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रविवार, 06 जुलाई, 2008 को 04:43 GMT तक के समाचार
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हरमन बवेजा के साथ एक मुलाक़ात

हरमन बवेजा
हरमन की पहली फ़िल्म साइंस फिक्शन है जिसमें उनके साथ प्रियंका चोपड़ा हैं

बीबीसी हिंदी के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं.

बीबीसी एक मुलाक़ात में हमारे मेहमान हैं हरमन बवेजा जिन्होंने ‘लव स्टोरी 2050’ से भारतीय फ़िल्म जगत में कदम रखा है.

हरमन, ये बताइए कि कई तरह से ये सपने जैसा लॉन्च रहा है, बड़ा बैनर है, बड़ी स्टार सामने हैं, ख़ूब ज़बर्दस्त चर्चा है मीडिया में, कैसा लगा रहा है?

दबाव महसूस कर रहा हूँ. जितनी अपेक्षाएं बढ़ती है, जितना ज़्यादा प्रचार होता है और जितनी बड़ी फ़िल्म हो, दबाव उतना ही बढ़ जाता है. मैं अभी नर्वस हूँ, रोमांचित हूँ और थोड़ा दबाव में भी हूँ.

बिल्कुल सही बात है. कम से कम ईमानदार जवाब तो दिया आपने. ये बताइए कि अभिनेता बनने की कब सूझी और क्यों?

बचपन से ही मेरी यही सोच थी. जब मैं पहली-दूसरी में पढ़ता था तभी से फैंसी ड्रैस प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता था. बचपन में मैं अलग-अलग किस्म का भिखारी बन चुका हूँ. जब चौथी कक्षा में था तो एक लड़की से हार गया. वो झाँसी की रानी बनी थी. तब से मैंने इसमें हिस्सा लेना छोड़ दिया. लेकिन स्कूल में भाषण, वाद-विवाद, नाटक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेता रहा.

अगर ये सभी अभिनय के अलग-अलग आयाम हैं तो मैं हमेशा से अभिनेता बनना चाहता था, जाने नहीं तो अनजाने ही सही.

तो ऐसा नहीं है कि बड़े बाप के बेटे हैं इसलिए फ़िल्म स्टार बनने वाले हैं. मतलब मेहनत की है और शुरू से शौक रहा है.

बड़े बाप का बेटा होने से कुछ नहीं होता. क्योंकि जिस इंसान को एक प्लेटफ़ॉर्म मिले. उसे उससे कहीं ऊपर जाना पड़ता है और उसी से उसकी ख़ुद की साख़ बनती है.

बस कभी-कभी शुरुआत थोड़ी आसान हो जाती है. कम से कम इंट्री तो मिलती है. मेरे जैसा इंसान हो जिसके पिता निर्देशक हों तो उसका हल्का फ़ायदा तो होगा लेकिन अगर मैं अपना क्षेत्र छोड़कर दूसरा काम करूँ तो मुझे दोगुनी मेहनत करनी पड़ेगी.

आप डांस बड़ा अच्छा करते हैं. एक बात मेरे मन में आ रही थी कि क्या सारे फ़िल्म स्टार बिल्कुल अभिमन्यु की तरह डांस सीखकर ही आते हैं. इतना अच्छा डांस सारे कैसे कर लेते हैं, वैसे सारे ऐसा नहीं कर पाते हैं.

मुझे बचपन से डांस का बड़ा शौक था. क्या है कि बचपन में ही लोगों को ज़्यादातर समय मिलता है. बड़ा होकर तो लोग काम में लग जाते हैं. बचपन में कोई टेंशन तो होता है नहीं क्योंकि सिर्फ़ एक घंटा होमवर्क करना पड़ता है और बाक़ी टाइम हम फ़्री होते हैं. मुझे शौक हमेशा था और मैं अपने ट्रेनर को धन्यवाद देना चाहूँगा जिनका नाम माइकल जैक्सन है.

अरे वाह, छोटा-मोटा ट्रेनर नहीं रखते.

हरमन बवेजा
हरमन को आलू के परांठे और चॉकलेट्स बहुत पसंद हैं

हाँ, चार-पाँच साल के लिए मैंने उनको हायर कर रखा था. वो इस तरह की अपनी टीवी पर मैं उनकी वीसीडी देखता और उसे देखकर डांस सीखता था. और, एक बार जब खून में डांस घुस जाए तो फिर निकलता नहीं है. और कुछ पाँच साल पहले मैंने कथक सीखा. मुझे भारतीय सांस्कृतिक नृत्य का शौक था तो मैंने डेढ़ साल तक कथक की ट्रेनिंग ली.

पूरी तैयारी के साथ उतर रहे हैं. ये तो मानना पड़ेगा.

जब मैं पापा के साथ सहायक निर्देशक था तो उनसे हमेशा यही कहता था, “पापा, आप मुझे लॉंच तभी करें जब आपको लगे कि मैं इस लायक हूँ. इसलिए नहीं कि मैं आपका बेटा हूँ.” उन्होंने मुझे बड़े गौर से देखा और कहा, “ठीक है, तुम अपने लिए ही चीज़ें मुश्किल कर रहे हो. देखते हैं कि कब मुझे लगता है कि तुम इसके लिए तैयार हो.” तो मैं कुछ सात साल तक सहायक निर्देशक था पापा के साथ. तब निर्देशक अनीस बज़्मी, ने आकर पापा को कहा, “मैं हरमन को लॉन्च करना चाहता हूँ. अगर आप बुरा न मानें तो हरमन की पहली फ़िल्म मैं करना चाहता हूँ.” तब पापा ने मुझसे कहा कि जब इतने बड़े निर्देशक तुम्हें लॉन्च करना चाहते हैं तो मुझे यकीन है कि तुममें कुछ तो बात होगी और तुम अब उस लायक हो गए होगे. मुझे लगता है कि अब तुम्हें फ़िल्म करनी चाहिए.

इस फ़िल्म के निर्माण के दौरान आपका सबसे यादगार लम्हा क्या था?

हम ‘लव स्टोरी 2050’ के गाने 'मीलों का जैसे था फ़ासला, सदियों का था जैसे रास्ता...' की ऑस्ट्रेलिया में शूटिंग कर रहे थे, साल्ट लेक नाम की जगह पर. 240 किलोमीटर लंबा और 140 किलोमीटर चौड़ी इस जगह पर कुछ नहीं है. कोई पेड़ नहीं, कोई जानवर नहीं. यहाँ पर मैं एक मोटरसाइकिल 180 की स्पीड पर चला रहा था और मैंने अपनी आँखें करीब चार मिनट के लिए बंद की थी.

हरमन बवेजा
वैसे तो बॉलीवुड के कई कलाकारों को हरमन पसंद करते हैं लेकिन वो शाहरुख़ के फ़ैन हैं

मुझे पता था कि दूर तक कुछ नहीं है. पहली बार मैंने जब कोशिश की तो पाँच सेकेंड में ही मैंने आँख खोल ली कि कहीं कुछ आ गया तो मैं तो गया.

आप 180 किलोमीटर प्रतिघंटे की स्पीड पर मोटरसाइकिल चला रहे थे आँख बंद करके.

हाँ, मुझे मालूम था कि कम से कम सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर आगे तक कोई नहीं है. तो मैं अगले पाँच मिनट में मुश्किल से दस-बारह किलोमीटर तक जाऊँगा तो कोई टेंशन नहीं थी लेकिन वह जो अनुभव था, मैं आपको बता नहीं सकता. उसे बस महसूस किया जा सकता है.

आप क्या अपनी इस फ़िल्म से पहले भी स्क्रिप्ट से इतना ज़्यादा जुड़े रहते थे?

इससे पहले जितनी फ़िल्में बनी हैं, पापा ने मुझे हर बार-बार अलग-अलग विभाग में भेज दिया. कुछ फ़िल्मों में मैं स्क्रिप्ट लिखने से जुड़ा था, प्री-प्रोडक्शन से जुड़ा था, शेड्यूलिंग और प्लानिंग से जुड़ा था. कुछ में सेट पर सहायक था. कुछ फ़िल्मों में मैं पोस्ट-प्रोडक्शन सँभाल रहा था. कैसे पोस्टर डिज़ाइन किया जाता है, ट्रेलर कैसे काटा जाता है और क्या काटना चाहिए, मीडिया प्लान कैसे करना चाहिए और कैसे वितरक से बात करके रिलीज़ की जाए. मैंने अलग-अलग काम देखे हैं और मुझे अच्छा प्रशिक्षण मिला.

डांस तो आजकल अभिनेताओं के लिए करीब-करीब अनिवार्य हो गया है लेकिन मैं ये कहूँ कि चेहरा-मोहरा अच्छा हो तो क्या उसका भी फ़ायदा होता है. चेहरा तो भगवान देता है लेकिन शरीर पर आपने ख़ासी मेहनत की है.

करनी पड़ी. बीच में जब मैं सहायक था तो करीब-करीब 96 किलोग्राम का हो गया था. मेरी कमर 36 इंच की हो गई थी. मैं और पापा एक ही जींस पहनने लगे. तो उसके बाद मुझे झटका लगा. मैंने काफ़ी मेहनत की और फिर शरीर पर ध्यान दिया. मेहनत तो करनी पड़ती है.

मेहनत के साथ-साथ क्या बहुत ध्यान रखते हैं खाने-पीने का भी.

 बीच में जब मैं सहायक था तो करीब-करीब 96 किलोग्राम का हो गया था. मेरी कमर 36 इंच की हो गई थी. मैं और पापा एक ही जींस पहनने लगे. तो उसके बाद मुझे झटका लगा तो मैंने काफ़ी मेहनत की और फिर शरीर पर ध्यान दिया

मुझे आलू के पराठे बहुत पसंद है. आप विश्वास करें न करें लेकिन मैं हफ़्ते में तीन बार पराठे ज़रूर खाता हूँ. चॉकलेट तो मैं रोज खाता हूँ. ये हो ही नहीं सकता कि लंच या डिनर के बाद मैं कोई चॉकलेट न खाऊँ. भले वो चॉकलेट केक हो, पेस्ट्री हो, चॉकलेट ही हो, कुछ भी हो. आम तौर पर मैं तीस मिनट डांस या जॉगिंग या योग या कसरत को दे देता हूँ तो मैं अपने आपको फिट रख सकता हूँ.

ये बताइए, चॉकलेट और आलू के पराठों के अलावा आपको खाना किस तरह का पसंद हैं?

आलू पराठे और चॉकलेट छोड़कर मुझे राजमा-चावल और करेला-आलू बहुत पसंद हैं.

तो क्या आप शाकाहारी हैं?

नहीं, माँस-मछली भी खाता हूँ. लेकिन इतना शौकीन नहीं हूँ कि मुझे खाना ही है. अगर मैं एक हफ़्ते से शाकाहारी खाना खा रहा हूँ तो ऐसा नहीं है कि ये कहूँगा कि मुझे अभी तक माँस-मछली क्यों नहीं मिला. मुझे इससे फ़र्क नहीं पड़ता है. अच्छा मसालेदार खाना हो तो मैं वो हफ़्ते-पंद्रह दिन में एक बार खाना पसंद करता हूँ. आम तौर पर मेरा खाना हल्का और सादा होता है.

प्रियंका चोपड़ा के साथ काम करके कैसा लगा?

प्रियंका चोपड़ा एक सीनियर अभिनेत्री हैं, मुझसे तो कहीं सीनियर हैं. पंद्रह-बीस या उससे भी ज़्यादा फ़िल्में उन्होंने की होंगी पिछले पाँच सालों में. उनका सेट पर अनुभव था और एक स्टार हैं. लेकिन मुझे कहना चाहिए कि उन्होंने कभी भी ये महसूस नहीं होने दिया कि वो एक स्टार हैं. आप आज बोम्मन ईरानी सर से बात करें, हमारे सेट के स्पॉटब्यॉज़ से, लाइटमैन से बात करें तो आपको पता चलेगा कि वह बहुत सहज होकर काम कर रही थीं.

मेरे लिए तो होम प्रोडक्शन जैसा था. मैं काम कर रहा था, पापा निर्देशक थे, मम्मी निर्माता हैं और मेरी बहन मुख्य सहायक निर्देशक थीं. तो हम चार लोग बहुत महत्वपूर्ण काम देख रहे थे. मैं हमेशा शॉट के बाद सहायक निर्देशक के तौर पर काम करने लगता था.

लेकिन ऐसा कभी नहीं होता था कि शॉट के बाद वो वैन में जाकर बैठ जाएँ कि मुझे बुला लीजिएगा, मैं शॉट के पहले आ जाऊँगी. धीरे-धीरे वो भी फ़िल्म बना रहे हमारे परिवार से साथ जुड़ गईं. सेट पर सब कुछ सहज हो गया था.

ऐसा सब मानते हैं कि आप दोनों में ज़बर्दस्त मोहब्बत है और आगे कुछ और बात बन सकती है.

जब दो लोग साथ में काम कर रहे हों और काम के अलावा भी उनमें दोस्ती हो तो यहाँ सौ तरह की अफ़वाहें शुरू हो जाती हैं. आपने जो कहा, ये उनमें से एक अफ़वाह होगी.

अच्छा ये बताएँ, प्रियंका चोपड़ा से पहले फ़िल्म में क्या करीना कपूर काम करने वाली थीं?

जी, असल में करीना ने सात-आठ दिन हमारे साथ शूटिंग भी की थी लेकिन फिर उन्होंने तय किया कि वो ये फ़िल्म नहीं करना चाहतीं. और पापा की सहमति से करीना इस फ़िल्म से अलग हो गई थीं.

अगर आप अभिनेता नहीं बनते तो क्या बनते?

मुझे कुछ और अच्छी तरह आता ही नहीं है. मैं अभिनेता ही बनता. और अगर नहीं बनता तो फ़िल्म से जुड़ा कोई भी काम कर लेता. भले वो स्पॉटब्वॉय हो, लाइटमैन हो, या फिर कैमरामैन हो.

जब नए लोगों के साथ तुलना होती है तो क्या प्रतिद्वंद्विता की भावना जगती है. क्या सोचते हैं जब दूसरों की बातें होती हैं?

नए लोग ही क्यों. अगर हमें देखना हो तो दो तरीक़े होते हैं हर चीज़ को देखने के. अगर मैं इसे एक नकारात्मक तरीक़े से देखूँ तो हाँ प्रतियोगिता है लेकिन सिर्फ़ इन्हीं से नहीं, पहले से स्थापित कलाकारों से भी है. किसी भी मल्टीप्लेक्स में फ़िल्म देखते हैं तो बगल वाली स्क्रीन में कोई हॉलीवुड फ़िल्म चल रही होती है, अगर आप दक्षिण भारत में हैं तो वहाँ की भी फ़िल्म चल रही होगी.

‘लव स्टोरी 2050’ कहीं चल रही है तो ‘हैंकॉक’ भी चल रही है और कहीं कमल हासन सर की भी फ़िल्म चल रही है. ऐसे देखें तो मेरी प्रतियोगिता विल स्मिथ और कमल हासन से भी हो गई. लेकिन इसे सकारात्मक तरीक़े से देखें तो प्रतियोगिता है ही नहीं. ऐसा तो है नहीं कि हम मुक्केबाज़ी या डब्ल्यूडब्ल्यूएफ़ के रिंग में हैं और सब खड़े हैं कि कौन अंत तक बचा रहेगा.

मुझे नहीं लगता कि कोई दर्शक यह तय करता है कि शाहरुख़ की फ़िल्म देखी है तो मैं आमिर की नहीं देखूँगा. अगर मुझे शाहरुख़ की फ़िल्म पसंद है तो मुझे आमिर की भी पसंद हो सकती है, हरमन की भी पसंद हो सकती है और सलमान की भी पसंद हो सकती है.

ये बताएँ, ऋतिक रोशन से आपकी जो लगातार तुलना होती है. सच में, कभी-कभी तो ये लगता है देखकर कि बहुत समानता है. कैसा लगता है सुनकर?

बिल्कुल. इस उद्योग में हर नए आदमी की किसी न किसी के साथ तुलना की जाती है. नील मुकेश आए थे उनकी भी तुलना ऋतिक से हुई थी. रणवीर की तुलना उनके पिता से हुई थी. अभिषेक आए थे तो अमिताभ बच्चन से हुई थी. शाहिद आए थे तो शाहरुख़ के साथ तुलना हुई.

शाहरुख़ आए तो दिलीप कुमार साहब से तुलना की गई. जब अमिताभ जी आए थे तब उनकी भी तुलना दिलीप कुमार के अभिनय से की गई थी. दुनिया में हमेशा से ये होता आ रहा है. जब कोई नया आता है, आदमी तुलना करने लगता है. अगर नए लोगों में हल्की सी झलक भी मिले तो ये और ज़्यादा होने लगता है.

हरमन साहब, आपके दूसरे शौक क्या हैं. वैसे तो आप पूरी तरह से फ़िल्मों में डूबे लगते हैं. इसके अलावा दुनिया में और क्या है आपके लिए.

मूल रूप से मैं सामान्य ढंग से और आराम से रहने वाला आदमी हूँ. ब्लू जींस और सफेद टी-शर्ट मेरे पहनावे का मंत्र है. मैं ज़्यादातर घर पर ही रहना पसंद करता हूँ. अगर मेरे पास छुट्टी हो तो मैं अपने घर पर ही दोस्तों को बुला लेता हूँ या दोस्तों के घर चला जाता हूँ.

अपने मम्मी-पापा के साथ बैठ जाता हूँ या बहन के साथ बैठ जाता हूँ. मेरी बहन को कॉफी पीना बहुत पसंद है तो उसे कॉफी पिलाने बाहर ले जाता हूँ. और अगर ये सारे लोग व्यस्त हों तो वीडियो गेम खेलना शुरू कर देता हूँ. वीडियो गेम मेरे लिए समय बिताने का सबसे अच्छा ज़रिया है.

अच्छा ये बताइए कि भारतीय फ़िल्म जगत में ऐसी कौन सी अभिनेत्री है जिसके साथ काम करना आप सबसे ज़्यादा पसंद करेंगे?

करीना कपूर हैं. बिपाशा बसु हैं. ऐश्वर्या राय हैं.

और, निर्देशकों की बात करें तो

एक संजय लीला भंसाली हैं. एक आशुतोष गोवारीकर हैं और एक करण जौहर हैं.

आपका पसंदीदा अभिनेता

शाहरुख़ ख़ान. वो लोगों का संपूर्ण मनोरंजन करते हैं. सच्चे मायने में वो हर चीज़ करते हैं. अगर उन्होंने आईपीएल की एक टीम ख़रीदी है तो उसमें भी वे मनोरंजन ले आते हैं. मुझे नहीं लगता कि लोगों का मनोरंजन करने वालों में उनसे कोई आगे है.

उनको मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ. दरअसल, मेरे पापा ने ही शाहरुख़ ख़ान को सबसे पहले साइन किया था. पहली फ़िल्म जो शाहरुख़ को ऑफ़र हुई थी, वो मेरे पापा ने दी थी. आजतक वो साइनिंग अमाउँट शाहरुख़ के पास ही है और शाहरुख़ हमेशा कहते हैं कि ये उनके लिए वो टोकन है जो वो कभी भूल नहीं सकते. एक पुराना भावनात्मक रिश्ता है मेरा उनसे.

हालाँकि मैं उनके शो पर गया था तो उन्होंने मुझसे बड़ी अच्छी बात कही, “हरमन, तुम्हारे पापा पहले निर्माता थे जिन्होंने मुझे साइन किया और कहा कि तुम बहुत बड़े स्टार बनने वाले हो एक दिन और मैं तुम्हें अपनी फ़िल्म में लेना चाहता हूँ. आज करीब 15 साल बाद उन्होंने तुम्हें लिया है और तुम पर वो इतना विश्वास कर रहे हैं जितना मुझ पर कर रहे थे. ऊपर वाला तुमपर मेहरबान रहे.”

अच्छा आपके सपनों की रानी कैसी होंगी हरमन?

सपनों की रानी.. अच्छी होगी. आप विश्वास करें या न करें लेकिन मैंने कभी इसके बारे में सोचा नहीं है. मुझे हमेशा लगा है कि जब किसी से मिलूँगा, एक अच्छा सा संबंध होगा, अजीब सी उमंग होगी, छठी इंद्रियाँ झनझना उठेंगी कि यही है. अपने आप ही वो तुरंत मेरी जीवनसाथी बन जाएगी.

आने वाले समय में आप किस तरह की फ़िल्में करना पसंद करेंगे. कोई ख़ास पात्र या फ़िल्म?

अगर मेरे पास कोई टाइम मशीन होती जैसा कि ‘लव स्टोरी 2050’ में है जिससे मैं समय से पीछे जा सकता तो मैं ‘मुगल-ए-आज़म’ करना चाहता. मुझे ये फ़िल्म बेहद पसंद है. उसमें मुझे दिलीप कुमार का काम भी बहुत भाता है.

और दिलीप कुमार की अनारकली भी

वो तो हैं ही. मैं क्या बताऊँ, ‘मुगल-ए-आज़म’ करने की पचास फ़ीसदी इच्छा तो अनारकली को देखकर ही है.

आपके ज़बर्दस्त समर्थक कौन हैं?

मेरा परिवार है. मेरे करीबी दोस्त हैं. ये फ़िल्म बनाने में कई मुश्किलें आई थीं. हर मोड़ पर मुश्किल थी. जैसा कि आप जानते हैं कि जब हम फ़िल्म शुरू कर रहे थे तो करीना ने फ़िल्म छोड़ दी थी. उसके बाद तीन साल लगे हमें फ़िल्म बनाने में. इसमें बहुत बुरे दौर से गुजरे हम.

कई बार तो ऐसा लगा कि फ़िल्म बन ही नहीं पाएगी. कभी पैसे की दिक्कत हो गई, कभी तकनीकी मुश्किलें हुईं, कभी-कभी लगता था कि ज़रूरी स्पेशल इफ़ेक्ट्स पैदा न हो सकेंगे. लेकिन हमने लगातार संघर्ष किया, परिवार ने संघर्ष किया, दोस्तों ने साहस दिया और कहा कि तुम लड़ सकते हो और जीत सकते हो.

आख़िरकार हम इसे पूरा करने में सफल रहे. इससे ज़्यादा समर्थन मुझे और मिल नहीं सकता था.

हरमन आपकी पहली फ़िल्म ज़बर्दस्त कामयाब हो और आपमें जो ये लड़ने और जीतने वाला माद्दा है, वो हमेशा ज़िंदा रहे. और, आप एक लंबी और सफल पारी खेलें. हमारी शुभकामना हैं कि आप बड़े स्टार बनें, रॉकस्टार बनें, सुपरस्टार बनें. आपसे बात करके बहुत मज़ा आया हरमन.

मुझे भी बहुत अच्छा लगा. आपको भी धन्यवाद.

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