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बीबीसी एक मुलाक़ात-दलेर मेहंदी के साथ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. इस शो में हमारे साथ हैं पंजाबी पॉप म्यूजिक में ख़ासा नाम कमा चुके एक ऐसे शख़्स जो बहुत बचपन से ही गुरुद्वारे में गायकी करते रहे हैं. अपने इस सफ़र के दौरान काफ़ी कठिन समय देखने के बावजूद हार न मानने वाले दलेर मेंहदी हैं हमारे साथ... पंजाबी पॉप म्यूजिक में आपका इतना बड़ा नाम है. क्या आपने शुरू से ही सोचा था कि मुझे यही करना है? जब में 14-15 साल का था तो मैं किसी फ़िल्मी पत्रिका को उठाकर ख़ुद ब ख़ुद कहने लगता था कि अमुक गाना दलेर सिंह ने गाया है. मुझे ये तो पता था कि गायकी में मेरा नाम होगा और मैं एक मुक़ाम हासिल करूंगा. लेकिन ये नहीं पता था कि पंजाबी गायकी में नाम होगा. और ये किस उम्र में हुआ होगा? जब मैं पाँच साल का था तो मेरे पिताजी ने मुझे कुछ शब्द सिखाए थे. वे थे ‘मेरे लाल जियो, तेरा अंत न जाणा....’. मैं 1972 की बात कर रहा हूँ. हम धनबाद में रहते थे. वहाँ एक ही गुरुद्वारा हुआ करता था. हर शनिवार-इतवार को जब हर गुरुद्वारे जाते तो मेरे पिता अजमेर सिंह चंदन और माता बलवीर कौर कहतीं थी कि अब हमारा बेटा शबद कीर्तन पढ़ेगा और आप इसे आशीर्वाद दें. तब मैं अपना फेवरिट, ‘मेरे लाल जियो..’ गाता था. जब मैं सात साल का हुआ. मुझे याद है तब दुर्गापुर स्टील प्लांट के बैनाचट्टी गुरुद्वारा में मेरा पिता ने मुझे तबला दिया और मुझे सिखाने लगे. मुझे लगा कि वे मुझे तबला क्यों सिखा रहे हैं. तब उन्होंने मुझसे कहा कि जो गायक होता है उसे तबला बजाना भी आना चाहिए. उन्हीं दिनों फ़िल्म ‘कच्चे धागे’ भी रिलीज़ हुई थी. फ़िल्म बॉबी का गाना ‘तौबा मेरी...’ बहुत हिट था. कोई जब मुझसे गाने के लिए कहता तो मैं शुरू करता, ‘बेशक मंदिर-मस्जिद...’ और लोग कुछ देर के लिए ही सही ठहर जाते. मुझे खुशी होती कि मुझे गाने के दम पर हर जगह एंट्री मिल जाती. आपके पिताजी सच में बहुत दूरदर्शी थे? मेरे माता-पिता का मेरी सफलता में बहुत योगदान है. मेरे पैदा होने से पहले ही उन्होंने मेरा नाम दलेर सिंह रख लिया था. मेरी मां उस समय संगीत सीख रही थी. जब मैं पैदा होने वाला था तो डॉक्टर ने उन्हें आराम की सलाह दी, लेकिन उन्होंने अपने उस्ताद बुलाकी बाबू की सलाह पर रियाज़ जारी रखा. उन्होंने कहा कि यही सही वक्त है, अब मैं जो भी तुम्हें सिखाऊँगा, वो तुम्हारा बच्चा सीखेगा. और फिर पहली बार स्टेज पर भांगड़ा के साथ. कैसा अनुभव रहा? हम लोग बाद में बिहार से दिल्ली आ गए. फिर बचपन से ही मेहंदी हसन, बेग़म अख़्तर, बड़े ग़ुलाम अली खाँ को सुनने को मिला. इन नामों को देखते हुए किसी बड़े नाम का शागिर्द बनने की इच्छा थी. ऐसे उस्ताद की तलाश थी जो ये सारे रंग जानता हो. हम कुछ दोस्तों ने अंडमान निकोबार घूमने की योजना बनाई. अपनी बहन चरणजीत से पैसे मांगे. उनकी पैर की चांदी की झांजर 70 रुपये में बेची. फिर अचानक काठमांडू जाने की योजना बनी. इसी दौरान मुझे गोरखपुर में अपने उस्ताद मिले राहत अली खां. मैंने उन्हें अपना गाना सुनाया और दो साल मैं उनका शागिर्द रहा. मेरे दो भाई अमरीका में थे, फिर मैं भी वहाँ चला गया. लेकिन वहाँ जब मैं कलाकारों के शो देखता था तो मुझे लगता था मुझे भी ऐसा ही करना चाहिए. मैं वहाँ टैक्सी चला रहा था. मैं बर्कले सिटी में था. एक दिन मैंने देखा वहाँ बड़ा मजमा लगा हुआ था. आलम ये था कि मैंने 12 घंटे में ही तीन हज़ार डॉलर कमा दिए. मैंने पूछा तो पता लगा कि वहाँ कई साल बाद बीटल ग्रुप सर पॉल मैक्टनी का शो हो रहा है. जिसे देखने के लिए 60 हज़ार लोग पहुँचे हैं. वहीं से मुझे भारत आने की प्रेरणा मिली. फिर मैं भारत आया. लेकिन जिस किसी म्यूजिक कंपनी के पास जाऊँ, वे कहते कि क्या तुम खुद को पंकज उधास से बड़ा बना लोगे, क्या तुम ग़ुलाम अली से अच्छा गाते हो. फिर मुझे परमजीत खुराना मिले, उन्होंने मेरा गाना सुना और उन्हें बहुत अच्छा लगा. लेकिन उन्होंने मुझसे कहा कि अभी इसका बाज़ार नहीं है. अभी कुछ डांस वाले गानों का दौर है. मुझे डांस करने में बहुत शर्म आती थी. फिर मैंने उनसे एक हफ्ते का समय लिया. मैंने पहला गाना बनाया, ‘एक कुड़ी पटाखा...’ उन्होंने इसे रिलीज किया. मैं खुश था कि चलो मेरा पहला गाना तो रिलीज हुआ. लेकिन इसके बाद मुझे काफ़ी संघर्ष करना पड़ा. सोने की चेन, अंगूठी सब बिक गई. मुझे याद है कि संगीतकार आनंद राज आनंद की तब विकासपुरी में सुनार की दुकान थी. मैंने अमरीका में वो अंगूठी 60 हज़ार रुपये में ख़रीदी थी और उन्होंने मुझे इसके सात हज़ार रुपये दिए. मेरा कैमरा भी बिक चुका था. मैं बहुत दुखी था और वापस अमरीका चला गया. लेकिन एक साल बाद मुझे फिर वही धुन सवार हो गई.
फिर 1992 में मेरे जीवन में एजे जसपाल फरिश्ता बनकर आए. वो आईटीडीसी में थे. मैं दिल्ली में 150 रुपये में शो करता था. मैं जसपालजी से मिला. उन्होंने मुझसे कहा कि तुम गुरदासमान, मलकीत सिंह से कहीँ आगे जाओगे. उन्होंने मुझसे कहा कि हर शो के एक हज़ार रुपये मिलेंगे. और इस तरह सिलसिला आगे बढ़ा. 1995 में ‘बोले तारा रा रा...’ एलबम आया. और ये ज़बर्दस्त हिट रहा. लेकिन आलोचक इसे तुक्का मान रहे थे. फिर एक साल बाद ‘मैं डरदी, रब-रब करदी...’ आया और सब तरफ़ उसकी धूम मच गई. फिर एक दिन मुझे बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन का फ़ोन आया और कहा कि वो मेरे साथ काम करना चाहते हैं. तो आपने मना नहीं किया? मना करने का सवाल ही कहाँ होता है. मैं उनका बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ और आज भी उनकी झलक पाकर बहुत खुश होता हूँ. जब उन्होंने साथ काम करने की बात कही तो बहुत खुशी हुई. फिर ‘साडे नाल’, ‘हो गई तेरी बल्ले-बल्ले’ ज़बर्दस्त हिट हुए. लेकिन लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया कि ये गाने इसलिए हिट हो रहे हैं कि इन एलबल में खूब लड़कियां-लड़के होते हैं. फिर हमने 1999 में एक और एलबम ‘तुनक-तुनक तुन’ की योजना बनाई. जिसमें सिर्फ़ मुझे आना था. शशि गोपाल ने कहा कि इसमें जोखिम हो सकता है. लेकिन वीडियो आया और ज़बर्दस्त हिट रहा. चाहे स्टेज शो हों या फिर इंटरव्यू इत्यादि. आपमें इतनी ऊर्जा कहाँ से आती है? मुझे लगता है कि ये कुदरत के रंग हैं. कुछ ही लोगों को ईश्वर अपना आशीर्वाद देता है. मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहता हूँ. अलग से कुछ दिखने या बनने की कोशिश नहीं करता. आपका नया एलबम बिस्मिल्लाह काफ़ी सूफ़ियाना है? बहुत सूफ़ियाना है. अभी तक हमने जो भी सूफ़ियाना वीडियो या ऑडियो सुने हैं, उन्हें डबल मीनिंग में इस्तेमाल करते हैं. यानी सूफ़ीवाद को आशिकी से जोड़ देते हैं. लेकिन मैंने काफ़ी सोच विचारकर इसे सिर्फ़ इबादत तक ही सीमित रखा है. यानी कि मैं और सिर्फ़ रब. इसे हफ्ते भर पहले ही लॉन्च किया है और लोगों को ये बहुत अधिक पसंद आ रहा है. निजी तौर पर भी आप काफ़ी आध्यात्मिक हैं क्या? हाँ. मैं किसी चीज के साथ बहुत लगाव नहीं रखता हूँ. हर वक़्त ये याद रहता है कि मौत कभी भी आ सकती है. मेरा बचपन गुरुद्वारे में बीता है. गुरुवाणी, कथाएँ, शबद-कीर्तन, बाबा शेख फ़रीद की बातें. इन सबका असर मेरे जीवन पर है. टैक्सी ड्राइवर, चेन का बिकना, फिर इतनी लोकप्रियता, पैसा. ये फर्क कैसा लगता है? इसका पूरा आनंद उठाता हूँ. आनंद उठाना इसलिए अच्छा लगता है कि मुझे पता है कि गाने में मैं बहुत मेहनत करता हूँ. मेरी कमाई खून-पसीने की है. इसमें ड्रामा नहीं है, रीटेक की गुंजाइश नहीं है.
मसलन 6-7 साल पहले जब दिल्ली में सीएनजी बसें नहीं चलती थी और बहुत प्रदूषण होता था. तब एक बीड़ा उठाया और आठ लाख पेड़ लगाए. करोड़ों रुपये लगाए और वो भी सिर्फ़ अपने पास से. भुज में भूकंप आया तो 16 घर बनवाए. कारगिल युद्ध में भी तमाम सहायता संगठनों की मदद की. आनंद के लिए सबसे ज्यादा पैसा खर्च करने में मज़ा कहाँ आता है? मुझे बहुत सारे लंगर देने में मज़ा आता है. छठवें गुरु हरगोविंद सिंह ने सपने में मुझे दर्शन दिए और कहा कि गुरुद्वारा बनाना है. वहाँ 2003 में गुरुद्वारा बना और अब वहाँ 500 लोग सुबह और 250 लोग रात को लंगर खाते हैं. जहाँ तक तमन्ना की बात है तो मैं चाहता हूँ कि अमरीकी राष्ट्रपति की तरह मेरा 18 सीटों वाला हेलीकॉप्टर हो. ताकि जहाँ भी हम शो करें, उसमें जाएँ. लेकिन ये सिर्फ़ तमन्ना है, सपना नहीं. सपना तो बहुत बड़ा है. और सपना क्या है? सपना ये है कि एक ऐसा मूवमेंट लेकर चलूँ, जिसमें सिर्फ़ इबादत, शांति और खुशी की बाते हों. एक ऐसा बीड़ा उठाना चाहता हूँ जिसमें मनुष्य जाति को एक नज़र से देखा जाए. खेल का शौक है आपको? मुझे फ़ुटबॉल का बहुत शौक है. बचपन में मैं फ़ुटबॉल खेलता भी थी. हालाँकि जब मैं लोगों को बताता हूँ तो वे मेरे डील डौल को देखकर हसंते हैं और कहते हैं कि क्यों मजाक कर रहे हो. वैसे मुझे कुश्ती देखना भी बहुत पसंद है. जब मैं छोटा था तो मैंने दारा सिंह, किंग-कॉन्ग, मेहरदीन की कुश्तियां देखी हैं. अब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ भी खूब देखता हूँ. अगर गायक नहीं होते तो क्या पहलवान होते? नहीं, पहलवान बनने का मेरा वजूद तो नहीं है. मुझे लगता है कि मैं पैदा ही गायक बनने के लिए हुआ हूँ. अगर मैं गायक नहीं होता तो शायद मेरी ज़िंदगी बहुत मुश्किल होती, क्योंकि मैं कुछ और नहीं कर पाता. और खाने में क्या पसंद है? मुझे बिरयानी, देसी चिकन पसंद है. चाइनीज़, थाई, साउथ इंडियन, बंगाली खाना भी पसंद है. कुल मिलाकर खाने का बहुत शौक है. फ़िल्में देखने का शौक है? जब वक़्त मिलता है तो फ़िल्में ज़रूर देखता हूँ. पुरानी फ़िल्में ज़्यादा देखता हूँ. नई फ़िल्मों में ‘सिंग इज किंग’ थोड़ी अच्छी लगी. वो इसलिए भी कि इंडियन एक्सप्रेस ने तीन साल पहले मुझे ‘सिंग इज़ किंग’ का टाइटल दिया था. फिर इसमें मेरी तरह के कपड़े, मेरा स्टाइल और यहाँ तक कि फ़िल्म में मेरे भाई मिक्का के नाम का इस्तेमाल भी किया गया है. आपके जीवन में सबसे खुशी का दिन? जब मैं, मेरा हारमोनियम और मेरा ग्रुप जब रियाज़ करते हैं तो बहुत खुश होते हैं. ये लम्हे मेरे लिए सबसे ज़्यादा खुशी के होते हैं.
आपका भाई मिक्का भी कामयाब गायक है. कभी बचपन में प्रतिद्वंद्विता जैसी बात तो नहीं थी? मिक्का मुझसे काफ़ी छोटा है. मिक्का को संगीत की काफ़ी लगन थी. वो गिटार लेकर कुछ न कुछ बजाता रहता था. हमारे बीच ट्यूनिंग तो बहुत अच्छी नहीं रही. लेकिन नौ साल मैंने उसे शो में ट्रेंड किया है. मिक्का आज भी कहता है कि आपने जब जी चाहा मुझे मारा. मिक्का जब अब इधर-उधर की ख़बरों में होते हैं तो तब भी आप क्या उन्हें सीख देते हैं? हाँ बिल्कुल. मैं उससे कहता हूँ कि खुद पर नियंत्रण रखो. अच्छा काम कर नाम कमाओ. इधर-उधर की घटनाओं से बचो. आपने काफ़ी धूप-छाँव, उतार-चढ़ाव देखे हैं. जब बुरा समय था, उस समय कैसा अनुभव रहा? वो समय भी मेरा अच्छी तरह निकला. मैंने कभी एक आँसू नहीं बहाया. जब पूरा परिवार परेशान था, तब भी मैं उन्हें समझाता था कि बाबा गुरुनानक पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा. मैं अपने करीबी दोस्तों को फ़ोन करता था. दिल्ली की सड़कों पर रात को निकलता था. पंजाब पुलिस हर जगह मुझे ढूँढती रहती थी. तब बुरा लगता था कि ये मेरे साथ क्या हो रहा है. तीन महीने मेरे साथ बहुत बुरे बीते. उस दौरान भी मैं दोस्तों से हंस-हंसकर बात करता था. मीडिया न जाने मेरे बारे में क्या-क्या दिखा रहा था. मुझे ईश्वर पर पूरा यकीन था. आपका पसंदीदा संगीतकार या गायक कौन है? किसी एक का नाम लेना तो मुश्किल है. मुझे मोहम्मद रफ़ी बहुत पसंद हैं. उनके अलावा किशोर कुमार, दर्द की बात हो तो मुकेश जी. तलत महमूद, आशा भोसले, लता मंगेशकर, परवेज़ मेंहदी, हुसैन बख्श भी मुझे बहुत पसंद हैं. कोई पसंदीदा गाना? फ़िल्म ताज़महल का गाना ‘जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा’ मुझे बहुत पसंद है और जब भी बजता है मेरे दिल को छू जाता है. जब मैं आठ-नौ साल का था, तब भी ये गाना सुनकर रोने लगता था. कोई ऐसी ग़जल जो अभी लोगों ने नहीं सुनी है? ‘हर क़दम पर फ़रेब देती है, ज़िंदगी इतनी बेरहम क्यों है. मेरे मिटने पे उनको गम क्यों है, मैं सोचता हूँ, ये करम क्यों है. हर क़दम पर फ़रेब देती है.’ लड़कियाँ आपकी बहुत दीवानी हैं. उनसे कैसे निपटते हैं आप? मैं भी बस दीवाना हो जाता हूँ. लेकिन दरअसल, लड़कियाँ मेरी आवाज़ की दीवानी हैं. |
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