फिर जेल पहुंचे डॉ. कफ़ील की अब तक की पूरी कहानी

डॉक्टर कफ़ील
    • Author, कुमार हर्ष
    • पदनाम, गोरखपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

डॉक्टर कफ़ील अहमद को विवादों, सुर्ख़ियों और कानूनी अदावतों से छुट्टी नहीं मिल रही है. ये वही डॉक्टर कफ़ील हैं जो गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत के बाद बर्ख़ास्त कर दिए गए थे. जेल गए, फिर ज़मानत पर बाहर आए और अब फिर जेल में हैं.

बीते 23 सितंबर को डॉक्टर कफ़ील के ख़िलाफ़ बहराइच ज़िला अस्पताल के चीफ़ मेडिकल अफ़सर की तहरीर पर पुलिस ने सरकारी काम में बाधा डालने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था और हिरासत में ले लिया था.

डॉक्टर कफ़ील पर इल्ज़ाम था कि वह बग़ैर इजाज़त बहराइच ज़िला अस्पताल के बच्चों के वॉर्ड में पहुँचकर बच्चों की जांच करने लगे और चिकित्सा संबंधी सलाह देने लगे. जब उन्हें रोका गया तो उन्होंने हंगामा किया.

लेकिन डॉक्टर कफ़ील के मुताबिक़, वह वहां इसलिए गए थे क्योंकि वहां पिछले दो महीनों में 100 से अधिक बच्चों की मौत हुई है और ये इंसेफेलाइटिस का क़हर भी हो सकता है. इसी बाबत आगाह करने के लिए वह वहां गए थे ताकि मासूमों की मौत रोकी जा सके.

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज

बहरहाल, हिरासत में गोरखपुर भेजे जाने के ठीक अगले दिन रविवार को गोरखपुर की कैंट थाने की पुलिस ने एक पुराने मामले में डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई अदील अहमद खां को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया.

आरोप है कि अदील ने 2009 में एक फ़र्ज़ी ड्राइविंग लाइसेंस का इस्तेमाल करते हुए यूनियन बैंक में एक दूसरे व्यक्ति फ़ैज़ान के नाम से एक खाता खुलवाया था.

खाता खोलने में फ़ोटो एक तीसरे व्यक्ति मुज़फ़्फ़र आलम की लगाई गई थी जिसने पहले 2014 में बैंक को और इस साल मई महीने में पुलिस को शिकायत की थी. शिकायत थी कि उसकी फ़ोटो का ग़लत इस्तेमाल करते हुए फ़र्ज़ी खाता खुलवाकर दो करोड़ का ट्रांजैक्शन किया गया. आरोप ये भी है कि इस खाते से डॉक्टर कफ़ील को लगभग चार लाख रुपए ट्रांसफ़र किए गए थे.

अब ख़बर यह भी है कि पुलिस ने डॉक्टर कफ़ील और उसके बड़े भाई अदील के ख़िलाफ़ कुछ और पुराने मामलों को भी खंगालना शुरू कर दिया है और इनकी मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं.

इसमें बलात्कार का एक पुराना मामला भी है. कफ़ील और उनका परिवार इसे 'सच की लडाई लड़ने की सज़ा' बता रहा है.

डॉक्टर कफ़ील

इमेज स्रोत, Getty Images

पिछले साल डॉक्टर कफ़ील क्यों थे ख़बरों में

यह वही डॉक्टर कफ़ील हैं जिन्हें पिछले साल 10 अगस्त को गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मासूमों की ज़िंदगी बचाने के लिए ऑक्सीजन के प्रबंध के लिए की गई उनकी भागदौड़ और कोशिशों के आधार पर मीडिया ने हीरो बताया था.

लेकिन कुछ ही समय बाद एक जांच रिपोर्ट के आधार पर वह आठ अन्य लोगों सहित सलाखों के पीछे पहुंचा दिये गए.

आठ महीने तक जेल में बंद कफ़ील का परिवार उन्हें बेगुनाह बताकर कोर्ट से लेकर दिल्ली तक चक्कर लगाता रहा. उसी दौरान डॉक्टर कफ़ील का जेल में लिखा गया 10 पन्ने का पत्र सुर्ख़ियों में रहा जिसमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर प्रशासनिक अफ़सरों को कठघरे में खड़ा किया गया था.

तब उनके समर्थन में सोशल मीडिया के अलावा जमात-ए-इस्लाम से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का छात्र संघ प्रदर्शन करता नज़र आया था. गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में भी मुस्लिम बहुल इलाकों में सपा और निषाद पार्टी ने डॉक्टर कफ़ील को हीरो के तौर पर पेश कर प्रदेश सरकार के ख़िलाफ़ जमकर हमला बोला था.

डॉक्टर कफ़ील

इमेज स्रोत, SAMEERATMAJ MISHRA/BBC

उस वक़्त भी डॉक्टर कफ़ील पर कई आरोप लगाए गए थे. सोशल मीडिया में एक पोस्ट आई जिसमें यह बताया गया था कि 2009 में दिल्ली में नेशनल बोर्ड एग्ज़ाम फ़ॉर मेडिकल रजिस्ट्रेशन में वह किसी दूसरे की जगह पर परीक्षा देते हुए पकड़े गए थे और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई भी हुई थी. एक आरोप यह भी था कि 2013 में सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्हें एक मामले में सस्पेंड भी किया गया था.

उसी दौरान उनके ख़िलाफ़ बलात्कार का मामला भी उछला. दरअसल, 2015 में एक महिला ने डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई काशिफ़ पर बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया था. बाद में पता चला कि वह महिला एक ऐसे शख़्स की नौकरानी है जिनकी डॉक्टर कफ़ील के परिवार के साथ क़ानूनी लड़ाई चलती है और यह मुक़दमा भी इसी के चलते लिखवाया गया था.

दरअसल, जिस वक़्त गोरखपुर मेडिकल कॉलेज ऑक्सीजन त्रासदी के मामले में डॉक्टर कफ़ील गिरफ़्तार हुए थे, उस समय मीडिया में ढेरों ऐसी रिपोर्टें आई थीं कि जिनमें उन्हें बच्चों की जान बचाने के लिए इधर-उधर से ऑक्सीजन सिलेंडर का इंतज़ाम करने वाला मसीहा बताया गया था. शायद इसीलिए तभी से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लगातार सुर्ख़ियां मिलती रहीं.

डॉक्टर कफ़ील

इमेज स्रोत, SAMEERATMAJ MISHRA/BBC

समय-समय पर पत्रकार बरखा दत्त, छात्र नेता शहला रशीद, उमर ख़ालिद जैसे लोग उनके पक्ष में ट्वीट करते रहे. इतना ही नहीं, इस साल जून में जब उनके भाई काशिफ़ पर हमला हुआ था तब अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी ट्वीट या बयान देकर इसकी निंदा की थी और योगी सरकार पर हमला बोला था.

क्या डॉक्टर कफ़ील को सुर्खियों की चाहत है?

बहुत सारे लोगों का मानना है कि डॉक्टर कफ़ील को सुर्खियां हासिल करने का जुनून है और वह इसका कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. इस साल 25 अप्रैल को जब हाई कोर्ट ने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था, उससे पहले भी वह जेल के हालात और ख़ुद को फंसाए जाने के बारे में लगातार लिख रहे थे और उनके समर्थक '#सपोर्ट फॉर डॉक्टर कफ़ील' जैसे सोशल मीडिया कैंपेन चला रहे थे.

रिहा होने के बाद भी उन्होंने लगातार सुर्खियां हासिल करने की कोशिश की. 11 मई को वह कर्नाटक में जिग्नेश मेवाणी के साथ 'कर्नाटक फ़ोरम टू सेव द कॉन्स्टीट्यूशन' के मंच पर जा पहुंचे जहां कर्नाटक चुनाव में भाजपा के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त हमले किए जा रहे थे.

22 मई को उन्होंने केरल में निपाह वायरस के ख़िलाफ़ जंग में ख़ुद की सेवाएं देने के लिए केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन से फ़ेसबुक पर अपील की जिसे विजयन ने स्वीकार भी कर लिया.

डॉक्टर कफ़ील

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के एक वरिष्ठ चिकित्सक इसे मीडिया का ध्यान हासिल करने की कवायद बताते हुए कहते हैं कि डॉ कफ़ील के पास चिकित्सा की दक्षता से ज़्यादा सुर्ख़ियां हासिल करने की भूख रहती है और इसलिए वह पहले केरल और अब बहराइच जा पहुंचे.

इसी साल 11 जून को जब उनके भाई काशिफ़ पर गोरखपुर में हमला हुआ तब डॉक्टर कफ़ील और उनके भाई ने भाजपा सांसद कमलेश पासवान और पुलिस के कुछ अफ़सरों पर इल्ज़ाम लगाया. देशभर में इसे भी योगी सरकार के उत्पीड़न के तौर पर प्रचारित किया गया.

हालांकि, पुलिस तफ़्तीश में यह ज़मीन और प्रॉपर्टी के विवाद का पुराना मामला बताया गया जिसमें एक शख़्स नौशाद की कफ़ील के परिवार से पुरानी क़ानूनी अदावत सामने आई थी.

हर मामले को सीधे सरकार से जोड़ देने की उनकी आदत अब धीरे-धीरे उन्हें विवादित भी बना रही है.

पिछले दिनों एक महिला पत्रकार काविश अज़ीज़ लेनिन ने एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखकर '#डोंट सपोर्ट डॉक्टर कफ़ील ख़ान' नाम से एक कैंपेन शुरू किया है.

काविश का आरोप है कि डॉक्टर कफ़ील से मिलने के बाद उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वह हर मामले में ख़ुद को मुसलमान होने के चलते पीड़ित बताते हैं और सरकार विरोधी राजनीति में अपनी जगह तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)