क्या वाकई भारत महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक मुल्क है

महिला सुरक्षा के लिए प्रदर्शन

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    • Author, बीबीसी न्यूज़
    • पदनाम, .

थॉमसन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन ने हाल में एक सर्वे किया है जिसके अनुसार भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश बताया गया है. इस रिपोर्ट के अनुसार युद्धग्रस्त सीरिया और निरंकुश शासन वाले देश सऊदी अरब का स्थान भारत से ऊंचा है. लेकिन सच क्या है?

इस सर्वे के लिए स्वास्थ्य सेवा, भेदभाव, सांस्कृतिक परंपराएं, यौन हिंसा और उत्पीड़न, हिंसा और मानव तस्करी के छह अलग-अलग पैमानों के लिए कुल 548 जानकारों की राय ली गई. उन्हें सबसे पहले संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों की सूची में से सबसे ख़तरनाक पांच देशों के नाम बताने के लिए कहा गया.

इसके बाद उन्हें इन छह पैमानों के आधार पर सबसे ख़तरनाक़ देश का नाम बताने के लिए कहा गया. इनमें से तीन में सांस्कृतिक परंपराएं, यौन हिंसा और मानव तस्करी के पैमानों पर सबसे ऊपर भारत का नाम है.

सात साल पहले किए गए इसी तरह के एक सर्वे में भारत चौथे नंबर पर था. उस वक्त सूची में सबसे ऊपर स्थान था अफ़ग़ानिस्तान का.

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तीखी प्रतिक्रिया

भारत में इस सर्वे की आलोचना हुई है. कइयों का सवाल था कि महिलाओं को कम अधिकार देने वाले सऊदी अरब और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों को इस सूची में बेहतर कैसे दिखाया जा सकता है.

देश की नेशनल कमीशन फ़ॉर वीमेन ने इस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज कर दिया है. कमीशन का कहना है कि जिस देश में महिलाओं को बोलने की आज़ादी नहीं है उनकी स्थिति बेहतर दिखाई गई है.

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आयोग का कहना है कि भारत में बलात्कार, उत्पीड़न और महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी दिखती है क्योंकि लोगों के विरोध के कारण जागरुकता बढ़ी है और अब ऐसे अधिक मामले रिपोर्ट किए जा रहे हैं.

महिला और बाल कल्याण मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि, "भारत को महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक़ देश बताने के लिए सर्वे का इस्तेमाल करना साफ़ तौर पर भारत की छवि ख़राब करने और हाल के सालों में हुई प्रगति से ध्यान भटकाने की कोशिश है."

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किस तरह निष्कर्ष निकाला गया?

ये रिपोर्ट पूरी तरह 548 जानकारों की राय और उनकी समझ को आधार बना कर लिखी गई है. इसमें आकादमिक, नीति निर्माता, पत्रकार और स्वास्थ्य सेवा और अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले लोग शामिल हैं.

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थॉमसन रॉयटर्स फ़ाउंडेशन की प्रमुख मोनिक़ विला ने बीबीसी को बताया कि इनमें से 41 जानकार भारतीय हैं. हालांकि इस सर्वे में शामिल होने वाले अन्य जानकार किन देशों से हैं इसके बारे में जानकारी नहीं है. साथ ही और देशों को कितनी जगह दी गई है ये भी स्पष्ट नहीं है.

रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने कुल 759 जानकारों से संपर्क किया था, लेकिन उनमें से मात्र 548 लोगों ने इस सर्वे में हिस्सा लिया. इसके अलावा रिपोर्ट में इन जानकारों के बारे में और कोई जानकारी नहीं दी गई है.

'पारदर्शिता का अभाव'

भारत में स्वतंत्र रूप से शोध करने वाली संस्था 'सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डिवेलपिंग सोसाइटीज़' के निदेशक संजय कुमार कहते हैं कि रिपोर्ट में "पारदर्शिता का अभाव है" और ये बेहद चिंताजनक है.

वो कहते हैं, "जानकारों को किस तरह से चुना गया? क्या इसमें लैंगिक असमानता थी? ये जानना बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है."

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कॉलेज प्रोफ़ेसर और समाजसेवी रूपरेखा वर्मा ने इस रिपोर्ट का स्वागत किया है. वो कहती हैं, "मैं इस रिपोर्ट के नतीजों से नाखुश नहीं हूं और ये रिपोर्ट ये बताने के लिए काफ़ी है कि हमें अब बैठे नहीं रहना चाहिए."

वो कहती हैं, "इसके लिए शोध का कोई बेहतर तरीका, जमा किए गए आंकड़ों का बेहतर अध्ययन और व्यावहारिक अनुभवों को आधार बनाया जा सकता था. लेकिन अगर पांच सौ से अधिक जानकार इस नतीजे तक पहुंचे हैं तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. ये किसी आम आदमी की राय नहीं है बल्कि ये हर तरह की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों की राय पर आधारित है."

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क्या किसी की 'समझ'ऐसे सर्वे का सही आधार हो सकती है?

संजय कुमार इससे इनकार करते हैं. वो कहते हैं कि देशों की तुलना करने के लिए कई पैमानों के आधार पर सरकारी आंकड़े और सार्वजनिक तौर पर जानकारी उपलब्ध है, लेकिन इन सभी आंकड़ों को नज़रअंदाज़ करते हुए इस तरह के सर्वे के लिए 'जानकारों की समझ' को आधार बनाना जल्दीबाज़ी करने जैसा है".

वो कहते हैं, "अगर आंकड़े भरोसा करने लायक ना लगते हों तो उनके आधार पर रैंकिंग तैयार की जानी चाहिए. समझ के आधार पर रैंकिंग तभी की जानी चाहिए जब उस तरह को कोई आंकड़ा मौजूद ही ना हो."

एसिड हमले की पीड़िता

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कुमार का कहना है कि रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे के लिए 'कई तरह के तरीकों' का इस्तेमाल किया गया जिसमें फ़ेस-टू-फ़ेस साक्षात्कार, ऑनलाइन और फ़ोन के ज़रिए किए गए साक्षात्कार का इस्तेमाल किया गया है- ये भी एक समस्या है.

"मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि अलग-अलग साक्षात्कर के तरीकों से आपके अलग-अलग नतीजे मिलते हैं. नतीजों का आधार एक ही होना चाहिए. इस मामले में लगता है कि सुविधा के आधार पर केस इंटरव्यू किए गए हैं, हम ऐसा मान सकते हैं क्योंकि इसके संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है. सर्वे करने का ये कोई सही तरीका नहीं, ख़ास कर तब जब आप इसका प्रचार भी कर रहे हों. ये जल्दीबाज़ी में किया सर्वे लगता है जिसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए."

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"समझ" की बात करें तो भारत के लिए ये हारी हुई लड़ाई है

गीता पांडे, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

क्या भारत वाकई में महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक़ देश है? सीरिया और सऊदी अरब से भी अधिक ख़तरनाक़?

रॉयटर्स के इस सर्वे के सामने आने पर भारत सरकार ने तुरंत ही खारिज कर दिया. लेकिन भारत के लिए गर्व करने की कोई बात नहीं है. साल 2016 में महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए अपराधों के आधिकारिक आंकड़ों पर नज़र डालें तो हर 13 मिनट में एक महिला का बलात्कार हुआ है, हर दिन एक महिला का सामूहिक बलात्कार हुआ है, हर 69 में दहेज के लिए एक महिला की हत्या हुई है और हर महीने 19 महिलाएं तेज़ाब के हमले का शिकार हुई हैं.

इसके साथ यौन हिंसा, सड़कों पर छेड़छाड़, छिप पर महिलाओं के देखने और घरेलू हिंसा के हज़ारों-हज़ार मामले हैं जिनके बारे में रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है और ये सब एक अंतहीन खाई की तरह दिखता है.

लेकिन इस सब कमियों के बावजूद भारत एक ऐसा गणतंत्र है जहां क़ानून का शासन है. भारत में रहने और काम करने वाली एक महिला के तौर पर कहा जा सकता है कि यहां महिलाओं को आज़ादी मिली है और उन्हें उनके हक़ मिले हैं. सीरिया, अफ़गानिस्तान और सऊदी अरब के साथ भारत की तुलना नहीं की जा सकती जहां अभी कुछ दिन पहले तक गाड़ी चलाने पर महिलाओं को जेल हो सकती थी. ये सेब के साथ संतरे की तुलना करने जैसा है.

तो क्या ये रैंकिंग वाकई चिंताजनक है? कहा जाए तो हां - क्योंकि इससे पता चलता है कि समझ के आधार पर भारत अपनी छवि सुधारने की लड़ाई हार चुका है और कई बार आपकी छवि क्या है इसका असर पड़ता है.

और इसीलिए सर्वे को खारिज करने की बजाय ये भारत के लिए अपने भीतर झांक कर देखने का और ये सोचने का वक्त है कि महिलाओं की स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है. और ये कि भारत कैसे विश्व समुदाय को आश्वस्त करे कि भारत महिलाओं के लिए ख़तरनाक़ देश नहीं है और उसे इस सूची से निकलने की कोशिश होनी चाहिए.

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युद्धग्रस्त सीरिया में महिलाएं

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और कौन हैं इस सूची में?

कई सालों से युद्ध से परेशान अफ़ग़ानिस्तान और सीरिया इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं जबकि सऊदी अरब और पाकिस्तान पांचवें और छठे सस्थान पर हैं.

आश्चर्यजनिक तौर पर इस सूची में अमरीका दसवें स्थान पर है और यौन हिंसा के मामले में ये तीसरे स्थान पर है.

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली ज़ाकिया सोमन ने एक जानकार के तौर पर इस सर्वे में भी हिस्सा लिया था. उन्होंने बीबीसी को बताया, "ये रैंकिंग के बारे में नहीं है. हमारे समाज में स्त्री के साथ भेदभाव होता है और ये पितृसत्तात्मक समाज है."

"हमें इस सर्वे को सही मायनों में लेना चाहिए और इस बहाने ख़ुद पर एक नज़र डालनी चाहिए कि आख़िर एक समाज के तौर पर हम कहां ग़लत हैं?"

वो कहती हैं कि कोई उम्मीद नहीं करता कि सोमालिया और सऊदी अरब जैसे देशों में महिलाओं की ज़िंदगी आसान होगी. लेकिन भारत जैसे गणतंत्र में इस तरह की उम्मीद की जाती है.

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क्या इस रिपोर्ट में पितृसत्ता पर भी बात की गई है?

क्या भारत की तुलना सऊदी अरब जैसे देशों से करना उचित है जहां सार्वजनिक तौर पर महिलाओं का कोई स्थान ही नहीं है? क्या उन्हें उनके घरों तक सीमित रखने को उनकी "सुरक्षा" माना जाए.

रूप रेखा वर्मा कहती हैं, "ये सभी जानते हैं कि सऊदी अरब में महिलाओं को सार्वजनिक जगहों तक पहुंच के अधिकार नहीं हैं. लेकिन ये भी सच है कि उन्होंने कुछ दिन पहले महिलाओं को ड्राइविंग करने की इजाज़त दे दी है जो सकारात्मक संकेत है. मेरे लिए ये इस बात की ओर इशारा है कि देश तरक्की कर रहा है और बदल रहा है. उसकी तुलना भारत के साथ करना सही नहीं है. लेकिन हम अपने भीतर झांक कर देखें तो पता चलता है कि हम कुछ अधिक नहीं बदले हैं."

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ऐसे में सवाल उठता है कि सर्वे का आधार क्या होना चाहिए था.

संजय कुमार कहते हैं कि देशों की तुलना और उनकी रैंकिंग के लिए बेहतर और अधिक विश्वसनीय तरीकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

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