कोरोना वायरस: भारत में वर्क फ़्रॉम होम कितना सफल, क्या हैं दिक़्क़तें

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    • Author, निधि राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

43 साल की पूर्वी शाह दो बच्चों की मां हैं और लगभग दो दशकों से पब्लिक रिलेशंस के क्षेत्र में काम करती हैं.

उनका काम ऐसा है कि दिन भर लोगों से मिलना होता है और फ़ोन पर लोगों से संपर्क में रहना होता है. उन्हें बहुत ज़्यादा यात्राएं करनी पड़ती हैं और अलग-अलग प्रॉजेक्टों में काम करना होता है. भले ही यह काम कई बार काफ़ी बोझिल बन जाता है लेकिन उन्हें इससे निपटने की आदत रही है.

लेकिन अब पूर्वी को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है. वो उन भारतीयों में से एक हैं जिन्हें कोरोना वायरस के कारण घर से काम करना पड़ रहा है. वह वर्क फ्रॉम होम कर पा रही हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि यह काफ़ी चुनौतीपूर्ण है और इससे उनकी क्षमता भी प्रभावित हो रही है.

वह कहती हैं, "घर पर बच्चे हैं और उनके रहते काम करना मुश्किल होता है. मुझे उनके सोने का इंतज़ार करना होता है. अपनी प्रेज़ेंटेशन तैयार करने के लिए मुझे देर रात तक काम करना पड़ता है." उन्हें टीम के सदस्यों और अपने क्लाइंट्स के साथ आमने-सामने होने वाली मीटिंग की भी कमी खल रही है.

वो कहती हैं कि साथ बैठकर बात करना ज़्यादा सार्थक होता है, वीडियो कॉलिंग के ज़रिए हमेशा सही नतीजे नहीं मिलते. वह कहती हैं, "मैंने घर के काम में हाथ बंटाने के लिए कुछ लोग रखे हुए हैं. लेकिन जब मैं घर पर होती हूं तो वे हर काम मुझसे पूछकर करते हैं. इससे परेशानी होती है."

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एकांत भी खल रहा...

शाह कहती हैं, "बच्चे घर पर हों और उनके पास करने के लिए कुछ न हो तो तो ये भी एक चुनौती है. बच्चों के लिए स्केटिंग, पेटिंग और डांस जैसी एक्टिविटी के लिए टीचर रखे थे लेकिन अब उसमें भी मुश्किल हो रही है. बच्चों को दिन भर टीवी देखने या गेम खेलने नहीं दे सकती. लेकिन जब मुझे लंबे समय तक फ़ोन पर बात करनी होती है तो कई बार उन्हें टीवी या मोबाइल इस्तेमाल करने देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता."

संग्राम खोपाडे पुणे में बिग एफ़एम में आरजे हैं और वह अपने स्टूडियो न जाने पाने को मिस कर रहे हैं. उनकी पत्नी डॉक्टर हैं और उन्हें अतिरिक्त समय तक काम करना पड़ रहा है. संग्राम घर पर अधिकतर समय अकेले होते हैं. लोगों के साथ काम करना और लोग आसपास हों तो उन्हें क्रिएटिव विचार लाने में मदद मिलती है.

वह कहते हैं, "मैं बातचीत करना पसंद करता हूं. टीम के साथ बैठता हूं और अपने शो के लिए नए नए विचारों पर काम करता हूं. अब हम वीडियो और फोन कॉल के ज़रिए बात कर रहे हैं जिसमें मज़ा नहीं आ रहा. इससे मैं फ्रस्ट्रेट हो रहा हूं. रेडियो स्टेशन के अंदर एक माहौल होता है. म्यूज़िक होता है, मेहमान आ-जा रहे होते हैं, आख़िरी दौर में शो एडिट करना होता है. अब सब कुछ बदल गया है."

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रिमोट वर्किंग का लिटमस टेस्ट

कोरोना वायरस के पहले भी बहुत सारे भारतीय वर्क फ्रॉम होम ऑप्शन को आज़माना चाहते थे. लेकिन अब कंपनियों को मजबूरन लाखों कर्मचारियों को घर से काम करने के लिए कहना पड़ा है. यहां तक कि सरकारी अधिकारी भी कंपनियों से ऐसा करने के लिए कह रहे हैं.

गुरुग्राम में कॉरपोरेट ऑफिसों से कहा गया है कि वे अपने कर्मचारियों को 31 मार्च तक घर से काम करने के लिए कहें. यह आदेश डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट की ओर से आया है. यह उन कंपनियों के लिए एक तरह से परीक्षण है, जो रिमोट वर्किंग को आज़माना चाहती थीं कि इसके नतीजे कैसे होते हैं.

जिन प्रमुख कंपनियों ने अपने कर्मचारियों से घर से काम करने के लिए कहा है, उनमें कॉन्गनिज़ंट, पेटीएम, टाटा कंसल्टंसी सर्विसेट (TCS), एचसीएल टेक्नॉलजीज़, नियरबाई, विप्रो, ट्विटर इंडिया, एमजॉन और स्नैपडील भी हैं.

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घर से काम करने की सुविधा

एक स्टाफ़िंग कंपनी एक्सफ़ीनो की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार वर्क फ्रॉम होम के ज़रिए आसानी से काम करना हो तो उद्योगों को चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है. एक्सफ़ीनो के सहसंस्थापक कमल करांत इस रिपोर्ट के लेखक थे.

वह बताते हैं, "उत्पादन, खनन, स्वास्थ्य, होटल, ट्रैवल और उड्डयन जैसे क्षेत्रों को घर से काम करने के लिए काफ़ी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है. लॉजिस्टिक्स और रीटेल को थोड़ा कम संघर्ष करना पड़ता है. बैंकिंग,फ़ाइनैंशियल सर्विसेज, मीडिया, एजुकेशन, आईटी, ईकॉमर्स और टेलिकॉम सेक्टर्स को मध्यम स्तर की दिक्कतें होती हैं.आईटी प्रॉडक्ट और कंसल्टिंग सर्विसेज के लिए रिमोट वर्किंग सबसे आसान है."

डीलशेयर के सीईओ और संस्थापक विनीत राव कहते हैं कि उनकी कंपनी और उनके लिए वर्क फ्रॉम होम में शिफ्ट करना अच्छा रहा.

वह कहते हैं, "हमारे कर्मचारी टेक्नॉलजी से काफ़ी सहज हैं और हमारी प्रकियाएं भी तकनीकी रूप से इसके अनुरूप हैं. इससे हमारे कर्मचारी घर पर बैठकर दूर से ही काम कर सकते हैं और इससे हमारी क्षमता पर भी ख़ास नकारात्मक असर नहीं पड़ता."

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लेकिन कुछ कंपनियां, जो इस ऑप्शन को इस्तेमाल कर सकती हैं, उनके पास सही सेटअप नहीं है. वे खुद को नए बदलाव के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रही हैं और नाकाम भी हो रही हैं.

एक अग्रणी आईटी सर्विस मैनेजमेंट कंपनी गार्टनर के अनुसार, भारत की 54 प्रतिशत कंपनियों के पास ऐसा सिस्टम और तकनीक नहीं है कि वे अपने कर्मचारियों से घर से काम करवा सकें. आधे से ज्यादा आईटी सेक्टर रिमोट वर्किंग के लिए इंतज़ाम नहीं कर पाया.

कार्टनर में सीनियर डायरेक्टर अडवाइज़री सैकत चैटर्जी कहते हैं, "एक तरह से मजबूरन हमें दुनिया के सबसे बड़े वर्क फ्रॉम होम एक्सपेरिमेंट में शामिल होना पड़ा है अभी तक बहुत सारी कंपनियों के लिए इसमें ढलना आसान नहीं रहा है."

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भरोसे का सवाल

भरोसे की कमी भी एक बड़ी चुनौती है. टीमलीज़ सर्विसेज के को फ़ाउंडर रितुपर्णा चक्रवर्ती कहते हैं, "बहुत से लोग वर्क फ्रॉम होम को सही नहीं समझते. वे कर्मचारियों की मंशा और काम की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हैं."

सोनाली रमैया रोर मीडिया एंड पीआर की संस्थापक हैं. वह कहती हैं, "ताज़ा हालात को देखें तो कंपनियों के पास अधिक विकल्प नहीं हैं. आधुनिक तकनीक का समझदारी से इस्तेमाल करके ही वे कर्मचारियों की परफॉर्मेंस पर नज़र रख सकते हैं."

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घर से काम के लिए क्या ज़रूरी

अरुण चिटनिस पिछले 13 सालों से पीआर इंडस्ट्री में हैं और अपने करियर में अधिकतर समय उन्होंने घर से ही काम किया है.

वह कहते हैं, "अधिकतर घरों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन और वाई फाई है. लेकिन मेरे यहां दो बैकअप इंटरनेट कनेक्शन है ताकि एक बंद हो जाए तो दूसरा तो रहे. मैंने बहुत पहले एक पर्सनल कंप्यूटर लिया था. बिजली जाने पर यह इन्वर्टर पर काम करता है. मैं जरूरी डेटा को हार्ड ड्राइव और क्लाउड दोनों जगह बैकअप रखता हूं."

आज सही से व्रक फ्रॉम होम करना हो तो सही सॉफ़्टवेयर, हार्डवेयर और अच्छी कनेक्टिविटी के साथ-साथ बिजली का बैकअप और क्लाउड स्पेस चाहिए होता है. इसके लिए अच्छा खासा निवेश करना पड़ता है. बहुत सारी कंपनियों ने ऐसा इंतज़ाम अपने दफ़्तरों के लिए तो किया है लेकिन वर्क फ्रॉम होम में शिफ़्ट होने के कारण उन्हें नए विकल्पों पर विचार करना पड़ रहा है.

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कॉरपोरेट जगत

छवि डांग कॉम सूत्रा की प्रमुख हैं.

वह कहती हैं, "मेरी टीम ख़ुश है कि मीटिंग के लिए उन्हें सफ़र नहीं करना पड़ रहा. लेकिन वे घर पर फंसकर तंग आ गए हैं. अगर हम चाहते हैं कि वर्क फ्रॉम होम आगे भी जारी रहे तो इसके लिए अनुशासन चाहिए होगा. मैं सुनश्चित करती हूं कि टीम के लोग 10 बजे से लेकर 6 बजे तक निजी काम न करें. मैं ऐसे ही काम करती हूं जैसे ऑफ़िस में हूं."

उन्होंने अपनी कंपनी में नौकरी पर रखने की प्रक्रिया में कुछ बदलाव किए हैं. वह कहती हैं, "हायर करते समय हम लोगों से पूछते हैं कि उनके पास लैपटॉप, इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन है या नहीं. इससे हमें कर्मचारियों के लिए अलग से उपकरण ख़रीदने में ख़र्च नहीं करना पड़ता."

भले ही भारत का कॉरपोरेट जगत रिमोट वर्किंग की ओर बढ़ रहा है, फिर भी बहुत सारे सेक्टर इस विकल्प को इस्तेमाल नहीं कर सकते. जैसे भारत का अनौपचारिक सेक्टर, जो देश की कुल वर्कफ़ोर्स का 90 फ़ीसदी है. दिहाड़ी और सूक्ष्म कारोबारों में लगे लोगों को तो रोज़ घर से निकलकर काम पर जाना ही होगा.

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