इलाज को तरसते भारतीयों के लिए क्या हैं ‘मोदीकेयर’ के मायने

- Author, देविना गुप्ता
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
इस साल 15 अगस्त के दिन करिश्मा का जन्म हरियाणा के कल्पना चावला सरकारी मेडिकल कॉलेज में हुआ था.
उनकी मां पुष्पा भारत की नई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की पहली लाभार्थी बन गई हैं.
पुष्पा हरियाणा राज्य में इस नीति के पायलट चरण में पंजीकृत कई परिवारों में से एक थीं.
पुष्पा ने बीबीसी को बताया, "मेरा पहला बच्चा एक निजी अस्पताल में पैदा हुआ था. तब हमारे लगभग डेढ़ लाख रुपये ख़र्च हुए थे. वहां दवाएं और डॉक्टर का परामर्श, सभी के लिए पैसे देने पड़े थे. लेकिन इस बार बच्चे के जन्म से पहले मैंने इस बीमा योजना के लिए एक फ़ॉर्म भरा था. उसकी वजह से हमें इस बार सरकारी अस्पताल में कोई भुगतान नहीं करना पड़ेगा."

'मिलेगा बेहतर इलाज'
हालांकि बच्चे की डिलीवरी किसी भी सार्वजनिक अस्पताल में निःशुल्क की जाती है. लेकिन मरीज़ को दवाइयों, परिवहन और उपचार के लिए भुगतान करना पड़ता है.
लेकिन इस नीति के तहत पुष्पा को कोई पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ेगा और अस्पताल को राज्य के मेडिकेयर फ़ंड से डिलीवरी के लिए 9000 रुपये मिलेंगे.
हरियाणा के कल्पना चावला सरकारी मेडिकल कॉलेज के डायरेक्टर डॉक्टर सुरेंद्र कश्यप ने बताया, "जैसे ही हम कोई मेडिकल केस ऑनलाइन अपलोड करेंगे, पैसा हमारे खाते में आ जायेगा. आयुष्मान भारत की एक टीम लगातार हमारे संपर्क में होती है. ये सरकार के वार्षिक धन आवंटन से अलग है. अगर हमें सर्जरी करने की लागत मिलने लगेगी, तो हम मरीज़ों को बेहतर इलाज दे पायेंगे."

40 फ़ीसदी आबादी का बीमा
अब बात साल 1995 की. सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला दिया था जिसमें कोर्ट ने उद्योगों में शामिल श्रमिकों के स्वास्थ्य पर चिंता ज़ाहिर की थी. ये माना जाता है कि स्वास्थ्य और चिकित्सकीय देखभाल हर भारतीय का मौलिक अधिकार है.
आज, कोर्ट के उस फ़ैसले के क़रीब 23 साल बाद, भारत उन लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए अपनी महत्वाकांक्षी हेल्थकेयर परियोजना शुरू कर रहा है, जो अपने लिए एक दिन में तीन वक़्त के भोजन का भी बंदोबस्त नहीं कर सकते.
हाल ही में बनाये गए 'आयुष्मान भारत मिशन' के तहत 'प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना' की शुरुआत की गई है. इस योजना को 'मोदीकेयर' भी कहा जा रहा है जिसके अंतर्गत देश की लगभग 40 फ़ीसदी आबादी को बीमा मिलेगा.
ये योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की पिछली केंद्रीय नीति और विभिन्न राज्यों में चल रही व्यक्तिगत स्वास्थ्य योजनाओं को अपने में सम्मिलित कर लेगी.

ये योजना है क्या?
इस योजना के तहत देश के 10 करोड़ 74 लाख परिवारों को 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराया जाएगा.
योजना के लाभार्थियों की पहचान साल 2011 की सामाजिक आर्थिक और जातिगत जनगणना (एसईसीसी) के तहत की गई है.
लाभार्थियों का पूरा डेटा ऑनलाइन जमा किया गया है और उसे पैनल के क़रीब 8000 अस्पतालों के साथ साझा भी किया गया है.
सरकार ने सभी अस्पतालों में 'आयुष्मान केंद्र' खोले हैं जो इस योजना का हिस्सा हैं. आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोग पहचान केंद्र के साथ इन केंद्रों में भी जा सकते हैं. यहां अधिकारी जांच करेंगे कि लाभार्थी का नाम एसईसीसी के डेटा में है या नहीं.
लाभार्थी का नाम लिस्ट में मिलने पर उन्हें एक गोल्डन आयुष्मान कार्ड दिया जायेगा. इस योजना के तहत लाभार्थी अपने परिवार के सदस्यों को भी नकद रहित चिकित्सा उपचार के लिए पंजीकृत करा सकेंगे.
पॉलिसी में सर्जरी, कैंसर, हड्डियों के प्रत्यारोपण समेत क़रीब 1350 स्वास्थ्य समस्याओं का बीमा मिलेगा. लेकिन आम बुखार और फ़्लू जैसी बीमारियां जिनमें अस्पताल में भर्ती नहीं होना पड़े या डॉक्टर के सामान्य परामर्श की ज़रूरत हो, उनकी लागत इसमें शामिल नहीं होगी.

बीमा योजना के लिए भुगतान कौन कर रहा है?
फंड के लिए कुछ राज्यों ने एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट बनाया है जहां उन्होंने अपने बजट से हेल्थ केयर फंड निकाला है.
केंद्र सरकार इसमें लगभग 60 प्रतिशत योगदान करेगी. जब अस्पतालों में लाभार्थियों का इलाज होगा, तो इलाज की लागत सीधे अस्पताल के खाते में ट्रांसफ़र कर दी जायेगी.
दूसरा मॉडल ये है कि राज्य सरकारें स्वास्थ्य बीमा प्रदान करने के लिए निजी बीमा कंपनियों के साथ भागीदारी कर सकती है. कुछ राज्यों ने एक मिश्रित मॉडल का भी चयन किया है जहां निजी बीमा कंपनियां छोटे भुगतान को कवर करती हैं और बाकी को सरकारी ट्रस्ट द्वारा फ़ंड दिया जायेगा.
क्या काफी हैं अस्पताल?

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सरकार का दावा है कि इस योजना से ग़रीबों के लिए सरकारी और निजी अस्पतालों में 2.65 लाख बेड उपबल्ध होंगे. लेकिन क्या ज़मीन पर हालात अलग होंगे?
केसीजीएमसी के मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ. जगदीश दुरेजा कहते हैं, "हमारा अनुमान है कि इसके बाद इलाज के लिए आने वाले मरीज़ों की संख्या कम से कम 20 फीसदी बढ़ेगी. हमें निश्चित तौर पर और डॉक्टरों और स्टाफ की ज़रूरत होगी. अस्पतालों में बेड की संख्या भी सीमित होती है तो हम उन्हें कहां भर्ती करेंगे?"
जून में भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 11082 मरीज़ों के लिए एलोपेथी में औसतन सिर्फ एक डॉक्टर उपलब्ध है. इतना ही नहीं, 1844 मरीज़ों पर औसतन सिर्फ एक बेड और 55591 लोगों के लिए औसतन एक सरकारी अस्पताल उपलब्ध है.
ज़्यादातर चिकित्साकर्मी महंगे अस्पतालों में शिफ्ट हो चुके हैं जो ग़रीबों की पहुंच से बाहर हैं.

अब तक मोदीकेयर के तहत सिर्फ चार हज़ार अस्पतालों को जोड़ा गया है. ज़्यादातर निजी अस्पताल सरकार की ओर से तय की गई सर्जरी की दरों से ख़ुश नहीं हैं और ख़ुद को मोदीकेयर से अलग रखे हुए हैं.
मुंबई के आई एंड आई अस्पताल की संस्थापक डॉक्टर धवल हरिया कहती हैं, "निजी सिस्टम में न सिर्फ सर्जरी, बल्कि यंत्रों, मेंटेनेंस, एचआर मैनेजमेंट और भवन के किराए आदि का ख़र्च भी वहन किया जाता है. ये सब मिला दें तो सरकार ने जो पैकेज सामने रखा है, वह लंबे समय के लिए वहनीय नहीं हैं."
सरकार का कहना है कि भविष्य में और निजी अस्पतालों को इस योजना से जोड़ने के लिए मेडिकल पैकेज की दरों में बदलाव के रास्ते खुले रखे गए हैं.
आयुष्मान भारत के सीईओ इंदु भूषण ने कहा, "50 करोड़ लोगों का मतलब है कि अमरीका, कनाडा और मेक्सिको की आबादी मिला दी जाए, उतनी आबादी. तो निश्चित तौर पर ये एक महत्वाकांक्षी योजना है. ये अतीत में किए गए कामों से कहीं अधिक है. निजी अस्पतालों के पास कई बार उनकी क्षमता के अनुरूप ख़ाली स्पेस बच जाता है और मरीज़ों की भारी तादाद के मद्देनज़र उन्हें हाशिए पर खड़े लोगों को कवर करने पर विचार करना चाहिए. हमारे पैकेज उसे कवर करते हैं. कीमतों को लेकर कुछ शिकायतें हैं और हम उस पर विचार कर रहे हैं. जब भी हमारे पास नया डेटा होगा, हम कीमतों पर पुनर्विचार करेंगे."
बाक़ी देश क्या कर रहे हैं?

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एक बड़ा फ़र्क तो इसके तहत कवर की जाने वाली आबादी का है. उदाहरण के लिए ब्रिटेन में लोग नेशनल हेल्थ सर्विस का हिस्सा हैं और सरकारी अस्पतालों में उनका मुफ्त इलाज होता है. लेकिन मोदीकेयर भारत के उन ग़रीबों को ध्यान में रखकर बनाई गई योजना है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं का ख़र्च उठा ही नहीं सकते.
अगर हम अमरीका के ओबामा केयर की बात करें तो उसके तहत अमरीका के प्रत्येक नागरिक का बीमा है. इसके बाद सरकार नागरिकों की ओर से भुगतान किए गए प्रीमियम पर सब्सिडी देती है. हालांकि ट्रंप प्रशासन में यह योजना प्रीमियम की दरों और बीमा कवर की कोई सीमा न होने को लेकर विवादों में घिर गई है. लेकिन भारत की प्रधानमंत्री जन औषधि योजना सभी के लिए अनिवार्य नहीं है और योग्य लाभार्थियों के लिए भी कवर की अधिकतम सीमा पांच लाख रुपये तय है.
आयुष्मान भारत के लिए चुनौतियां

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कई ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेश अब भी इस योजना से नहीं जुड़े हैं और सरकार उन्हें मनाने की कोशिशें कर रही है.
एक बड़ी बाधा फर्जीवाड़े और सिस्टम के दुरुपयोग को रोकने की भी होगी.
इसके लिए सरकार डिजिटल तकनीक और लाभार्थियों और उनके बिल की जांच करने वाले ज़मीनी स्तर के स्टाफ पर काफी निर्भर है.
आयुष्मान भारत के सीईओ इंदु भूषण कहते हैं, "हमारे पास मज़बूत आईटी बैकअप है, जिसकी मदद से हम पहचान और जांच दोनों करेंगे. ऐसा नहीं होगा कि कोई भी जाकर इस योजना का फायदा ले पाएगा."
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