प्रथम विश्व युद्धः 74,000 भारतीय सैनिकों ने अपने प्राणों की आहूति दी थी

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उस रात टिगरिस नदी का पानी किनारों से ऊपर बह रहा था. कोतलाआरा में 6 इंडियन डिविज़न घेरे में आ गई थी.
घिरे हुए सिपाही ज़िंदा रहने के लिए घोड़ों को मारकर खा रहे थे, भूख से बचने के लिए घास उबाली जा रही थी.
53वीं सिख टुकड़ी को ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी कि वो इस घेरे को तोड़े. उनके सामने 2000 गज़ का फ़ासला था जो चटियल मैदान था. कवर लेने के लिए कोई पेड़ तक नहीं था.
जब तुर्क ठिकाने तक पहुंचने के लिए 1200 गज़ रह गए थे तभी हवलदार अर्जन सिंह ने देखा कि एक ब्रिटिश अफ़सर को गोली लग गई है.
वो उन्हें अपने कंधे पर उठा कर पीछे की ओर ले गए. इसके लिए उन्हें इंडिया डिस्टिंग्विश्ड सर्विस मेडल दिया गया.
अर्जन के पोते स्क्वाड्रन लीडर राणा तेजप्रताप सिंह छीना बताते हैं कि उनके दादा को उनकी ब्रांडी ने बचाया था.
ब्रांडी सैनिकों के लंबे कोट को कहा जाता था क्योंकि वो उन्हें ब्रांडी की तरह गरम रखता था.
जब अर्जन पर फ़ायर आया, उस समय वो ब्रांडी को मोड़ कर अपनी पीठ पर लपेटे हुए थे. गोली लगने से वो गिरे ज़रूर, लेकिन गोली उनके पार नहीं जा पाई.
पंद्रह रुपये महीने की तनख़्वाह
भारतीय परिपेक्ष्य से प्रथम विश्व युद्ध की कहानी अभी तक सुनाई ही नहीं गई है. साल 1914 से 1919 तक भारत से 11 लाख सैनिक विदेश लड़ने गए.
उनमें से 74,000 कभी वापस नहीं लौटे. उनको फ़्रांस, ग्रीस, उत्तरी अफ़्रीक़ा, फ़लस्तीन और मेसोपोटामिया में ही दफ़ना दिया गया.
70,000 लोग वापस ज़रूर आए, लेकिन उनका कोई न कोई अंग हमेशा के लिए जा चुका था.
उनको 9,200 से अधिक वीरता पुरस्कार मिले जिनमें वीरता के सबसे बड़े पदक 11 विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल हैं.
इन सैनिकों के अलावा इस लड़ाई में भारत से हज़ारों धोबी, ख़ानसामे, नाई और मज़दूर भी फ़्रंट पर गए थे.
इसके अलावा भारत ने आठ करोड़ पाउंड के उपकरण और साढ़े 14 करोड़ पाउंड की सीधी आर्थिक सहायता भी युद्ध कार्यों के लिए दी.
पंजाब में इसे 'लाम' या लंबी लड़ाई कहा गया. ब्रिटेन ने पहली बार भारतीय लोगों को एक सैनिक के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया.
भारत की दृष्टि से देखा जाए तो ये एक आम आदमी की लड़ाई थी जो सिर्फ़ 15 रुपये महीने के लिए अपना घर-बार छोड़ कर विदेश लड़ने गए थे.
भारतीय ज़मीन पर ही हो गई थी पहली मौत
दिलचस्प बात ये है कि प्रथम विश्व युद्ध में पहले भारतीय की मौत न तो पश्चिमी मोर्चे पर हुई थी और न ही मेसोपोटेमिया या अफ़्रीका के बीहड़ रेगिस्तानों में.
दरअसल, युद्ध मोर्चे पर पहुंचने से पहले ही भारतीय ज़मीन पर ही कई लोगों ने जर्मनी के ख़िलाफ़ अपने प्राणों की आहुति दे दी थी.
22 सितंबर, 1914 को जर्मन युद्ध पोत 'एसएमएस एमडेन' ने चुपके से बंगाल की खाड़ी में प्रवेश कर मद्रास बंदरगाह से ढाई हज़ार गज़ दूर लंगर डाला.
उस समय मित्र देशों का कोई भी पोत मद्रास बंदरगाह की निगरानी नहीं कर रहा था.
आर के लोचनर अपनी किताब 'द लास्ट जेंटलमेन ऑफ़ द वॉर: द रेडर एक्सप्लॉएट्स ऑफ़ द क्रूज़र एमडेन' में लिखते हैं, "रात नौ बज कर बीस मिनट पर कमांडेंट कार्ल मुलर ने अपने नौसैनिकों को फ़ायर करने का आदेश दिया. एमडेन से फ़ायर किए गए गोलों ने बर्मा ऑयल कंपनी के टैंकरों में आग लगा दी."
"उनमें 5000 टन कैरोसीन का तेल भरा हुआ था. उनसे निकलने वाली आग की लपटों को रात में पूरे मद्रास में देखा जा सकता था. मुलर पूरे शहर में दहशत फैलाना चाहते थे. उनके पोत से निकले गोले मद्रास हाई कोर्ट, पोर्ट ट्रस्ट और नेशनल बैंक ऑफ़ इंडिया की इमारतों पर गिरे. बंदरगाह पर खड़ा एक व्यापारिक जहाज़ भी डुबो दिया गया."
"पाँच नाविक मारे गए और तेरह घायल हो गए. 30 मिनट तक चले इस हमले में 'एमडेन' ने कुल 130 गोले दागे. जब तक ब्रिटिश सैनिक जवाबी कार्रवाई करते, 'एमडेन' ने मद्रास छोड़ दिया था. जर्मन पोत पर दागे गए नौ गोलों में से एक भी उसे नहीं लगा."
"मद्रास पर हुए इस हमले का इतना ज़बरदस्त असर हुआ कि तमिल शब्दकोष में एक नया शब्द जुड़ गया था 'एमडेन' जिसका अर्थ होता है हिम्मती व्यक्ति जिसका निशाना कभी नहीं चूकता."

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भारतीय सैनिकों ने पहली बार देखा था पानी का जहाज़
ये ऐसे लोग थे जिन्हें इस स्तर की लड़ाई का कोई अनुभव नहीं था. खाइयों और कीचड़ की लड़ाई, टैंक, मशीन गन और बेइंतहा ठंड, ये सब उनके लिए बेहद नया अनुभव था.
अंग्रेज़ी पत्रिका 'द वीक' की संवाददाता मंदिरा नैयर ने इस विषय पर ख़ासा शोध किया है.
मंदिरा बताती हैं, "भारतीय सैनिकों ने इतने आधुनिक हथियारों से लैस और संगठित सैनिकों से कभी लड़ाई नहीं की थी. पहली बार जब वो गए थे तो उन्हें नई राइफ़ल का आदि होने के लिए सिर्फ़ तीन चार दिन ही दिए गए थे. पहली बार इतनी बड़ी तादात में भारतीय सैनिक देश के बाहर गए थे. पहली बार उन्होंने पानी का जहाज़ देखा था."
"पहली बार वो रेफ़्रीजरेटर में रखे खाने और कलाई घड़ी से दो चार हुए थे. पहली बार उनका वास्ता विदेशी औरतों से पड़ा था. एक स्कैंडल भी हुआ था, जब एक भारतीय सैनिक ने एक फ़्रेंच महिला से शादी कर ली थी. उसने घर पर पत्र लिख कर बताया था कि इंग्लैंड के महाराजा ने उसे ऐसा करने की अनुमति दी थी."

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ख़ुदादाद ख़ाँ को मिला विक्टोरिया क्रॉस
अंग्रेज़ इस लड़ाई में भारतीय सैनिकों को कैनन फ़ॉडर यानी तोप चारे के रूप में इस्तेमाल करना चाहते थे. लेकिन उन्होंने कई जगह अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया.
उन्हें कुल मिला कर 9200 वीरता पदक मिले, जिनमें 11 सर्वोच्च वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल थे.
सैनिक इतिहासकार राणा तेजप्रताप सिंह छीना कहते हैं, "ख़ुदादाद ख़ाँ बेल्जियम में हॉलबीक के पास एक मशीन गन डिटैचमेंट के अंदर थे. जर्मनी के ज़बर्दस्त हमला बोलने के बावजूद ये डिटैचमेंट डटी रही. एक-एक करके उनके सिपाही मरते रहे."
"आख़िर में सिर्फ़ ख़ुदादाद ही बचे. वो भी बुरी तरह से घायल हो कर गिर पड़े. जब जर्मन आए तो वो उन्हें मरा हुआ समझ कर उनके ऊपर से चले गए. लेकिन उनके एक्शन से तेज़ी से बढ़ते जर्मन सैनिकों का एडवांस रुक गया."

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ज़हरीली गैस छोड़ने के बाद लाशों से पट गया मैदान
इस लड़ाई में भारतीय सैनिकों के ख़िलाफ़ जर्मनी ने पहली बार ज़हरीली गैस का इस्तेमाल किया जो उनके लिए बहुत नया और कटु अनुभव था.
मंदिरा नैयर बताती हैं, "पहली बार जब गैस छोड़ी गई थी तो एक भारतीय सैनिक ने अपने घर चिट्ठी में लिखा कि ऐसा लगा जैसे जहन्नुम धरती पर उतर आया हो. जैसे भोपाल गैस त्रासदी हुई थी, पूरा मैदान मरे हुए लोगों से भर गया था. लोग मक्खियों की तरह मर रहे थे."
"एक सैनिक मीरदाद आठ बेहोश सैनिकों को अपनी पीठ पर लाद कर पीछे की तरफ़ लाए थे. उन्हें इसके लिए विक्टोरिया क्रॉस दिया गया. भारतीय सैनिकों के पास गैस मास्क नहीं थे."
"किसी ने उन्हें बताया कि एक कपड़े पर पेशाब लगा कर अगर उसे नाक के पास रखा जाए तो गैस का असर कम हो जाता है. उन्होंने ये भी किया, लेकिन उसका कोई फ़ायदा नहीं हुआ."
फ़्लैंडर्स के फ़ील्ड म्यूज़ियम में एक तस्वीर है जिसमें इस गैस के असर को दिखाया गया है. मैदान में चारों तरफ़ लाशें बिखरी पड़ी हैं. इस लड़ाई में 47 सिख रेजीमेंट के 78 फ़ीसदी सैनिक मारे गए थे.

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राजमहल में हुआ उपचार
घायल भारतीय सैनिकों को ब्रिटेन में ब्राइटन में एक राजमहल में रखा गया था. ब्रिटेन के महाराजा ने कई साल पहले इस महल को ब्राइटन कॉरपोरेशन को बेच दिया था लेकिन ब्रिटेन ने इन अफवाहों को बढ़ावा दिया कि राजा ने घायल भारतीय सैनिकों के लिए अपना राजमहल खाली कर दिया.
मंदिरा नैयर कहती हैं, "ब्राइटन के राजमहल में नौ रसोईघर थे, हर धर्म के सैनिकों के लिए अलग. एक गुरुद्वारा था. नमाज़ पढ़ने के लिए एक मस्जिद थी. एक मंदिर भी था. कहते हैं कि नर्सों को हिदायत थी कि वो उन सैनिकों के बहुत करीब न जाएं."
"ब्रिटिश साम्राज्य ये प्रोपागंडा करने में सफल हो गया था कि भारतीय सैनिक उन्हें इतने अज़ीज़ हैं कि ब्रिटिश राजा ने उनके लिए अपना महल खाली कर दिया था. पूरे अस्पताल में उर्दू, गुरमुखी और हिंदी में साइनबोर्ड लगाए गए थे."
"मुसलमान सैनिकों के लिए हलाल गोश्त की भी व्यवस्था की गई. जब भी उन्हें समुद्र तट पर घूमने के लिए ले जाया जाता, ब्राइटन के नागरिकों में उनसे हाथ मिलाने के लिए होड़ लग जाती और वो उनके हाथ में सिगरेट और चॉकलेट्स पकड़ा देते. रॉयल पवेलियन में 4,306 भारतीय सैनिकों का उपचार किया गया."
कुछ लोगों की वहीं पर मौत भी हुई. इनमें से 53 हिंदू और सिख सैनिकों का ब्राइटन के बाहर एक गाँव में अंतिम संस्कार किया गया और उनकी अस्थियाँ समुद्र में बहा दी गईं, जबकि 21 मुस्लिम सैनिकों को वोकिंग की मस्जिद के अहाते में दफ़नाया गया.

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लाशों के ऊपर सोना पड़ता था
भारतीय सैनिकों के युद्धस्थल से भेजे गए पत्रों को पढ़ने से जो चीज़ ज़हन में आती है वो है विषम परिस्थितियां और चारों तरफ़ हो रही बरबादी का सजीव चित्रण.
राइफ़लमैन अमर सिंह रावत ने फ़्रांस के मोर्चे से अपने दोस्त को लिखा, "धरती मरे हुए लोगों से भर गई है. कोई भी जगह ख़ाली नहीं बची है. आगे बढ़ने के लिए लाशों के ऊपर से हो कर जाना होता है. यहाँ तक कि उनके ऊपर सोना भी होता है क्योंकि कोई ख़ाली जगह बची ही नहीं है."
अफ़्रीका और यूरोप में लड़ते हुए इन भारतीय सैनिकों को अक्सर ऐसी समस्याओं से दोचार होना पड़ता था जिसका अनुभव उन्हें पहले कभी नहीं हुआ था.
श्रबनि बसु अपनी किताब 'फ़ॉर किंग एंड एनअदर कंट्री' में लिखती हैं, "इन सैनिकों को अक्सर उन अफ़सरों की कमान में रखा जाता था जो हिंदुस्तानी नहीं बोल पाते थे. वो लोग उनकी खाइयों का नाम लंदन की सड़कों के नाम पर रखते थे."
"भारतीय सैनिकों के लिए इसका कोई मतलब नहीं होता था क्योंकि उन्हें पिकेडिली, रीजेंट स्ट्रीट और ट्रेफ़ल्गर स्क्वॉयर के बीच का अंतर पता ही नहीं था. बाद में भारतीय सैनिकों की मदद के लिए खाइयों के नक्शे हिंदी, पंजाबी और उर्दू में लिखे जाने लगे."
"लेकिन इसका भी कोई ख़ास असर नहीं पड़ा, क्योंकि अधिक्तर भारतीय जवानों को पढ़ना ही नहीं आता था."

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सामाजिक और आर्थिक जीवन में बदलाव
कई साल विदेश में लड़ने के बाद भारतीय सैनिक वहाँ से कई नई नई चीज़ें सीख कर आए.
चाय पीने का चलन, फ़ुटबॉल का खेल और कलाई घड़ी पहनने का रिवाज, भारत में प्रथम विश्व युद्ध के बाद ही शुरू हुआ.
इसके अलावा उनके विदेश प्रवास ने यहाँ के सामाजिक जीवन में भी कई बदलाव किए.
इन सिपाहियों के भेजे मनी ऑर्डर्स ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को बदल कर रख दिया था.
हरियाणा अकादमी ऑफ़ हिस्ट्री एंड कल्चर के निदेशक केसी यादव बताते हैं, "किसानों ने वहाँ से भेजे गए पैसे से ज़मीन ख़रीदी. उन्होंने स्कूल बनवाए. उनकी भाषा में भी आमूल परिवर्तन हुए."
"हरियाणवी भाषा में आप शब्द ही नहीं था. सब लोग एक दूसरे को तुम कह कर पुकारते थे. वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने पहली बार आप शब्द का प्रयोग किया. और तो और कई फ़्रेंच भाषा के शब्द भी स्थानीय भाषा में शामिल हो गए."
इस लड़ाई से कई सामाजिक दूरियाँ भी कम हुई. एक सैनिक ने युद्ध मोर्चे से 'द जाट गज़ट' के संपादक सर छोटू राम को चिट्ठी लिखी, "सभी सामाजिक बंदिशें ख़त्म हो गई हैं. पच्चीस फ़ीसदी सैनिक अब साथ बैठ कर खाना खाते हैं."
लौटे सैनिकों का राजनीतिक रसूख़ भी बढ़ा. साल 1920 के एक चुनाव में मामूली रिसालदार स्वरूप सिंह ने क़द्दावर जाट नेता सर छोटू राम को हरा दिया था.

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दियासलाई और सिगरेट का अंधविश्वास
इस लड़ाई से ही ये अंधविश्वास शुरू हुआ कि दियासलाई की एक तीली से तीन सिगरेट नहीं जलाई जानी चाहिए.
जब तक तीसरी सिगरेट जलाई जाती, विरोधी स्नाइपर को सैनिक के ठिकाने का पता चल जाता.
ब्रिटेन की ओर से युद्ध में शामिल हुए मशहूर लेखक एचएच मनरो को आंकरे की लड़ाई में जब गोली लगी तो उनके आख़िरी शब्द थे, "पुट आउट दैट ब्लडी सिगरेट."
इतिहास की अवहेलना
ये वो लोग थे जिन्होंने सपने देखे जिन्हें फ़्रेंच महिलाओं से अनेकों प्रेम पत्र मिले... जो मरे भी और जिन्होंने मारा भी.
इन सैनिकों की याद में शायद पहला स्मारक तीन मूर्ति भवन के सामने बना.
वहाँ तीन सैनिकों की जो मूर्तियाँ है वो हैदराबाद, मैसूर और जोधपुर के उन सैनिकों की याद में बनाई गई हैं जो 15वीं इंपीरियल कैवेलरी ब्रिगेड के सदस्य थे.
बाद में इनकी याद में इंडिया गेट बनाया गया जिस पर प्रथम विश्व युद्ध में अपने प्राणों की आहुति देने वाले सैनिकों के नाम लिखे गए.
आश्चर्य की बात ये है कि इन लाखों सैनिकों की क़ुर्बानी को बहुत आसानी से भुला दिया गया.
इतनी कुर्बानी देने के बावजूद इन सैनिकों का इतिहास के पन्नों में मामूली ज़िक्र ही हुआ है.
छह लंबे सालों तक उन्होंने अंग्रेज़ों के लिए अपना तन, मन, धन सब न्योछावर कर दिया, लेकिन न तो उन्हें इतिहास में जगह मिली और न ही भारतीय लोगों के दिलों में.
लड़ाई के बाद
राणा छीना कहते हैं कि उस समय भारतीय सैनिकों की कोई राजनीतिक पहचान नहीं थी. लड़ाई के बाद अंग्रेज़ आज़ादी देने के अपने वादे से मुकर गए और भारत को आज़ादी नहीं मिली, इसलिए इन सैनिकों के योगदान को भी भुला दिया गया.
एक अंग्रेज़ कवि एडवर्ड हाउज़मेन ने ज़रूर लिखा...
इन लोगों ने जब स्वर्ग नीचे गिर रहा था
और धरती की नींव हिलने लगी थी,
किराए पर लड़ने का अनुरोध सुना
अपनी तनख़्वाह ली और सिर पर कफ़न बाँध लिया.
उनके कंधों ने संभाला गिरते हुए आसमान को,
वो खड़े रहे कि धरती की नींव न हिल जाए
जिसे ईश्वर ने भी छोड़ दिया
उसकी उन्होंने रक्षा की
अपनी जान की आख़िरी क़ीमत चुका कर
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