद्दीन अजमल के नाम की खूब चर्चा है. दरअसल जब से काँग्रेस और एआईयूडीएफ ने साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है उस समय से ख़ासकर मौलाना अजमल बीजेपी के निशाने पर है.
बदरुद्दीन अजमलः बतौर शख़्सियत
भारत के गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में बदरुद्दीन अजमल और कांग्रेस पर घुसपैठ को शरण देने का आरोप लगाते हुए कहा था, "असम को घुसपैठ मुक्त बनाना चाहते हो या नहीं. ये कांग्रेस और बदरुद्दीन अजमल असम को घुसपैठियों से सुरक्षित रख सकते हैं क्या? ये जोड़ी सारे दरवाज़े खोल देगी और घुसपैठ को असम के अंदर सरल कर देगी, क्योंकि ये उनका वोट बैंक है. "
इससे पहले असम बीजेपी के कद्दावर नेता हिमंत बिस्व सरमा अजमल को असम का 'दुश्मन' बता चुके है. लेकिन ये भी सच है कि बदरुद्दीन अजमल को असमिया समुदाय की सबसे प्रतिष्ठित और सौ साल पुरानी संस्था असम साहित्य सभा ने 2004 में होजाई में आयोजित अपने अधिवेशन में स्वागत समिति का अध्यक्ष बनाया था.
लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी, कंधे पर परंपरागत असमिया गमछा, सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने मौलाना बदरुद्दीन अजमल जब चर (नदी तटीय द्वीप) इलाकों से गुज़रते है तो लोगों की भीड़ उनकी गाड़ी के पीछे दौड़ने लगती है. यह भीड़ ख़ासकर बंगाली बोलने वाले ग़रीब और पिछड़े मुसलमानों की होती है.

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मुसलमानों में लोकप्रिय
अपनी धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के कारण इन मुसलमानों में अजमल काफ़ी लोकप्रिय हैं. ये लोग उन्हें एक राजनेता के साथ-साथ इस्लामिक गुरु के तौर पर भी देखते है. बदरुद्दीन पर भाषणों के जरिए बंगाली मुसलमानों का ध्रुवीकरण करने का आरोप विपक्ष हमेशा से लगाता रहा है.
हाल ही में बदरुद्दीन ने अपने संसदीय क्षेत्र धुबड़ी की एक रैली में दावा किया था कि भाजपा के पास 3500 मस्जिदों की एक सूची है और अगर वह केंद्र की सत्ता में लौटती है तो मस्जिदों को नष्ट किया जाएगा.
असम की राजनीति में अपनी अहम जगह बना चुके बदरुद्दीन अजमल का नाम 2004 से पहले प्रदेश में कम ही सुनाई देता था. उससे पहले वे खुद सीधे तौर पर राजनीति में नहीं आए थे और पर्दे के पीछे रहकर जमीयत की ताक़त के सहारे किंग मेकर का खेल खेलते थे.
वह एक ऐसा दौर था जब काँग्रेस से लेकर दो बार असम की सत्ता संभाल चुकी क्षेत्रीय पार्टी असम गण परिषद के नेता अजमल से मिलने उनके घर तक जाते थे.

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तरुण गोगोई से टकराव
बदरुद्दीन अजमल के राजनीति में आने के पीछे मुख्य तौर पर 2005 में आईएमडीटी क़ानून को निरस्त किया जाना ही बताया जाता है लेकिन कई लोग तरुण गोगोई से उनके टकराव को भी एक कारण मानते हैं.
दरअसल बदरुद्दीन के बारे में कहा जाता है कि 2001 में तरुण गोगोई ने जब राज्य में काँग्रेस की सरकार बनाई थी उस समय मंत्रिमंडल में अजमल जमीयत के सपोर्ट से जीतकर आए अपने विधायकों के लिए प्रमुख विभाग चाहते थे जिसे गोगोई ने बिल्कुल तवज्जो नहीं दी.
इसके बाद ऐसे कई मौके आए जब मौलाना अजमल ने तरुण गोगोई पर मुसलमानों की कई समस्याओं को लेकर अनदेखी करने के आरोप लगाए. इस तरह बदरुद्दीन और तरुण गोगोई के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ता चला गया.
एक वक्त ऐसा आया जब तरुण गोगोई ने सार्वजनिक तौर पर यह कह दिया था कि ये बदरुद्दीन कौन हैं? हालाँकि वे अजमल की ताक़त से वाकिफ होते हुए भी अनजान बनने की कोशिश कर रहे थे.
एआईयूडीएफ का गठन
असम की राजनीति को लंबे समय से कवर कर रहें वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "असम में तरुण गोगोई के नेतृत्व में 2001 में जो काँग्रेस की सरकार बनी थी उसमें प्रदेश के जमीयत उलेमा-ए-हिंद का बहुत बड़ा समर्थन था. उस समय काँग्रेस के कुल 71 विधायक जीतकर आए थे जिनमें 13 मुसलमान थे."
वे कहते हैं, "असम में ख़ासकर बंगाली मुसलमानों के बीच जमीयत का काफी प्रभाव है. लिहाजा काँग्रेस के सत्ता में आते ही अजमल कैबिनेट के गठन में अपनी पसंद के लोगों को शामिल करना चाहते थे. परंतु गोगोई ने उनकी एक भी नहीं सुनी और दोनों के बीच उस समय से ही अनबन शुरू हो गई थी. इसके बाद बदरुद्दीन ने 2005 में एक अलग राजनीतिक पार्टी बना ली."
दरअसल आईएमडीटी क़ानून को रद्द किए जाने में गोगोई नेतृत्व वाली काँग्रेस सरकार की भूमिका को लेकर मुसलमान काफ़ी नाराज़ थे. कहा जाता है कि काँग्रेस सरकार को अदालत में जिस तरह अपना पक्ष रखना चाहिए था वो उस में नाकाम रही. आईएमडीटी क़ानून का रद्द होना एक बड़ी वजह बनी और बदरुद्दीन अजमल ने उस मौके को भुनाते हुए एआईयूडीएफ का गठन किया.
आईएमडीटी क़ानून
आईएमडीटी क़ानून रद्द होने से प्रदेश के बंगाली मुसलमानों के सामने एक बड़ी परेशानी खड़ी हो गई थी. अदालत ने आईएमडीटी को ख़त्म कर इसे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल व्यवस्था में परिवर्तित कर दिया था.
आईएमडीटी क़ानून में अगर किसी की नागरिकता पर कोई संदेह होता था तो जाँच अधिकारी को उस संदिग्ध व्यक्ति की नागरिकता प्रमाणित करनी होती थी और ये बहुत कठिन काम माना जाता था लेकिन फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल व्यवस्था में जिस व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठता है उसे खुद को अपनी नागरिकता का प्रमाण देना होता है.
राजनीति में कैसे आए?
मुसलमानों की इस परेशानी पर काँग्रेस कुछ ख़ास नहीं कर पाई थी और अवैध नागरिक ठहराए जाने से आशंकित मुसलमान किसी नए नेता की उम्मीद में थे जो उन्हें संरक्षण का भरोसा दे सके. इसलिए बंगाली मूल के मुसलमानों का एक बड़ा वोट बैंक बदरुद्दीन की तरफ़ चला गया.
यही वजह थी कि जिस एआईयूडीएफ को बने महज़ कुछ ही महीने हुए थे उस पार्टी ने 2006 के विधानसभा चुनाव में 10 सीटें जीती थी. उस चुनाव में खुद बदरुद्दीन, दक्षिण सालमारा और जमुनामुख दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में बड़े अंतर से जीते थे. इसके बाद 2009 में उन्होंने धुबड़ी से लोकसभा सांसद का चुनाव जीतकर संसद में कदम रखा और तब से वे लगातार तीन बार सांसद बने हुए है.
बदरुद्दीन को लंबे समय से जानने वाले तथा अजमल फाउंडेशन का कामकाज देख रहे ख़सरूल इस्लाम कहते है, "मौलाना अजमल राजनीति में आना नहीं चाहते थे और न ही उनके परिवार के लोग उन्हें राजनीति में भेजने के पक्ष में थे. लेकिन जमीयत उलेमा-ए-हिंद चाहती थी कि अजमल असम की राजनीति में आएं."
इत्र के बिजनेस से राजनीति तक का सफ़र
एक राजनीतिक नेता के अलावा बदरुद्दीन अजमल अपनी आर्थिक हैसियत के लिए भी जाने जाते है. दुनियाभर में फैले करोड़ों रुपयों के इत्र के कारोबार की बदौलत अजमल परिवार ने अपने पैतृक ज़िले होजाई में 500 बिस्तर वाला ग्रामीण अस्पताल बनवाया है. इसके अलावा असम के कई शहरों में दर्जनों कॉलेज, मदरसे, अनाथालय, मुफ़्त शिक्षा जैसे कई सामाजिक काम सालों से कर रहे हैं.
एक कारोबारी परिवार से आने वाले 71 साल के बदरुद्दीन अजमल का जन्म असम के होजाई ज़िले के एक छोटे से गाँव गोपाल नगर में हुआ था. बदरुद्दीन अजमल ने तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई होजाई के अली नगर प्राथमिक स्कूल से की और बाद में अपने पिता अजमल अली के साथ मुंबई चले गए. इसके बाद बदरुद्दीन ने दारूल उलूम देवबंद से इस्लाम और अरबी में फ़ाज़िल-ए-देवबंद (पोस्ट ग्रेजुएशन) की पढ़ाई पूरी की.
उनके पिता अजमल अली शुरू के दिनों में गाँव में खेती करते थे लेकिन बाद में परफ़्यूम बनाने वाले 'अगर के पेड़' का कारोबार करने लगे.
अजमल अली को लंबे समय से जानने वाले और उनके गाँव गोपाल नगर में पड़ोसी अनूप कुमार बोरठाकुर ने बीबीसी से कहा, "अजमल अली 1971 में पास के अली नगर गाँव से आकर गोपाल नगर में बस गए थे. वे बहुत ही मिलनसार और लोगों की मदद करने वाले व्यक्ति थे. अजमल अली के पाँच बेटे और दो बेटियाँ हैं. दो बड़े भाइयों के बाद तीसरे नंबर पर बदरुद्दीन आते हैं."
"अजमल अली शुरू-शुरू में खेती करते थे लेकिन बाद में वे इत्र बनाने वाली अगर की लकड़ी का कारोबार करने लगे. इलाके में लोग उन्हें अजमल सेठ बुलाते थे. धीरे-धीरे जब यहाँ इस कारोबार में उन्हें सफलता मिली तो वे मुंबई चले गए और वहाँ इत्र का एक बड़ा कारोबार खड़ा कर दिया."
इस समय दुबई समेत खाड़ी के करीब सभी देशों में अजमल के इत्र के बड़े शोरूम है. अजमल ने लंदन और अमेरिका के शहरों में अजमल परफ़्यूम के आधुनिक शोरूम खोले हैं. इत्र के व्यापार के अलावा अजमल ने रियल एस्टेट से लेकर चमड़ा उद्योग, स्वास्थ्य सेवाएं, कपड़ा उद्योग और शिक्षा जगत में बड़ा कारोबार फैला रखा है.
ख़सरूल इस्लाम कहते है, "इत्र बनाना और बेचना बदरुद्दीन साहब का खानदानी पेशा है जिसे वे पिछले 60 साल से कर रहे हैं. शुरुआती दिनों में वे व्यापार ही संभालते थे और अपने दादा-पिता की तरह समाज के कमज़ोर तबके के लोगों की मदद करते थे. उनसे पहले उनके परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं था."

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समाज-सेवा
वे कहते हैं, "बदरुद्दीन ने 1982 में मरकाजुल मारीफ नाम से एक सामाजिक संगठन बनाया. उसके बाद हाजी अब्दुल मजीद मेमोरियल पब्लिक ट्रस्ट के अंतर्गत 1995 में हाजी अब्दुल मजीद मेमोरियल पब्लिक अस्पताल बनवाया जिसके उद्घाटन के लिए मदर टेरेसा आईं थीं. इस अस्पताल में आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों का मुफ़्त इलाज किया जाता है."
अजमल फाउंडेशन के तहत होजाई में अभी कुछ साल पहले "अजमल सुपर 40" नामक एक योजना की शुरुआत की गई है जहाँ किसी भी धर्म के ग़रीब और पिछड़े मेधावी छात्रों को इंजीनियरिंग और मेडिकल में प्रवेश की तैयारी करवाई जाती है. हर साल 40 मेधावी लड़के और 40 लड़कियों का चयन किया जाता है और उनका सारा खर्च अजमल फाउंडेशन उठाता है.

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बीजेपी कर रही हमले
होजाई शहर में स्थित अजमल फाउंडेशन के कार्यालय में प्रवेश करते ही सामने दीवार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बड़ी तस्वीर लगी दिख जाती है जिसमें बदरुद्दीन अजमल और उस समय लोकसभा सांसद रहे उनके भाई सिराजुद्दीन अजमल प्रधानमंत्री के साथ खड़े है.
उसके ठीक बाईं तरफ दूसरे कमरे की दीवार पर बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा सरमा की तस्वीर टंगी है उस तस्वीर में मौलाना अजमल भी साथ खड़े है. लेकिन इस साल बीजेपी उनपर आक्रमक रही है.
ऐसे में इस बार का चुनाव बदरुद्दीन के लिए अबतक का सबसे बड़ा चुनाव साबित हो सकता है.

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विवादों से नाता
बदरुद्दीन अजमल के हाल के बयानों ने भी कई विवाद खड़े किए हैं.
2019 के लोकसभा चुनाव से पहले बदरुद्दीन ने एक पत्रकार के साथ अभद्रता करते हुए कहा था, "चले जाओ, मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूंगा. मेरे ख़िलाफ़ मामला दर्ज करो. मेरे पास अदालत में मेरे आदमी हैं. आप ख़त्म हो जाएंगे." इस व्यवहार के बाद उनकी बहुत आलोचना हुई. घटना के कुछ समय बाद ही बदरुद्दीन ने मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए है सभी पक्षों से माफ़ी मांग ली थी.
इसके अलावा तीन तलाक बिल का विरोध करते हुए मौलाना अजमल ने संसद में मुसलमानों के लिए 'आतंकवादी' शब्द का प्रयोग किया था. उन्होंने कहा था कि "मुसलमानों में जो लोग तीन तलाक को ग़लत मानते हैं, वह सलफी मसलक (सुन्नी मुसलमानों में मौजूद विचारकों का एक धड़ा) के लोग हैं, वह तो आतंकवादी हैं."
मौलाना के इस बयान के बाद मुसलमानों के अलग-अलग मसलक के धर्म गुरुओं और विद्वानों ने बदरुद्दीन पर सख्त टिप्पणी करते हुए उनके बयान की निंदा की, जिसके बाद उन्हें लिखित माफ़ी मांगनी पड़ी. बदरुद्दीन ने असम सरकार के 2 बच्चों से ज़्यादा होने पर सरकारी नौकरी नहीं मिलने के एक फ़ैसले को बकवास बताते हुए कहा था कि असम सरकार के नए मानदंड के बावजूद मुसलमान बच्चे पैदा करते रहेंगे.
उनके इस बयान की कड़ी आलोचना की गई. इससे पहले 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान भी बदरुद्दीन ने पत्रकारों के समक्ष कहा था कि अगर राज्य में बीजेपी एक भी सीट जीतती है तो "अल्लाह किसी को भी माफ़ नहीं करेगा और बीजेपी को हराना हर मुसलमान का कर्तव्य है." इस बयान के बाद असम के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के लिए उन्हें नोटिस भेजा था.
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो 2016 में असम की सत्ता में बीजेपी आने के बाद बदरुद्दीन की पार्टी का प्रदर्शन लगातार ख़राब हुआ है. इसके पीछे आँकड़े भी हैं जो इस बात की गवाही देते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में जब पूरे देश में नरेंद्र मोदी की लहर थी उस समय भी एआईयूडीएफ ने प्रदेश की 14 लोकसभा सीटों में से तीन सीटें जीती थी लेकिन उसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में बदरुद्दीन की पार्टी से महज 13 विधायक ही जीते जबकि 2011 में उनके 18 विधायक थे. इस तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में बदरुद्दीन केवल अपनी सीट बचा पाए थे.

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असम में मुस्लिम आबादी
2011 की जनगणना के मुताबिक असम में मुसलमानों की आबादी क़रीब 34 फ़ीसद है.
असम में बंगाली मुसलमानों के राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए अलग राजनीतिक पार्टी बनाने का इतिहास पुराना है.
पहली बार 1977 में ईस्टर्न इंडिया मुस्लिम एसोसिएशन नाम की राजनीतिक पार्टी बनाई गई थी. लेकिन 1979 में शुरू हुए असम आंदोलन के कारण यह पार्टी असम की राजनीति में टिक नहीं सकी.
इसके बाद 1985 में भी यूनाइटेड माइनॉरिटी फ्रंट (यूएमएफ) नाम से असम में मुसलमानों के राजनीतिक एकीकरण के लिए जो एक अलग राजनीतिक मंच बनाया गया था उसमें भी जमीयत की सक्रिय भूमिका थी. हालाँकि बाद में ये सारे नेता काँग्रेस में शामिल हो गए.
बदरुद्दीन को राजनीति में उतरे 15 साल से अधिक समय हो गया है लेकिन इतने सालों में उनकी पार्टी की राजनीति बंगाली मुसलमानों के इर्द-गिर्द ही रही.
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