नज़रियाः जय शाह के बचाव में क्यों उतरे राजनाथ सिंह?

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केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह के बचाव में कहा है कि उनके ख़िलाफ़ लगे आरोप निराधार हैं और इनकी जांच की ज़रूरत नहीं है.
न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह की कंपनी के कारोबार के संबंध में छपी ख़बर पर पहले केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल सामने आए और अब गृह मंत्री राजनाथ सिंह.
इस मुद्दे पर बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल ने वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामाशेषन से विस्तृत बातचीत की.
इस पूरे मामले पर पढ़ें राधिका रामाशेषन का नज़रिया-

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इसकी पुरानी भूमिका है. 2014 में जब यह सरकार बनी तब यह ख़बरें आ रही थीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनाथ सिंह के बेटे पर भ्रष्टाचार की शिकायतें आने से नाराज़ थे.
इकोनॉमिक टाइम्स में ही ख़बर छपी थी कि प्रधानमंत्री ने पंकज सिंह को बुलाकर ऐसे काम नहीं करने की सलाह दी थी जिससे सरकार की बदनामी होती है.
उसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ ने एक बयान जारी कर इसका खंडन किया कि पीएम ने ऐसा कुछ नहीं कहा.
दो दिन के बाद अमित शाह ने रोहिणी सिंह को ही इंटरव्यू दिया, जिसमें कहा गया था कि राजनाथ सिंह या उनके बेटे किसी शक के दायरे में नहीं हैं.

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राजनाथ का बयान अहम
इससे इस बात के संकेत मिले कि उस वक्त नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह के बीच खटास सी आ गई थी.
तब ख़बरों में लगातार यह भी छप रहा था कि राजनाथ सिंह को जो अहमियत मिलनी चाहिए वो उन्हें नहीं मिल रही थी.
इसी कारण राजनाथ सिंह का जो बयान अब आया है, वो बहुत अहम है. राजनाथ सिंह इस सरकार में नंबर दो हैं.
इस भूमिका में इस बयान की, राजनीतिक रूप से बहुत अहमियत है.

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ख़तरे में बीजेपी का 'वंशवाद मुक्त, भ्रष्टाचार मुक्त नारा'
गुजरात विधानसभा में यह मामला मुश्किल खड़ी कर सकता है. उनके वोट घटेंगे या बढ़ेंगे ये नहीं कहा जा सकता. बीजेपी 'वंशवाद मुक्त और भ्रष्टाचार मुक्त' होने का दावा करती है.
जय शाह के मामले में ये दोनों दावे लड़खड़ाते हैं. हालांकि आप अगर 'द वायर' की स्टोरी गौर से पढ़ें तो ऐसा नहीं लगता है कि कोई अवैध काम हुआ है.
भ्रष्टाचार हो या न हो लेकिन कहीं न कहीं बीजेपी अध्यक्ष के बेटे को फ़ायदा तो मिला है. वो भले राजनीति में नहीं हैं.
अगर आम आदमी कर्ज़ लेने जाए तो जब तक 'सॉलिड कॉलैटरल' नहीं दिखाते तो क्या कर्ज़ मिल जाता है?
लंबे अरसे से बीजेपी गुजरात में सरकार में है.
1970 के दशक में नवनिर्माण का आंदोलन गुजरात में सबसे ज़्यादा सफल हुआ था और वो भी चिमनभाई के भ्रष्टाचार के खिलाफ़. भ्रष्टाचार के विरोध का मुद्दा गुजरात के लोगों के बीच सफल रहा, इसलिए दिसंबर में आने वाले विधानसभा चुनाव में इसका असर देखना दिलचस्प होगा.

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क्या मोदी, अमित शाह पर सीमित बीजेपी?
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा जैसे पुराने बीजेपी नेता कह रहे हैं कि पार्टी केवल ढाई लोगों के कंधे पर चल रही है. कुछ हद तक यह सही भी है.
जो सर्वसम्मति आडवाणी या मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में देखने को मिलती थी वो कहीं नहीं है. सारे अहम फ़ैसले इस सरकार में एक या दो व्यक्ति लेते हैं.
पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा अभी तक सरकार के निशाने पर थे, लेकिन अब अमित शाह के बेटे जय शाह का कथित मामला सामने आने के बाद कांग्रेस के पास भी जवाब है, भले ही इस मामले में कुछ ठोस हो या नहीं.
2014 से बीजेपी को देखने वाले पत्रकारों को बताया जाता है कि पार्टी में सर्वसम्मति जैसा कुछ नहीं, कुछ मिनटों में बैठकें निपट जातीं हैं, केंद्रीय कमेटी, संसदीय बोर्ड और राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठकें होती हैं, कोई बहस और प्रस्तावों में बदलाव जैसा कुछ नहीं होता, चंद लोग फ़ैसले लेते हैं.

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अमरीका के बर्कले यूनिवर्सिटी में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर अर्थव्यवस्था, रोज़गार और अन्य कई मामलों में घेरा तब भी कई मंत्रियों ने आकर जवाब दिया.
ऐसे में ख़बरें आने लगी कि अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भी आंकड़े कमज़ोर हैं.
रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के आंकड़ों के साथ जब ये ख़बरें आने लगीं कि रोज़गार नहीं हैं, तो राहुल गांधी की बात को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होना ही था.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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