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पिता हमारे सबसे बड़े आदर्श: बॉबी दओल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बौबी देओल ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत यूं तो दस साल की उम्र में अपने पिता धर्मेन्द्र की फ़िल्म 'धरमवीर' में उनके ही बचपन की भूमिका निभाकर कर दी थी लेकिन राजकुमार संतोषी की फ़िल्म बरसात से विधिवत बतौर नायक अपने करियर की शुरुआत करने और सर्वश्रेष्ठ नवोदित अभिनेता का ख़िताब जीतने के बाद भी उनका करियर सफलता के उत्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया. हालांकि इस बीच वे 'सोल्जर', 'गुप्त' और '23 मार्च 1939– शहीद' से लेकर 'अपने' तक सफल और असफल फ़िल्मों की कतार में लगे रहे. इसी हफ्ते रिलीज़ होने वाली निर्देशक संगीत सिवान (मशहूर निर्देशक संतोष सिवान के भाई) की नई फ़िल्म 'एक: द पॉवर ऑफ़ वन' से वे एक बार फिर धमाकेदार एक्शन हीरो की तरह वापसी कर रहे हैं. यह भी माना जा रहा है कि इस फ़िल्म से बौबी का करियर एक बार फिर अपनी रफ़्तार पकड़ लेगा. यह अलग बात है कि जब उनकी फ़िल्म 'चमकू' बॉक्स ऑफ़िस पर लुढ़क गयी तो भी उनका मानना था कि उन्होंने अपनी भूमिका पूरी ईमानदारी से की और दर्शकों की प्रतिक्रया के विरूद्ध जाने का मतलब है उनकी भावनाओं को पहचानने में भूल करना. बौबी इस बार क्या लगता है कि 'एक: द पावर ऑफ़ वन' से आपको खुद को साबित करने में मदद मिलेगी? मैं इस बारे में दावा नहीं कर सकता. मैंने आज तक जितनी भी फ़िल्में कीं, मेरे हिसाब से वे सभी शानदार पटकथा वाली थीं लेकिन कई बार चीज़ें लोगों तक पहुँचते-पहुँचते बदल जाती हैं. मुझे यकीन है कि इस बार भी लोगों को मेरा काम पसंद आएगा. इसमें ऐसा क्या है. यह तो तेलुगू की त्रिविक्रम श्रीनिवासन की फ़िल्म ‘अथाडू’ की रीमेक है और हमारे यहाँ कुछ रीमेक ही चल पाए हैं? ऐसी बात नहीं है. यदि उनकी कहानी के व्याकरण और पटकथा की सही तरीके से व्याख्या की जाये तो वे लोगों को पसंद आती हैं. इसलिए "एक" की कहानी को भी हम पंजाब लेकर गए हैं. यह एक ऐसे युवक की कहानी है जिसे बिना किसी वजह एक राजनेता का हत्यारा मान लिया गया है लेकिन जब उसे बचाते हुए एक दूसरा युवक मारा जाता है तो उसकी ज़िंदगी बदल जाती है. यह भूमिका ज़िंदगी और मौत के बीच मानवीय संबंधों को दिखाने वाली फ़िल्म है. पर इसमें नाना पाटेकर जैसे मंजे हुए अभिनेता के सामने आपने ख़ुद को कैसे संतुलित किया. उनके सामने कई अभिनेता ढेर हो जाते हैं? वे मेरे पिता के बड़े प्रशंसक हैं और अभिनय के माहिर भी. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और अपने पिता के बारे में सुना भी है. आप अपने पिता के बारे में क्या सोचते हैं? दरअसल मेरे पिता इस मामले में हमारे सबसे बड़े आदर्श हैं. अपने लगभग पचास साल के करियर में उन्होंने लम्बा संघर्ष किया लेकिन उन्होंने कभी सुपर स्टार बनने के लिए काम नहीं किया. उनके सामने कई सुपर स्टार आये और चले गए पर वे अपनी जगह जमे रहे.
उन्होंने आज तक जितना काम किया उसे लोगों ने विशेष सम्मान के साथ स्वीकार किया. हमारे सारे परिवार के लिए वही सब कुछ हैं. वे कहते हैं जो लोग हमें पसंद करते हैं उन्हें हमें नापसंद करने का भी पूरा अधिकार है इसलिए जब कभी हमारी फ़िल्में नहीं चलतीं तो हम अफ़सोस करने के बजाय सोचते हैं कि हमसे कहाँ ग़लती हुई. आपके पिता अभिनेता और राजनेता भी हैं? मैं राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानता. आप मुझसे फ़िल्मों और अभिनय की बात करेंगे तो शायद में बेहतर जवाब दे सकूँगा लेकिन राजनीति के बारे में कुछ पूछेंगे तो फ़ेल हो जाऊँगा. (हंसते हैं) वो उनका समाजसेवा से जुड़ा क्षेत्र है और हम सब उनके साथ हैं बस. सनी के बाद अभय देओल के साथ बाकी का परिवार, ऐशा और अहाना भी अब मैदान में हैं? मेरा परिवार मेरा सबसे बड़ा आधार है. मुझे ख़ुशी होती है जब मैं सुनता हूँ कि हममें से किसी ने बेहतर काम किया. अभय ने देव डी में शानदार काम किया है. फिर भी आपका परिवार लोगों से छुपा रहता है. आपके पिता ने भी कभी अपने परिवार को लोगों के सामने नहीं आने दिया जबकि आपकी होम प्रोडक्शन कंपनी विजेयता फ़िल्म्स आपकी बहन के नाम पर ही है? किसी का भी परिवार और उनका आपसी संबंध निहायत व्यक्तिगत होता है. हम जिस प्रोफ़ेशन में काम करते हैं उसमें हमारे परिवार की भूमिका केवल घर तक होती है. उसके बारे में बात करने का किसी को अधिकार नहीं. पर आपकी अब तक की फ़िल्मी यात्रा पर बात की जा सकती है. उसके बारे में क्या सोचते हैं? मैं यहाँ अपने पिता और भाई की तरह लोगों की पसंद का बेहतर काम करने आया हूँ. मैंने बरसात से लेकर चमकू तक हर वर्ग और फ़्लेवर की फ़िल्में की. इनमें मेरी सोल्जर, बिच्छू, बादल और ‘चमकू’ जैसी फ़िल्मों की नेगेटिव और ‘अपने’ के बाद ‘नन्हे जैसलमेर’ , ‘हीरोज़’ और ‘करीब’ जैसी रोमांटिक और सामाजिक सरोकार वाली फ़िल्में भी शामिल हैं. पर मैं हर फ़िल्म के साथ उसके ब्लाकबस्टर होने के बारे में नहीं सोचता और यदि मेरी फ़िल्में लोगों को पसंद नहीं आतीं तो असफलता भूलकर अपनी अगली फ़िल्म के बारे में सोचने लगता हूँ. अपने पिता की कौन से फ़िल्में पसंद हैं? सभी. उन्होंने अपनी शुरुआत ‘रेलवे प्लेटफ़ॉर्म’ जैसी साधारण फ़िल्म से की लेकिन उन्होंने दिल भी तेरा हम भी तेरा से लेकर शोले, जीवन मृत्यु, देवर, क्रोधी, राजपूत, छत्रिय, जॉनी गद्दार के बाद मेट्रो और अपने जैसी फ़िल्मों में जो भूमिकाएँ कीं उन्हें भुलाया नहीं जा सकता. और सनी की, वे तो अब निर्देशक भी हो गए हैं. आप इस बारे में नहीं सोचते? दरअसल ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आसानी से नहीं दिया जा सकता. मेरे लिए उनकी हर फ़िल्म एक सबक की तरह है. जहाँ तक निर्देशन की बात है तो सनी एक परिपक्व अभिनेता और निर्देशक हैं. मैं तो अभी सीख रहा हूँ. निर्देशन फ़िलहाल मेरे बस की बात नहीं. आपका पूरा परिवार कभी एक साथ किसी फ़िल्म में दोबारा दिखेगा? यदि ऐसी कोई पटकथा होगी तो जरूर साथ होंगे. अपने के बाद मैं और पापा अपने होम प्रोडक्शन की फ़िल्म 'चियर्स' तो कर ही रहे हैं. आप इतनी कम फ़िल्म करते हैं. फिर भी अब आपकी आने वाली फ़िल्में कौन सी हैं? जहाँ तक कम फ़िल्मों की बात है तो मैं साल में आधा दर्जन फ्लॉप फ़िल्में करके लोगों का दिल नहीं दुखाना चाहता. मैं चाहता हूँ कि ऐसी फ़िल्में करूं जो लोगों को पसंद आएं. इस साल भी मेरी 'चियर्स' के बाद समीर कार्निक की 'रोशन', अनुभव सिन्हा की 'एअरपोर्ट' जैसी फ़िल्में रिलीज़ होंगी. |
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