ब्लॉग- जय शाह मामले का फ़ायदा उठा पाएंगे राहुल?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता दिल्ली
कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी 'मोदी-शाह' के गढ़ गुजरात के दौरे पर गए तो ये बात समझ में आती है क्योंकि राज्य में दो महीने में विधानसभा चुनाव होने जा रहा है.
लेकिन अमित शाह राहुल गाँधी के गढ़ अमेठी में क्या करने गए थे? सोशल मीडिया पर कुछ लोग ये सवाल उठा रहे हैं.
जाहिर तौर पर बीजेपी अध्यक्ष शाह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ अमेठी में विकास की कई योजनाओं का उद्घाटन करने गए थे.
लेकिन अमित शाह का भाषण सियासी था जिसमें उन्होंने राहुल गाँधी के चुनावी क्षेत्र में विकास की कमी को उजागर किया.
राहुल 2014 चुनाव में अमेठी से तीसरी बार चुनाव जीते थे लेकिन शाह के अनुसार, उन्होंने वहां विकास पर ध्यान नहीं दिया. शाह ने तंज़ कसते हुए कहा कि 'शहज़ादे' (राहुल गाँधी) को गुजरात के बजाय अमेठी का दौरा करना चाहिए.
बीजेपी नेता राहुल गांधी की आलोचना करने में कोई मौक़ा नहीं छोड़ते. लेकिन 2014 के आम चुनाव में ज़बरदस्त हार के बाद से ऐसा लगता है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष की खोई हुई आवाज़ वापस आ गई है.

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बीजेपी दबाव में?
अमित शाह के बेटे जय शाह को लेकर राहुल गाँधी ने जिस तरह से आक्रामक रुख अपनाया है उससे उनकी आवाज़ सियासी गलियारों में ज़ोर से सुनाई दे रही है.
ऐसा लगता है कि उनका खोया हुआ आत्मविश्वास भी वापस आ गया है.
जय शाह को लेकर आई ख़बरों के बाद सोशल मीडिया प्लेटफ़ार्म ट्विटर पर राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ललकारते हुए पूछा, "मोदी जी जय शाह 'जादा' खा गया! आप चौकीदार थे या भागीदार? कुछ तो बोलिए."
प्रधानमंत्री की बेटी बचाओ मुहिम के पृष्ठभूमि में उन्होंने तंज़ अंदाज़ में कहा कि 'बेटी बचाओ से बेटा बचाओ' का बदलाव जल्द हुआ.
राहुल गाँधी ने निशाना सीधा प्रधानमंत्री पर लगाया. नरेंद्र मोदी ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है लेकिन कई विशेषज्ञों के अनुसार, अमित शाह की प्रतिक्रियाएं रक्षात्मक तरीके की थीं. पिछले आम चुनाव के बाद पहली बार बीजेपी दबाव में नज़र आती है.

आक्रामक कांग्रेस
अमित शाह और राहुल गाँधी दोनों के लिए एक-एक सवाल है. अमित जी, अमेठी में राहुल गाँधी की बुराई करने से उनके गढ़ में उनकी जड़ें कमज़ोर हो जाएंगी?
राहुल जी, सरकार को आड़े हाथों लेने के लिए आपको पिछले साढ़े तीन-चार सालों में कई मौक़े मिले, लेकिन आपने उन्हें खो दिया. इस बार भी आप से चूक तो नहीं हो जाएगी?
जय शाह के मुद्दे को लेकर कांग्रेस पार्टी की रणनीति में आक्रामक दिखाई देती है. अगर राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर हमला किया तो पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके बीजेपी से जय शाह को लेकर चुभते सवाल किए.
उधर पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री से जय शाह के मामले में अदालती जांच की मांग की. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री को इस मुद्दे पर चुप्पी तोड़नी चाहिए और एक जांच आयोग के गठन के आदेश देने चाहिए.
कांग्रेस ने सरकार को बैकफुट पर ज़रूर कर रखा है लेकिन क्या पार्टी के लिए 2019 के आम चुनाव तक ये दबाव बनाये रखना आसान होगा?
पिछले चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस चारों खाने चित नज़र आती थी. इसे सियासी अखाड़े में वापसी के कई मौके मिले.
इस बात पर सर्वसहमति है कि कांग्रेस को सबसे बड़ा मौक़ा नोटबंदी के समय मिला था जिसका फ़ायदा उठाने में पार्टी बुरी तरह से नाकाम रही.
उधर राहुल गाँधी की लीडरशिप को लेकर खुद कांग्रेस के अंदर भरोसा उठता नज़र आ रहा था.

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सोशल मीडिया पर कांग्रेस भारी
बीजेपी ने सोशल मीडिया पर राहुल गाँधी को 'पप्पू' बताकर उनकी छवि खराब करने की भरपूर कोशिश कर रखी थी. आम आदमी ने भी राहुल गाँधी के बारे में एक राय बना बनाई जिसे राहुल सुनना पसंद नहीं करेंगे.
लेकिन पिछले कुछ महीनों से राहुल गाँधी के बारे में लोगों की राय बदलती दिखाई देती है. अमरीका के बर्कले विश्वविद्यालय में उनके भाषण को काफी सराहा गया.
उनके भाषण से बीजेपी घबराई हुई नज़र आई, वरना पार्टी राहुल गाँधी को काउंटर करने के लिए केंद्रीय मंत्रियों और प्रवक्ताओं की फौज को मैदान में क्यों उतारती.
कांग्रेस और राहुल गाँधी पर हमलों के लिए बीजेपी ने सोशल मीडिया का दबंग तरीके से इस्तेमाल किया है. इस बार सोशल मीडिया ने बीजेपी के मंत्रियों के बयानों पर अधिक ध्यान नहीं दिया.
बीजेपी की इस नकारात्मक प्रतिक्रिया से लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि अब सत्तारूढ़ पार्टी राहुल गाँधी को गंभीरता से लेने लगी है.
जय शाह से संबंधित ख़बरों पर राहुल गाँधी के आक्रामक रुख के बाद अब बीजेपी ये नहीं छिपा सकती कि वो वाकई दबाव में है.

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राहुल की स्थिति सुधरी
ऐसी ख़बरें आ रही हैं कि राहुल गाँधी जल्द ही अपनी माँ सोनिया की जगह पार्टी अध्यक्ष बना दिए जाएंगे.
पार्टी की दिल्ली और जम्मू कश्मीर शाखाओं ने तो इस पर एक प्रस्ताव भी पारित कर दिया है. कांग्रेस के अंदर राहुल गाँधी की लीडरशिप पर शक दूर होता नज़र आता है.
कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन में भी उन्हें ही कांग्रेस का अब सबसे बड़ा नेता माना जाने लगा है.
मगर कांग्रेस का 'शहज़ादा' क्या अब विपक्ष का 'शहंशाह' हो गया है?












