औरतें किस एक चीज़ से आज़ादी चाहती हैं? #DigitalTrashbin

- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बिहार और राजस्थान से लौटकर
किस एक चीज़ से औरतों को आज़ादी चाहिए?
इस सवाल का सबसे सही जवाब ये होगा कि हवा में इस कदर आज़ादी घुले कि औरतों से ये सवाल ही न पूछना पड़े.
लेकिन हवाओं ने भी अपने-अपने आंगन और बरामदे चुने हुए हैं. आंगन में बैठी औरतों के पसीने से भीगे बदन और बड़े कपड़ों से छिपाकर सूखते छोटे कपड़ों तक वो हवा नहीं पहुंच पाती, जिसकी अहमियत बरामदे में लुंगी-बनियान पहनकर बैठे कुछ मर्दों को पता नहीं होती.
जब आज की हवाएं हक़ीक़त से यू महरूम हैं तो ये सवाल पूछना लाज़िमी है कि किस एक चीज़ से औरतें आज़ादी चाहती हैं.
बीबीसी हिंदी की सिरीज़ डिजिटल ट्रैशबिन (डस्टबिन) लेकर हम यही जानने निकले. बिहार में राघोपुर और बेगूसराय का बीहट. राजस्थान में टोंक और अलवर.
लेकिन क्या कुछ ऐसा पता चला जो शायद आपके या हमारे लिए नया हो? जवाब है- हां. हमें पता चला कि बंदिशें इस कदर बैठ गई हैं कि अब भी कुछ औरतों को नहीं पता कि आज़ादी असल में है क्या... वो जो 1947 में मिली थी?

लालू प्रसाद यादव का गढ़ राघोपुर
माथे की मांग में संतरी सिंदूर, आसमानी रंग की साड़ी और बेहद पतला शरीर.
इंदु देवी जब काग़ज़ में फेंकने के लिए एक चीज़ लिखने खड़ी हुईं तो माइक में उनकी वो आवाज़ भी आ रही थी, जिसमें वो एक-एक अक्षर को जोड़कर एक शब्द और फिर पूरा वाक्य लिख रही थीं.
'ल.ड़.की, लड़की... हमको गुस्सा आता था इतना बच्चा पैदा करने में. लड़का के चलते लड़की की संख्या ज़्यादा बढ़ गया.'
'औरत मां का रूप होती है' वाले समाज में जब एक औरत को बार-बार मां बनने में तकलीफ होने लगे तो इंदु देवी की ये बात जनसंख्या पर लगाम पाने के विज्ञापनों और दावों का मखौल उड़ाती नज़र आती है.
लेकिन क्या इंदु अकेली हैं? नहीं राघोपुर की ऐसी कई आवाज़ें हैं जिसका हम सब तक पहुंचना बेहद ज़रूरी है.
पटना से राघोपुर के पीपा पुल पहुंचने से ठीक पहले का रास्ता काफी संकरा था.
रास्ते में खड़े टैम्पू में अभिनेत्रियों के क्लीवेज वाले पोस्टर लगे हुए थे. लगा कि हम में से ज़्यादातर को कम कपड़ों में लड़कियां सिर्फ़ पोस्टर्स तक ही अच्छी लगती हैं. लिबास पोस्टर से बाहर न आ पाए. वैसे भी पोस्टर फटता है तो निकलता हीरो है, हिरोइन नहीं. हैं न?
'मेरा बेटी जींस पहनता है तो आप लोगों को क्यों बुरा लगता है.'
'मर्द जींस क्यों' लिखकर ट्रैशबिन में फेंकने से पहले जब एक औरत अपनी ये बात कह रही होती हैं तो वो साड़ी के पल्लू से अपना 'दिख रहा' पेट ढकती हैं.
उस औरत के सामने तीन लोग थे. एक-स्थानीय लोग. दूसरा- कैमरा. तीसरा- वो समाज जिसे आपने-हमने बनाया है. घूरने वाला समाज़.
साल के छह महीने दुनिया को पीपा पुल से जोड़ने वाले राघोपुर की औरतें सिर्फ़ इसी से आज़ादी नहीं चाहती हैं. और भी कई चीज़ें हैं, जिन्हें अपनी ज़िंदगी से भस्म कर देना चाहती हैं लड़कियां.
- यह भी पढ़ें:- #HerChoice जब औरतें अपनी मर्ज़ी से जीती हैं

खाना बनाना: स्कूल के लिए लेट हो जाते हैं. मास्टर साहब गुस्सा करते हैं. इसलिए हम पढ़ने में अथि हैं.
लंबे बाल: चोटी करो, जूड़ा बनाओ, तेल लगाओ. नहीं पसंद बड़े बाल.
खेत में शौच: खेत में जाते हैं तो आसपास का आदमी देख लेता है.
छेड़खानी: लड़का सब गंदा-गंदा गाना गाने लगता है तो मम्मी-पापा मना करता है.
शराब: शराबबंदी तो हो गया लेकिन अब भी शराब मिलता है.
इन लड़कियों की बातों पर प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ''ये औरतें सिर्फ़ बाल और कपड़े की बात नहीं करती हैं. ये उस दास्तां को उखाड़ फेंकने की बात करती हैं जिस दास्तां में वो सदियों से हैं. हमको उस दास्तां से आज़ादी चाहिए जो पितृसत्ता ने थोपी है. दिशा और उद्देश्य साफ़ है. ये जनतांत्रिक विकास है. हमें ऐसी आवाज़ों का जश्न मनाना चाहिए.''
परिवर्तन के जिन संकेतों की बात प्रोफेसर चौधरी ने की, उसके कई साइन बोर्ड हम ट्रैशबिन के अगले पड़ावों में भी नज़र आए.
- यह भी पढ़ें:- रात नौ के बाद मर्द न निकलें तो लड़कियां क्या करेंगी?

कवि दिनकर की धरती बेगूसराय
'औरतहूं के आज़ादी चाही, ऊ तs पहिलहीं आदमी के ग़ुलाम बनवले हs'
ट्रैशबिन पर लिखी पंचलाइन पर बेगूसराय के एक होटल का सिक्योरिटी गार्ड ये 'पंच' देकर हँसने लगता है. इसके जवाब में मुझे वहीं से कुछ दूरी पर पैदा हुए रामधारी सिंह दिनकर की कविता याद आती है.
'औरतें कहतीं भविष्यत की अगर कुछ बात, नर उन्हें डायन बताकर दंड देता है. पर, भविष्यत का कथन जब नर कहीं करता, हम उसे भगवान का अवतार कहते हैं.'
यथार्थ में ज़्यादा कविता नहीं घुसेड़नी चाहिए. चीज़ें शायद जटिल हो जाती हैं.
आसानी से इस बात को समझाने के लिए बीहट के मैदान में कबड्डी-कबड्डी करती हुई एक लड़की कैमरे पर आती है और इसी कविता को आसान भाषा में समझा जाती है.
'भेदभाव को ट्रैशबिन में डालना है. लड़की है तो घर में बैठेगी और लड़का है तो बाहर घूमेगा.'
ये उस भूमिहार बहुल इलाके की लड़कियां हैं, जो कभी लेफ़्ट का गढ़ रहा था. यहां की लड़कियां कबड्डी खेलकर देश और दुनिया में नाम कमाकर ये साबित कर रही हैं कि आज़ादी सिर्फ़ 1947 में मिली हुई चीज़ का नाम नहीं है.
लेकिन शायद ये आज़ादी छीनी हुई थी और सभी लड़कियां ये हिम्मत नहीं कर पाई थीं.
ट्रैशबिन कई और बेड़ियों से भरता जा रहा था, जिन्हें ये लड़कियां तोड़ देना चाहती थीं.
- यह भी पढ़ें:- #100Women -आधी आबादी के सौ चेहरे

एक बच्ची असुरक्षा को ट्रैशबिन में डालना चाहती थी. लेकिन पहली कोशिश में असुरक्षा सही से लिख नहीं पा रही थी. लगा कि हर महसूस की हुई चीज़ लिखी नहीं जा सकती.
रोज़ी ख़ातून को दंगों से आज़ादी चाहिए थी और मंटुस कुमारी को आतंक से, क्योंकि इसकी वजह से देश के सैनिक मारे जाते हैं.
एक बच्ची की पर्ची ट्रैशबिन में डाली नहीं जा सकी. ये बच्ची ट्रैशबिन में बाल विवाह को फेंकना चाहती थी, लेकिन कुछ दिनों में खुद के बाल विवाह की तारीख़ क़रीब आने से वो उस रोज़ घर से नहीं निकल सकी.
उस बच्ची की आज़ादी की आवाज़ उसी घर में रह गई, जहां से अब वो खुद ट्रैशबिन से कुछ गुना बड़ी डोली से विदा होगी. अपनी आवाज़ को पर्दों में दबाए हुए.
सुंदरता: काला रहे या गोरा. हमको सुंदरता से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए.
गंदी सोच: समाज के लोग बोलते हैं- लड़की है छोटा-छोटा निक्कर पहनी है, बेशर्म है.
मारपीट: औरतों को मारा जाता है, इससे आज़ादी चाहिए.
पटना यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर सुनीता रॉय इन बच्चियों की ट्रैश की हुई चीज़ों को पढ़कर धीरे से मुस्कुराती हैं.
वो कहती हैं, ''साहित्य और पौराणिक समय में भी औरतों को एक वस्तु से ज़्यादा कभी नहीं समझा गया. महाभारत में द्रौपदी के साथ भी यही हुआ.''
प्रोफ़ेसर रॉय कहती हैं, ''एक घटना आपको बताती हूं. एक औरत को उसका पति जुए में हार गया. दूसरा आदमी जब लेने आया तो औरत डंडा लेकर दौड़ गई कि तुमने क्या मुझे द्रौपदी समझ रखा है. आज की औरत, द्रौपदी जितनी कमज़ोर नहीं कि उसके बाल पकड़कर कोई भी कहीं ले जाए.''
बेगूसराय से लौटते हुए कार में एक फ़िल्मी गाना बजता है, 'ये मौसम गया, वो मौसम भी गया. अब तो कहो फिर कब मिलोगे? मिलेंगे जब हां...हां...हां बारिश होगी.'
ट्रैशबिन में फेंकी चीज़ों को देखकर औरतों के संदर्भ में आज ये गाना कुछ बदला नज़र आता है. 'ये मौसम भी गया, वो मौसम भी गया. आज़ादी भरी बारिश कब होगी?'
- यह भी चेक कीजिए:-औरतों को लेकर आपकी सोच कैसी है, चेक कीजिए

राजस्थान: आज़ादी अभी बाकी है मेरे दोस्त...
जयपुर से दो घंटे की दूरी पर टोंक का सोड़ा गांव.
स्टीरियोटाइप दिमाग़ को लगा था कि राजस्थान की औरतों से आज़ादी की बात निकलवाना काफी मुश्किल होगा.
लेकिन स्टीरियोटाइप का जन्म ही शायद इसलिए हुआ है कि कोई कभी तोड़ सके. लिहाजा हमारा भी टूटा. राजस्थान की बच्चियां और औरतें इतना मुखर होकर बोलीं कि हमारे वीडियो जर्नलिस्ट प्रीतम रॉय को कहना पड़ा- यार माइक का लेवल धीमा करना पड़ेगा, इन लोगों की आवाज़ काफी तेज़ है.
उस पल ये सुनकर हँसी आई थी. लेकिन अब सोचकर अच्छा लगा कि शायद पहली बार कैमरे के सामने घूंघट से निकली इन औरतों ने ऐसे अपनी बातें कहीं कि 'आवाज़ तेज़' कहलाई.
असामाजिक तत्व, औरतों का गलत इस्तेमाल. बीड़ी और.... भी कई ज़रूरी मुद्दे.
इन आवाज़ों पर समाजशास्त्री राजीव गुप्ता कहते हैं, ''ये पितृसत्तात्मक समाज की देन है, इसके ख़िलाफ़ आवाज़ अब उठनी शुरू हुई है.''
प्रोफ़ेसर गुप्ता जब पितृसत्ता वाली बात कह रहे थे, तब सर्वेंट्स क्वार्टर के अंदर से 19 साल की बिट्टू भी सिर में दुपट्टा लिए झांक रही होती है.
मैं बिट्टू के पास जाकर पूछता हूं- पितृसत्ता का मतलब जानती हो? वो ना करते हुए सिर हिलाती है.
मैं मन में कहता हूं- ये सिर और चेहरे में जो दुपट्टा तुमने लपेट रखा है न... यही पितृसत्ता है!
- यह भी पढ़ें:-औरतें यौन शोषण पर इतना बोलने क्यों लगी हैं

डर सिर्फ़ यही नहीं थमे...
बिहार की तुलना में राजस्थान की औरतें पीरियड्स पर बात करने को लेकर सहज नज़र नहीं आईं.
यहां इस बात का ज़िक्र इसलिए किया क्योंकि जिस तारीख़ में औरतें गांव में पीरियड्स पर बात करने में असहज नज़र आ रही थीं, उसी दिन भारत में बनी शॉर्ट फ़िल्म 'पीरियड- द एंड ऑफ सेंटेंस' को ऑस्कर अवॉर्ड मिला था.
हमारी इस सिरीज़ का अंतिम पड़ाव रहा अलवर. गाय की वजह से सुर्खियों में रहने वाले इस मेव बहुल ज़िले की लड़कियों की अलग चिंताएं हैं, जिन्हें वो फेंक देना चाहती हैं.
जैसे- मोबाइल, मशीन और डर... लेकिन किस वजह से? शब्द कई बार इतने ताकतवर नहीं होते कि किसी के डर को सही से बयां कर सकें.
आप खुद इस वीडियो में देखिए....
बिहार के राघोपुर, बेगूसराय और राजस्थान के सोड़ा गांव और अलवर की औरतों की आवाज़ें #DigitalTrashbin सिरीज़ के ज़रिए आप तक पहुंचीं.

इन आवाज़ों को ध्यान से सुनिएगा और अगर मन से हल्की आवाज़ भी आए तो आस-पास जो भी आपकी अपनी-परायी हों, उनसे पूछिएगा....
एक ऐसी चीज़ जो रोकती है आज़ादी की परवाज़, सुनाओ अपनी आज़ादी की आवाज़...

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)




















