अमरीका पहले विश्व युद्ध के लिए मजबूर क्यों हुआ था?

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- Author, पेट्रिक ग्रेगरी
- पदनाम, बीबीसी के लिए
अमरीका पहले विश्व युद्ध में 6 अप्रैल 1917 को शामिल हुआ, लेकिन युद्ध का रास्ता दो महीने पहले तय हो चुका था. तब जर्मन सरकार ने ब्रिटिश द्वीपों के चारों ओर तटीय जल पर ग़ैर-प्रतिबंधित पनडुब्बी हमलों की युद्ध नीति को फिर से शुरू करने का निर्णय लिया था.
दूसरे शब्दों में कहें तो वो समुद्रमार्ग से गुज़रने वाले हर जहाज़ पर हमला करने की नीति पर लौट आने वाले थे जिसमें अमरीकी जहाज़ भी शामिल थे.

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तटस्थ रहने की अमरीकी नीति
अमरीका के राष्ट्रपति वूड्रो विल्सन विपक्ष के घोर विरोध के बावजूद ढाई साल तक अपने देश को यूरोपीय संघर्ष से दूर रखने के लिए नाज़ुक राजनीतिक संतुलन बनाए रखने में कामयाब रहे थे.
विल्सन एक धीर गंभीर बुद्धिजीवी थे, वो प्रेस्बिटेरियन स्कॉट के वशंज थे. अमरीकी गृहयुद्ध के दौरान उनके बचपन के अनुभव बेहद कड़वे थे, यही वजह थी कि वो देश को 1914 में शुरू हुए यूरोपीय संघर्ष से दूर रखना चाहते थे.
ये एक ऐसी लड़ाई थी जिसका असर और मक़सद उन्होंने देखा था. उनके विचार में इसमें हिस्सा लेने से अमरीकी विदेश नीति को कोई फ़ायदा नहीं था.
तटस्थ रहना विल्सन का आदर्श वाक्य था, और इसी धुरी के आधार पर वो यूरोपीय देशों से व्यवहार कर रहे थे.
अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति थियोडेर रूजवेल्ट समेत कई आलोचकों की नज़र में वो ''सोच और कार्यवाही'' दोनों में तटस्थ बन गए थे.

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''ये हमें युद्ध से दूर रखेगा''
बेहद उकासावे के माहौल के बावजूद युद्ध के शुरुआती सालों में विल्सन अपनी तटस्थता की नीति पर क़ायम रहे.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण मई 1915 में देखा गया, जब दक्षिणी आयरलैंड के तट पर एक जर्मन पनडुब्बी ने आरएमएस ल्यूसतानिया नाम के ब्रिटिश यात्री जहाज को नष्ट कर दिया था. इसमें लगभग 1,200 लोग मारे गए थे, जिनमें 128 अमरीकी शामिल थे.
सितंबर 1915 में मामले में हस्तक्षेप के लिए आंतरिक विरोध बढ़ रहा था, जब विल्सन ने जर्मनी को आदेश दिया कि बिना चेतावनी के जहाज़ों को ना डुबाया जाए.
इस तरह से विल्सन ने सावधानी के साथ सतर्कता बरकरार रखी. यहां तक कि उसके बाद वाले सालों में भी उनके चुनावी अभियान का यही नारा था ''उन्होंने हमें यु्द्ध से बाहर रखा.''
मुश्किल से ही सही लेकिन वो चुनाव जीते.
31 जनवरी 1917 में जब यूरोप में संघर्ष ख़त्म हुआ तब उन्होंने सीनेट में एक भाषण के दौरान क़ानूनविदों से दोनों देशों के बीच ''शांति की नींव'' बनाए रखने के लिए मदद की अपील की थी.
लेकिन विल्सन को अचानक अपने विचार बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा.

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वो एक चिट्ठी और एक टेलीग्राम
सीनेट में अपने भाषण के एक हफ़्ते बाद वॉशिंगटन डीसी में जर्मनी के राजदूत योहेन हैनरिक फॉन बर्नस्ट्रॉफ ने अमरीका के विदेश मंत्री रॉबर्ट लेंसिंग को बुलाया.
फॉन बर्नस्ट्रॉफ के पास एक चिट्ठी थी जिसमें जर्मनी ने समुद्री रास्ते में पनडुब्बी हमले की अपनी नीति को बहाल करने की घोषणा की थी.
बस यहीं से अमरीका के युद्ध में शमिल होने की उलटी गिनती शुरू हुई.
पहला कूटनीतिक संबध टूट गया था. अगला निशाना था वो बीच का बिंदु जिसे विल्सन ''सशस्त्र तटस्थता'' कहते थे. क्योंकि बात यहीं ख़त्म नहीं हुई.
जर्मनी के विदेश मामलों के मंत्री आर्थर सिमरमन की ओर से एक टेलीग्राम मेक्सिको भेजा गया था जो प्रेस में लीक हो गया था और लोगों के आक्रोश की वजह बन गया था.
जर्मनी दूतावास के ज़रिए मेक्सिको को सिमरमन ने एक प्रस्ताव दिया था जिसमें साफ संदेश लिखा था ''चलो एकसाथ मिलकर युद्ध करते हैं, चलो एकसाथ मिलकर शांति बनाते हैं.''
दरअसल इसके ज़रिए जर्मनी ने मेक्सिको को अमरीका के ख़िलाफ़ युद्ध में शामिल होने के लिए आर्थिक मदद की पेशकश की थी और टेक्सस, एरीज़ोना और न्यू मेक्सिको की सरहदों को दोबारा वापस पाने के लिए कहा था, जिन्हें 19वीं सदी में ताक़तवर उत्तर के पड़ोसियों ने जीत लिया था.
क्योंकि ब्रितानी सरकार ने अमरीका को चेतावनी देने वाला टेलीग्राम बीच में ही रोक दिया था तो कुछ लोगों को लगा कि ये संदेश मित्र राष्ट्रों ने विल्सन के तटस्थ रहने के क़दम को ख़त्म करने के लिए दिया गया है.
हालांकि 29 मार्च को सिमरमन ने एक भाषण के दौरान कहा था कि वो इस मामले में अपनी भागीदारी स्वीकारते हैं और अमरीका के ''शत्रुता भरे व्यवहार'' को देखते हुए ये न्यायोचित भी है.

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एक ''अनिवार्य'' क़दम
2 अप्रैल को विल्सन ने संसद से कहा कि वो एक बेहद गंभीर और दुखद क़दम उठा रहे हैं, उन्होंने संसद से कहा वो जर्मनी की इस कार्रवाई को अमरीकी सरकार और जनता के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा को तौर पर लें.
सशस्त्र तटस्थता बेअसर साबित हो चुकी थी, क्योंकि इसके चलते जर्मन पनडुब्बी हमलों से जहाज़ों की रक्षा के लिए तैनाती असंभव थी.
विल्सन ने कहा ''हम जर्मनी के लोगों के ख़िलाफ़ नहीं हैं. उनके लिए हमारे मन में सिर्फ़ सहानुभूति और मित्रता का भाव है. लोकतंत्र के वजूद के लिए दुनिया को सुरक्षित होना होगा.''
तब 16 अप्रैल 1917 को राष्ट्रपति ने आधिकारिक बयान पर हस्ताक्षर किए थे. इसी के साथ अमरीका पहले विश्व युद्ध में शामिल हो गया था.
पेट्रिक ग्रेगरी ''एन अमेरिकन ऑन द वेस्टर्न फ्रंट: द फर्स्ट वर्ल्ड वॉर लेटर्स ऑफ आर्थर क्लिफर्ड 1917-18'' किताब के सह लेखक हैं, जो 2016 में द हिस्ट्री प्रेस ने प्रकाशित की थी.
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