ग्राउंड रिपोर्ट: कैसे मंदसौर ग़ुस्से और हिंसा की आग में झुलसने से बच गया

Girls from Mandsaur
    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मंदसौर (मध्य प्रदेश)से

मध्य प्रदेश के मंदसौर में एक बच्ची को अगवा कर लिया गया था. अगले दिन जब बच्ची मिली तो जांच के बाद पता चला कि वो बलात्कार और बेरहम हिंसा का शिकार हुई थी.

उस रात तक क़रीब दो लाख की आबादी वाले इस शहर में तनाव फैल चुका था. ज़िले के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया, "चार गाड़ियों के शीशे फोड़ दिए गए और एक ढाबे पर तोड़-फोड़ की घटना हुई".

28 जून तक लोगों का गुस्सा सड़कों पर आने लगा था, हज़ारों लोग घरों से बाहर निकल कर बच्ची के लिए न्याय मांग रहे थे. सबसे बड़ा डर इस बात का था कि कहीं मामले को लेकर दंगे न भड़क जाएं.

जिस ढाबे पर ये वारदात हुई वो एक मुसलमान का था और एक छोटी भीड़ ने कथित तौर पर उसे निशाना इसलिए बनाया क्योंकि गिरफ़्तार किया गया संदिग्ध अभियुक्त मुसलमान था.

Mandsaur

डर और आशंका

ज़िले के मुसलमान समुदाय के नेता और स्थानीय संस्था सीरत कमिटी के अध्यक्ष अनवर अहमद मंसूरी ने कहा कि "घटना के बाद से ही अल्लाह ताला से मना रहे थे कि संदिग्ध हमारी कौम का न निकले".

उन्होंने कहा, "ये सही है कि हमारे समुदाय में इस बात को लेकर डर था कि कहीं घटना दूसरा रुख़ न अख़्तियार कर ले. लेकिन हक़ीक़त ये भी है कि अभियुक्तों की शिनाख़्त करने में हमारे ही समुदाय के लोगों ने प्रशासन की मदद की".

दरअसल, मंदसौर मध्य प्रदेश के मालवा प्रांत का हिस्सा है जहाँ पिछले कुछ वर्षों के दौरान सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं देखी गई हैं.

Mandsaur

कर्फ़्यू का इतिहास

मंदसौर में दो साल पहले कथित गोहत्या को लेकर दो मुस्लिम महिलाओं पर हमला हुआ था जबकि पास के रतलाम ज़िले में 2010, 2014 और 2016 में सांप्रदायिक तनाव के बाद कर्फ़्यू लगाए जाने का इतिहास है.

साल 2017 में मालवा प्रांत में ही बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की हत्या के बाद कर्फ़्यू लगाना पड़ा था.

शायद यही वजह है कि बच्ची के साथ बलात्कार और बेरहम हिंसा की इस घटना के बाद से सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका थी. मंदसौर के पुलिस अधीक्षक मनोज कुमार सिंह के मुताबिक़ जो सड़कों पर दिखा वो घटना के ख़िलाफ़ लोगों का सामूहिक आक्रोश था.

वीडियो कैप्शन, मंदसौर रेप केस में क्या चल रहा है?

उन्होंने कहा, "सांप्रदायिक तनाव का डर बिलकुल था, लेकिन शहर के लोगों ने पुलिस की काफ़ी मदद की है. रहा सवाल मुस्लिम समुदाय में डर का तो यहाँ की पुलिस बहुत न्यूट्रल रही है तो वो नौबत ही नहीं आने दी गई".

उधर बजरंग दल के ज़िला महामंत्री जितेंद्र राठौड़ इस बात से इनकार करते हैं किसी भी समुदाय पर किसी दूसरे का दबाव है.

Manoj Singh, SP

प्रशासनिक तैयारी

उन्होंने बताया, "हो सकता है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों में कोई डर रहा हो. हम और दूसरे हिन्दू संगठनों का मानना यही है कि ये एक घृणित घटना थी. मुझे नहीं लगता यहाँ अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय पर कोई दबाव रहा है अभियुक्तों के ख़िलाफ़ बाहर निकलकर बोलने के लिए. उनको आना भी चाहिए और ये स्वागत के योग्य है. वो इसलिए आए क्योंकि उनकी भी बेटियां हैं".

हालांकि सच ये भी है कि पुराने मामलों को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश प्रशासन ने भी तुरंत अतिरिक्त सुरक्षाकर्मी मंदसौर में भेज दिए थे.

डर इस बात पर भी था कि सोशल मीडिया पर जारी 'फ़ेक न्यूज़' के कारण कहीं हिंसा न भड़क जाए.

Mohammad Arif
इमेज कैप्शन, मोहम्मद आरिफ़

मैंने शहर के कई लोगों के मोबाइल फ़ोन पर पीड़ित बच्ची के नाम के साथ असल तस्वीर और उसके साथ हुए दुष्कर्म के बारे में भड़काऊ मैसेज देखे. लोगों में डर इस बात को लेकर भी था कि ये चुनाव का साल है और ऐसे माहौल में सांप्रदायिक तनाव भड़कने के मामले पहले भी हो चुके है.

मंदसौर में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के बीच काम करने वाली संस्था ईमान तन्ज़ीम के अध्यक्ष मोहम्मद आरिफ़ को लगता है कि "माहौल काफ़ी गर्म हो चुका था, लेकिन जो फ़ैसला लिया गया उससे बात नहीं बिगड़ी".

उन्होंने कहा, "अगले दिन ही मुस्लिम समाज ने ज्ञापन जारी किए कि भले ही अभियुक्त मुस्लिम हो, लेकिन उसने काम मानवता के ख़िलाफ़ किया है. हमारी संस्था अंजुमन ने भी घोषणा कर दी थी अगर अभियुक्त को फाँसी की सजा हुई तो मंदसौर के क़ब्रिस्तान में लाश दफ़नाने की इजाज़त नहीं मिलेगी".

Jitendra Rathore, Bajrang Dal
इमेज कैप्शन, जितेंद्र राठौर, बजरंग दल

मंदसौर में दोनों समुदाय के दर्जनों लोगों से बात करने पर लगा बलात्कार और बेरहम हिंसा वाले इस अपराध के ख़िलाफ़ सभी हैं, लेकिन अनौपचारिक तौर पर बात करने पर तस्वीर के दूसरे पहलू ज़्यादा खुलकर सामने आते हैं.

दोनों समुदाय के लोगों को इस बात का डर था कि अगर कहीं शिनाख़्त होने पर अभियुक्त दूसरे मज़हब का निकला तो उसका असर विपरीत ही पड़ेगा. ये एक ऐसा डर है जिसके कुछ निशान, मंदसौर के अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में आज भी देखे जा सकते हैं.

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