महिलाओं के लिए लड़ने वाले संगठन के 50 साल

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- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिंदी के लिए
'बिहार महिला समाज' ने अपने आंदोलन के 50 साल पूरे कर लिए हैं. बिहार की महिलाओं को कई क्षेत्रों में हक़ दिलाने और उनके सशक्तिकरण में इस संगठन के संघर्ष की अहम भूमिका रही है.
साल 1967 के अगस्त में चार महिलाओं ने इस संगठन की रूपरेखा तैयार की थी. ये महिलाएं थीं: उर्मिला प्रसाद, नलिनी राजिमवाले, नीलिमा सरकार और प्रोफ़ेसर गौरी गांगुली. ये सभी वामपंथी विचारधारा में यक़ीन रखती थीं. 10 सिंतबर, 1967 को विमला फ़ारूक़ी की देखरेख में महिला समाज के पदाधिकारियों का चयन हुआ था. एक ज़माने में अरुणा आसफ अली जैसी भारत की मशहूर नेत्रियों की सरपरस्ती भी इस संगठन को हासिल हुई थी.

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राज्य में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत महिला समाज ने की थी. साल 1968 में सूबे में पहली बार यह दिन मनाया गया. तब इस दिन को दहेज विरोधी दिवस के रूप में मनाया गया था. महिला समाज ने दहेज नहीं लेने वालों को सम्मानित करने की शुरुआत भी की थी. दहेज नहीं लेने के लिए शपथ पत्र अभियान चलाया गया था.

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जब पटना ने इतनी महिलाओं को देखा
1970 में 10 दिसंबर को महिला समाज ने पटना में बहुत बड़ा जुलूस निकाला था और विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया था. बताया जाता है कि पटना के लोगों ने महिलाओं का इतना बड़ा प्रदर्शन पहली बार देखा था और वे इसे अचरज के साथ देख रहे थे. इतना ही नहीं तब तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने आकर जुलूस को संबोधित किया था और उनकी मांगों का समर्थन किया था.
प्रतिभा सिन्हा अपने छात्र जीवन के दौरान 1972 में बिहार महिला समाज से जुड़ गई थीं. बाद में उन्होंने संगठन के राज्य सचिव पद की ज़िम्मेदारी भी संभाली.
वह बताती हैं, ''हम विचार-गोष्ठी, जुलूस, प्रदर्शन, धरने के ज़रिए अपनी बात प्रशासन तक पहुंचाते थे. कई बार प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज हुआ, हम जेल भी गए. वर्तमान समय की चुनौतियां अलग हैं और संघर्ष का तरीका बदलने की भी ज़रूरत है.''
पटना की रमा चटर्जी संगठन की वरिष्ठ सदस्य हैं. उन्होंने संगठन के काम करने के तरीके के बारे में बताया, ''महिलाओं की रोज़मर्रा की परेशानियों में, संघर्षों में उनका साथ देकर पहले हम उनका यक़ीन जीतते थे. हम उन तक सरकारी योजनाओं की पहुंच सुनिश्चित करते थे. तलाक़ और महिला हिंसा जैसे मामलों में हम ख़ुद से पहल कर उनकी मदद करते थे. इस तरह से हम महिलाओं को गांवों से लेकर शहरों तक में जोड़ने का काम करते थे. इसके बाद वे पटना क्या पूरे देश में संघर्ष के लिए आगे आती थीं.''

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सिलसिलेवार कई आंदोलन
मंहगाई के ख़िलाफ किए गए एक प्रदर्शन से जुड़ा एक ख़ास वाक़या रमा चटर्जी कुछ इस तरह याद करती हैं, ''हम मंहगाई के सवाल पर मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे तो हमें रोका गया. हमने बैरीकेड तोड़ा तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया. तब मैंने एक महिला पुलिसकर्मी की उसी के डंडे से यह कहते हुए पिटाई कर दी कि क्या तुम्हारे लिए मंहगाई नहीं है.''
1980 के दशक में राजस्थान में हुए बहुचर्चित रूपकुंवर सती कांड का महिला समाज ने रांची में ज़बरदस्त विरोध किया था. रूपकुंवर रांची में ही पली, बढ़ी थीं. पिछली सदी में जब बिहार और झारखंड एक राज्य हुआ करते थे तब इस संगठन ने पड़रियां बलात्कार कांड, आदिवासी महिलाओं और मज़दूर महिलाओं के अधिकार, भूकंप राहत कार्य, सांप्रदायिक दंगों जैसे मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप किया था.
दहेज, दहेज हत्या, महिला हिंसा, विधायिका में महिला आरक्षण, महिलाओं को नौकरी में आरक्षण सहित महिला हक के लगभग सभी मुद्दों पर महिला समाज ने सूबे और देश के स्तर पर आवाज़ बुलंद की है.
यह संगठन राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय महिला फेडरेशन से जुड़ा है. बिहार महिला समाज ने 1991 में बेगूसराय और 2008 में पटना में भारतीय महिला फ़ेडरेशन के दो अधिवेशनों की मेज़बानी की है.

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फ़िर से पहचान पाने को सक्रिय
भारत के बाहर भी महिला समाज की नेत्रियों ने महिला संगठनों के कार्यक्रमों में शिरकत की थी. उर्मिला प्रसाद बिहार महिला समाज के संस्थापकों में से एक थीं. ऐसे ही एक कार्यक्रम में भाग लेने वह बांग्लादेश गई थीं.
एक ज़माने में बहुत ही मज़बूत माना जाने वाला यह संगठन अभी फिर से अपनी पहचान वापस पाने के लिए सक्रिय हुआ है. हाल के सालों में इसने बिहार के शराबबंदी कानून के महिला विरोधी प्रावधानों के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई है. संगठन से जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का मानना है कि आज मुद्दे तो कई हैं, मगर इनमें से सही मुद्दे को पकड़ने की ज़रूरत है.

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अगस्त के अंत में अपने स्वर्ण जयंती के मौके पर बिहार महिला समाज ने विचार गोष्ठी और फ़ोटो-प्रदर्शनी सहित कई कार्यक्रमों का आयोजन किया. इस मौके पर एक स्मारिका भी प्रकाशित की गई.
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