GROUND REPORT: सिर्फ़ छह डॉक्टरों के भरोसे है बहराइच के हज़ारों बच्चों की ज़िंदगी

बहराइच अस्पताल जहां बच्चों की मौत हुई, उत्तर प्रदेश, योगी आदित्यनाथ

इमेज स्रोत, SAMIRATMAJ MISHRA/BBC

इमेज कैप्शन, सलमा यह बताते हुए रोने लगती हैं कि "पिछले दो दिन से बच्चा इसी तरह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है."
    • Author, समीरात्मज मिश्र
    • पदनाम, बहराइच से, बीबीसी हिंदी के लिए

बहराइच ज़िला अस्पताल के बाल रोग विभाग के भीतर घुसते ही बच्चों की रोती-बिलखती आवाज़ें सुनाई देती हैं, तो वहीं अपने बच्चों को गोद में लिए बदहवास भटकते उनके माँ-बाप इधर-उधर दिखते हैं.

वॉर्ड में ही रिसेप्शननुमा बने प्लेटफॉर्म पर कुछ डॉक्टर, नर्स और कंपाउंडर वहां आए बच्चों की शुरुआती जांच कर रहे हैं और फिर बच्चों की बीमारी की ज़रूरत को देखते हुए उन्हें वॉर्ड के अंदर भेज रहे हैं.

ज़िला अस्पताल का ये वही वॉर्ड है जो पिछले 50 दिनों में 79 बच्चों की मौत का ग़वाह बना है. चालीस बिस्तर के इस वॉर्ड में सौ से ज़्यादा बच्चों का इलाज हो रहा है. कुछ बच्चों को वॉर्ड के भीतर बिस्तर पर जगह मिल गई है, कुछ को वॉर्ड के बाहर अस्थाई रूप से रखे गए बिस्तरों पर जगह मिली है और गंभीर रूप से बीमार बच्चे दाहिने किनारे पर बने आईसीयू में भर्ती हैं. तो कुछ के माँ बाप अपने बच्चों को भर्ती कराने के लिए बाहर खड़े हैं.

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ज़्यादातर बच्चे बरसात और बाढ़ के बाद आमतौर पर होने वाली उन्हीं संक्रामक बीमारियों से ग्रस्त हैं, जिनके चलते अब तक दर्जनों बच्चों की मौत हो चुकी है.

डॉक्टरों का कहना है कि मरने वाले बच्चे डायरिया, न्यूमोनिया, बर्थ स्पेक्सिया, हिपेटाइटिस बी, मीनिंजाइटिस, इंसेफ़ेलाइटिस जैसी बीमारियों से पीड़ित थे.

वॉर्ड के भीतर क़रीब तीन महीने के एक बच्चे की ज़ोर-ज़ोर से सांस चलने की आवाज़ पूरे वॉर्ड में सुनाई दे रही थी. बच्चे की मां सलमा बेड के पास खड़ी होकर उसे गोद में लिए थी. पतले और नन्हें हाथों में सुइयों के ज़रिए बच्चे को दवा और ग्लूकोज़ दिया जा रहा था.

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'बच्चे का बुखार नहीं उतर रहा है'

सलमा बताते-बताते रोने लगी, "पिछले दो दिन से बच्चा इसी तरह सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है. दवाइयों से आराम नहीं हो रहा है. डॉक्टरों ने कुछ जांच करने की बात कही है लेकिन अभी तक कुछ हुआ नहीं."

वहीं चार दिन से अपने बच्चे का इसी वॉर्ड में इलाज करा रहे श्रावस्ती से आई कमला का कहना था कि उनका पांच साल का बच्चा बुखार से पीड़ित है. डॉक्टर लगातार इलाज कर रहे हैं, दवा दे रहे हैं लेकिन बुख़ार उतरने का नाम नहीं ले रहा है.

साथ में आए बच्चे के बाबा राम केवल बताने लगे, "हफ़्ते भर पहले बुखार आया था. गांव में दवा कराए, फिर बंगाली डॉक्टर के यहां ले गए लेकिन कहीं आराम नहीं लगा. उसके बाद डॉक्टर की सलाह पर यहां ले आए. डॉक्टर लोग रोज़ आकर देखते हैं, दवा देते हैं लेकिन बुख़ार उतर नहीं रहा है."

बहराइच के इस ज़िला अस्पताल में बहराइच के अलावा बलरामपुर, श्रावस्ती, गोंडा ज़िले से तो लोग अपने बच्चों का इलाज कराने के लिए आते ही हैं, नेपाल के भी कुछ इलाक़ों के लिए यही सहारा होता है. लेकिन ख़ुद अस्पताल की हालत नाज़ुक है. यहां इतने बच्चों के इलाज की सुविधा ही नहीं है. महज छह डॉक्टर सैकड़ों की संख्या में आए बीमार बच्चों के लिए संकटमोचन बने हुए हैं.

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर डीके सिंह का कहना है कि अस्पताल में संसाधन कम हैं लेकिन मरीज बहुत हैं.

अस्पताल में संसाधन कम और मरीज ज्यादा

बहराइच ज़िला अस्पताल में मुख्य चिकित्सा अधीक्षक का चार्ज सँभाल रहे हैं डॉक्टर डीके सिंह कहते हैं, "बच्चों के वॉर्ड में सिर्फ़ चालीस बेड हैं लेकिन इस मौसम में रोज़ बड़ी तादाद में बीमार बच्चे आते हैं. आस-पास के ज़िलों से भी लोग यहीं लेकर आते हैं जबकि वहां भी सरकारी और निजी अस्पताल हैं. मरीजों की संख्या को देखते हुए हमने 11 अतिरिक्त बड़े बेड भी लगवाए हैं और सभी पर दो-दो तीन-तीन बच्चों को रखा गया है. हमारी कोशिश है कि किसी बच्चे को ज़मीन पर न रहना पड़े."

डॉक्टर डीके सिंह अस्पताल में कमियों का भी ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि अस्पताल में चार स्थाई और दो अस्थाई बच्चों के डॉक्टर हैं और इन्हीं के भरोसे इन सारे बच्चों का इलाज हो रहा है. वो बताते हैं, "वॉर्ड में और ज़्यादा बेड लगाने की जगह ही नहीं है. डॉक्टर भी कम ही हैं, फिर भी हमारी कोशिश रहती है कि चौबीस घंटे एक डॉक्टर ज़रूर तैनात रहे. एक दिक़्क़त ये भी है कि अधिकतर बच्चे तभी यहां आते हैं जब उनकी हालत गंभीर हो जाती है."

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डॉक्टर डीके सिंह का कहना है कि अस्पताल में संसाधन कम हैं लेकिन मरीज बहुत हैं. जो भी लोग अपने मरीज लेकर आते हैं, वो यही चाहते हैं कि उनके मरीज भर्ती हों. ऐसा न करने पर कई बार लोग मार-पीट तक करने लगते हैं.

वहीं चिल्ड्रेन वॉर्ड में ही कुछ बच्चों के तीमारदार अस्पताल प्रशासन पर लापरवाही का भी आरोप लगा रहे थे. बहराइच ज़िले के ही किसी गांव से आए दीपक कुमार कहने लगे, "सारा इलाज जूनियर डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के भरोसे ही हो रहा है, कोई बड़ा डॉक्टर देखने नहीं आता. मेरा छह साल का भतीजा तीन दिन से आईसीयू में है लेकिन उसका क्या इलाज हो रहा है, हमें कुछ नहीं पता. कुछ पूछने पर डॉक्टर डांट देते हैं."

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मुख्यमंत्री के स्वागत में साफ किया जा रहा है अस्पताल

अस्पताल में साफ़-सफ़ाई कर रहे लोगों की ओर इशारा करते हुए एक व्यक्ति ने बताया कि 19 सितंबर को मुख्यमंत्री आने वाले थे लेकिन अब 24 सितंबर को आएंगे. उसी के चलते पूरे शहर के साथ ही अस्पताल को भी साफ़-सुथरा बनाने की कोशिश हो रही है, नहीं तो हर जगह गंदगी और अव्यवस्था ही दिखेगी.

अस्पताल में लोग दवाइयों और अन्य सुविधाओं के न होने का भी आरोप लगा रहे हैं. लेकिन सीएमएस इन्चार्ज डॉक्टर डीके सिंह कहते हैं कि ज़रूरी दवाइयों की कोई कमी नहीं लेकिन लोग सरकारी दवाइयों पर भरोसा ही नहीं करते और चाहते हैं कि उन्हें बाहर से ही दवाइयां मँगाकर दी जाएं, जो कि संभव नहीं है.

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ऐसा नहीं है कि इन बीमारियों से बच्चे इसी साल बीमार हो रहे हैं और मर रहे हैं बल्कि ऐसा पिछले कई सालों से होता आ रहा है. बावजूद इसके, इन तीन संवेदनशील महीनों के लिए कुछ ख़ास इंतज़ाम नहीं किए गए हैं. अस्पताल प्रशासन ने सिर्फ़ 11 अतिरिक्त बेड लेकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली और लोग अपने बीमार बच्चों को लेकर इधर-उधर घूम रहे हैं.

बहराइच ज़िला अस्पताल के अलावा अन्य सरकारी अस्पतालों और निजी अस्पतालों में भी बड़ी संख्या में बच्चों के भर्ती होने की ख़बर है. स्वास्थ्य विभाग का एपिडेमिक सेल गांव-गांव लोगों के स्वास्थ्य की जांच कर रहा है तो साफ़ सुथरा रहने का सुझाव भी दे रहा है, लेकिन अस्पतालों में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है.

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