कोरोना वायरस: क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास लॉकडाउन ही एकमात्र रास्ता था? -नज़रिया

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- Author, प्रोफेसर संजय कुमार
- पदनाम, सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़
इस समय जब भारत कोरोना वायरस जैसे संकट से जूझ रहा है तो ये सवाल काफ़ी बेमानी है कि क्या लॉकडाउन किया जाना ही एक मात्र विकल्प था.
लेकिन ये सवाल पूछा जा रहा है. और इसका जवाब आसान है - हाँ, लॉकडाउन ही एकमात्र विकल्प था.
मगर लॉकडाउन के कुछ दिनों के अंदर ही जिस तरह की अफ़रा-तफ़री का माहौल देखा गया. उसके बाद एक सवाल खड़ा होता है कि क्या अचानक से पूरी तरह लॉकडाउन किया जाना ही एकमात्र विकल्प था?
क्या हम पूर्ण लॉकडाउन का एलान करने से पहले प्रवासियों खासकर रोज कमाने खाने वाले कामगारों को कुछ दिनों पहले अग्रिम नोटिस नहीं दे सकते थे जिससे वे इच्छा होने पर गांव जाने की व्यवस्था कर पाते.
और क्या सरकार को उन सभी कदमों और योजनाओं के बारे में घोषणा नहीं करनी चाहिए थी जिसके तहत सरकार ने लॉकडाउन के दौरान दिहाड़ी मजदूरों की रोजाना की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में काम करती?

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लॉकडाउन का उद्देश्य और ग़रीब मजदूर?
कोई ये तर्क दे सकता है कि अगर लोगों को उनके घरों को जाने की इजाज़त दी जाती तो लॉकडाउन का मकसद ही ख़त्म हो सकता था क्योंकि ऐसा होने पर ज़्यादा से ज़्यादा लोग तुरंत अपने गांव जाने की कोशिश करते.
अपने घर जाने की जल्दबाजी में वे भीड़ भरी बसों और ट्रेनों में सफर करते. लेकिन संपूर्ण लॉकडाउन के एलान के बाद हमने जो देखा वो इससे भी बुरा था.
लाखों ग़रीब लोग अपने गाँव तक जाने वाले वाहन मिलने की उम्मीद में पैदल चलते रहे.
इस कोशिश में कुछ मजदूरों ने पानी की टंकियों और दूध की टंकियों में भी सवारी की.
अगर सरकार इन प्रवासी मजदूरों के लिए शहर में ही रहने और खाने की कोई व्यवस्था कर देती तो ये उम्मीद होती कि कई मजदूर घर जाने के लिए इतने परेशान न होते और स्थिति इतनी ख़राब न होती.

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घर जाने के लिए परेशान क्यों हुए मजदूर?
मजदूरों और कामगारों के बीच अपने गाँव जाने को लेकर जो अफ़रा-तफ़री की स्थिति पैदा हुई उसके लिए कई वजहें ज़िम्मेदार हैं.
कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि सड़क पर लाखों प्रवासियों की मौजूदगी से एक असहज स्थिति पैदा हुई.
प्रशासन को इसे संभालने में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा,
और इन स्थितियों को पैदा करने में अलग-अलग तरह की अफवाहों की एक बड़ी भूमिका थी.
ये स्वाभाविक है कि जो लोग अपने घरों की ओर जाने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, उनमें से ज़्यादातर प्रवासी मजदूर थे.

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दिहाड़ी मजदूर
ये लोग ऐसे काम करते हैं जिनमें उन्हें रोज की आमदनी होती है.
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) का अध्ययन बताता है कि बड़े शहरों में कमाने - खाने वाली आबादी में से 29 फीसदी लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं.
वहीं, उपनगरीय इलाकों की खाने-कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूर 36 फीसदी हैं.
गाँवों में ये आंकड़ा 47 फीसदी है जिनमें से ज़्यादातर खेतिहर मजदूर हैं.
दिल्ली की बात करें तो यहां की कमाने वाली आबादी में दिहाड़ी मजदूर 27 फीसदी हैं.
लेकिन दिल्ली की दो करोड़ की आबादी में 27 फीसदी का मतलब एक बहुत बड़ी आबादी से है.

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लॉकडाउन के लिए कितने तैयार थे मजदूर?
लॉकडाउन की वजह से काम नहीं मिलने के कारण इनमें से ज़्यादातर मजदूरों के हाथ और जेबें एक तरह से खाली थीं. ऐसे में ये मजदूर गाँव जाना चाहते थे क्योंकि वहां शहरों के मुकाबले बेहतर सामाजिक संबंध और सामुदायिक जीवन होता है जो कि उनके गुजर-बसर के लिए बेहतर संभावनाएं दिखाता है.
इन दिहाड़ी मजदूरों के पास ऐसी समस्या का सामना करने के लिए कोई बचत नहीं थी. वहीं, भारतीयों की आमदनी के लिहाज़ से बचत की विशेष ज़्यादा क्षमता नहीं होती है.
सीएसडीएस के एक अध्ययन में सामने आया है कि भारत में सिर्फ 15 फीसदी व्यस्कों ने माना कि घरखर्च के बाद उनके पास बचत करने की संभावना रहती है. वहीं, 32 फीसदी भारतीयों ने माना कि उनकी आमदनी ठीक ठाक है और घर का खर्च उठाने में भी समर्थ हैं लेकिन वे बचत करने में समर्थ नहीं हैं.
मगर इस वर्ग ने ये माना कि उन्हें किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता है. लेकिन पचास फीसदी लोगों ने ये माना कि उन्हें अपनी आमदनी के मुक़ाबले अपनी पारिवारिक और घरेलू खर्चों को करने में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
अगर ये भी मान लें कि इन आंकड़ों में कम भारतीय शामिल हों फिर भी ये आंकड़े बताते हैं कि दिहाड़ी मजदूर बचत करने में सक्षम नहीं हैं. और ऐसी स्थितियों में रोज़ाना काम नहीं मिलने की स्थिति में वे खाने से लेकर दूसरी आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाते.

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आश्वासन और विश्वास
तमाम राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों की ओर से रहने और खाने को लेकर दिए जा रहे आश्वासनों के बावजूद बड़ी संख्या में ग़रीब मजदूर अभी भी अपने गांव वापस लौटना चाहते हैं. क्योंकि उनके मन में अभी भी लॉकडाउन को लेकर एक अनिश्चितता का भाव है कि ये लॉकडाउन कब ख़त्म होगा.
जबकि फिलहाल कोई स्पष्टता से ये नहीं कह सकता है कि ये महामारी कब ख़त्म होगी. लेकिन सरकार ने आधिकारिक रूप से लॉकडाउन के 14 अप्रैल से आगे नहीं बढ़ने को लेकर स्थिति साफ की है. और ये एक बेहतर कदम है.
हालांकि, सरकार ज़रूरत पड़ने पर लॉकडाउन को आगे भी बढ़ा सकती है. मगर सरकार की ओर से आए इस संदेश ने अफरा - तफरी के माहौल में कमी की है. कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता है कि कोरोना वायरस से उपजे संकट को संभालने के लिए लॉकडाउन से बेहतर कोई विकल्प नहीं था.
बाज़ारों, स्कूलों, कॉलेज, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक परिवहन, दफ़्तरों समेत सार्वजनिक स्थानों को बंद करने से सोशल डिस्टेंसिंग के उपाय को अमल में लाने में मदद मिली. लेकिन भारत के ज़्यादातर घरों में सोशल डिस्टेंसिंग की बात कहना आसान है जबकि इसे अमल में लाना मुश्किल है.

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भारत में सोशल डिस्टेंसिंग कितना मुमकिन?
साल 2011 की जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 37 फीसदी से ज़्यादा भारतीय एक कमरे के घरों में रहते हैं. वहीं, 32 फीसदी भारतीय दो कमरों के घरों में रहते हैं. लेकिन असली में ये एक या दो कमरों के घर ज़्यादातर झुग्गियां और झोपड़ियां होती हैं.
इनमें औसतन 5-6 लोगों वाले मध्य और निम्न आयवर्ग वाले परिवार रहते हैं. ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग की बात कागजों में की जा सकती है लेकिन इसे अमल में लाना तकनीकी रूप से संभव नहीं है. यहां ये नहीं भूलना चाहिए कि साल 2011 की जनगणना ये भी बताती है कि भारत में चार फीसदी लोग ऐसे हैं जो कि बेघर हैं.
ऐसी स्थिति में जब सभी लोगों से घरों के अंदर रहने को कहा जा रहा है, ऐसे में इन बेघरों के सामने एक सवाल है कि एक अदद छत कहां से लाई जाए. इनमें से कुछ सवालों के जवाब दिए जाने आसान नहीं हैं.

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इस तरह की आपातकालीन स्थितियों को संभालने के लिए काफ़ी सीमित विकल्प होते हैं और लोगों को ये नहीं पता होता है कि किस विकल्प को इस्तेमाल किया जाए और किसे छोड़ दिया जाए.
लेकिन ये निश्चित है कि इस अनुभव ने हमें ये सोचने और योजना बनाने के लिए अवसर दिया है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से कैसे निपटा जाए.
इस माहौल में हम सभी को हाथ से हाथ मिलाकर कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ इस लड़ाई में कदम उठाने की ज़रूरत है.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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