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एक मुलाक़ात कुणाल कोहली से | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी के विशेष कार्यक्रम 'एक मुलाक़ात' में हम भारत के जाने-माने लोगों की ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं से आपको अवगत कराते हैं. बीबीसी एक मुलाक़ात में इस बार हमारे मेहमान हैं ‘हम-तुम’, ‘फ़ना’ और ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ जैसी फ़िल्मों से अपना सिक्का जमाने वाले निर्देशक कुणाल कोहली. आप फ़िल्म क्रिटिक यानी आलोचक थे, म्यूज़िक वीडियो बनाते थे. इसके बाद निर्देशन के क्षेत्र में आए, ये बदलाव कैसे? ये फ़िल्म निर्देशक बनने का एक माध्यम मात्र था. मैं शुरू से ही निर्देशक बनना चाहता था, क्योंकि मैं फ़िल्म इंडस्ट्री से नहीं था और किसी फ़िल्मी ख़ानदान से भी ताल्लुक़ नहीं रखता हूँ. ऐसे में फ़िल्म इंडस्ट्री में जगह बनाना बहुत मुश्किल था. तब मैने म्यूज़िक वीडियो का निर्देशन करना शुरू किया, ताकि लोगों को कुछ हद तक अपनी प्रतिभा दिखा सकूँ. मैं मानता हूँ कि हमारी ज़िदगी में मौके ज़रूर आते हैं और हमें फिर उन्हें दोनों हाथों से लपक लेना चाहिए. तो आपकी पृष्ठभूमि क्या है? मैं मध्यम वर्ग के परिवार से हूँ. माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं. जब स्कूल से घर आता था तो कभी बुरा लगता था कि सबकी मम्मियां घर में होती हैं, फिर मेरी क्यों नहीं. लेकिन बाद में ये अहसास हुआ कि वो हमें कुछ ज़्यादा देना चाहती थी. उन्हीं के इन संस्कारों के चलते मेरे मन में औरतों के लिए ख़ास सम्मान है. आप पले-बढ़े कहाँ हैं? वैसे तो हमारा परिवार पंजाब से है, लेकिन मैं पैदा भी मुंबई में हुआ और मेरी परवरिश भी यहीं हुई. मैं मुंबई के कथीड्रल एंड जॉन कोनन हाईस्कूल में पढ़ा हूँ और वहाँ पर तो कोई फ़िल्मों की बात ही नहीं करता था. वहाँ बड़े-बड़े उद्योगपतियों के बच्चे पढ़ते थे, जिनकी इच्छा विदेश में पढ़ने के लिए होती थी. आप महसूस कर सकते हैं कि वहाँ मेरा ये कहना कि मैं निर्देशक बनूँगा, कैसा लगता होगा. जब पहली बार निर्देशक बने तो कैसा लगा? बहुत रिलैक्स्ड था. पहले शॉट से ही मुझे लगा कि मैं इसके लिए ही बना हूँ. मेरी दो फ़िल्में हम-तुम और फ़ना बहुत कामयाब रही हैं. मुझे कामयाबी पैसे और पेज थ्री पर जगह पाने के लिए नहीं चाहिए. मुझे कामयाबी सिर्फ़ इसलिए चाहिए कि मैं ज़िदगीभर फ़िल्में बना सकूँ. सच कहूँ तो मैंने अभी तक एक भी दिन काम नहीं किया है. मुझे अपना काम इतना अच्छा लगता है कि मुझे लगता ही नहीं कि मैं काम कर रहा हूँ. फ़िल्मों में पहला ब्रेक कैसे मिला? ये दिलचस्प वाकया है. मुझे किसी कंपनी ने बतौर निर्देशक साइन किया था. लेकिन मैं बहुत खुश नहीं था. मैंने करण जौहर से ये बात कही. करण ने मुझे कहा कि मैं आदित्य चोपड़ा से बात करूँ. आदित्य चोपड़ा ने मुझसे कहा कि जब तक आप किसी दूसरे से बंधे हुए हैं तब तक तो मैं आपकी कहानी सुन भी नहीं सकता. मैंने पहले प्रोड्यूसर से कह दिया कि मैं आपके लिए काम नहीं कर सकता. फिर आदित्य से मेरी बात हुई. उन्होंने मुझे कॉन्ट्रेक्ट दिया और मैंने बिना पढ़े साइन कर लिया. भले ही आप फ़िल्म इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे थे, लेकिन इस मामले में ख़ुशकिस्मत थे कि आप कुछेक अच्छे नामों को जानते थे. जी, अंग्रेजी में एक कहावत है ‘वैन द स्टूडेंट इज़ रेडी, द मास्टर विल अपीयर.’ हम सब किसी न किसी का माध्यम बनते हैं. हम दुनिया में सिर्फ़ अपने लिए नहीं आए हैं, दूसरों को मंजिल तक पहुँचाने में भी हमारी भूमिका होती है. मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. आप अपने स्कूल की बात बता रहे थे तो वहाँ तो कोई हिंदी फ़िल्में देखता ही नहीं होगा? बिल्कुल, दिलचस्प बात ये है कि अभी कुछ दिन पहले ही मुझे कथीड्रल में तीसरी, चौथी और पांचवीं कक्षा के बच्चों को फ़िल्म निर्माण के बारे में जानकारी देने के लिए बुलाया गया था. जब मैं उन्हें बता रहा था कि क्लोज़अप क्या होता है तो एक बच्चे ने मुझसे कहा कि कृष में जब डॉ आर्या ब्रेकिंग न्यूज़ बोलते हैं तो क्या उसे ही क्लोज़अप बोलते हैं. अच्छा ये बताएँ कि काजोल और रानी मुखर्जी दोनों बड़ी स्टार हैं क्या फ़र्क है इन दोनों में? पहले आप बताएँ कि नूतन और नर्ग़िस में क्या फर्क पाते हैं. काजोल और रानी दोनों बेहतरीन कलाकार हैं. मुझे नहीं पता कि मैं दोनों की तुलना कैसे करूँ. दोनों का स्टाइल और व्यक्तित्व अलग हैं, लेकिन दोनों बेमिसाल कलाकार हैं और बहुत अच्छी इंसान. और अभिनेत्रियाँ जिनके साथ आप काम करना चाहते हों? मुझे सोनम, प्रियंका चोपड़ा और प्रीति जिंटा बहुत प्रतिभाशाली लगती हैं. विद्या बालन और ऐश्वर्या राय के साथ भी काम करने की इच्छा है. और सबसे खूबसूरत अभिनेत्री? रेखा. यशराज फ़िल्म्स के साथ काम करने का क्या अनुभव रहा है? सबसे बेहतरीन बात ये है कि वहाँ दो फ़िल्ममेकर हैं. उनके निर्णय बतौर प्रोड्यूशर नहीं, बल्कि बतौर निर्देशक होते हैं. आप तमाम स्क्रिप्ट देखते होंगे, लेकिन पर्दे पर कौन सी स्क्रिप्ट उतारनी है, इसका आधार क्या होता है? देखिए ये डायरेक्टर का अपना चुनाव या पसंद होती है. कोई 'कैलकुलेशन' नहीं होता. ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ को ही लीजिए, कैलकुलेशन के हिसाब से तो कोई ऐसी फ़िल्म नहीं बनाएगा. लेकिन आप जोख़िम लेते हैं. बाज़ार कुछ भी बोले, डिस्ट्रीब्यूटर कुछ भी कहें, लेकिन आप कुछ अलग करने के लिए ऐसा करते हैं. ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ का अनुभव कैसा रहा? इस फ़िल्म का अनुभव बड़ा प्यारा और जादुई किस्म का रहा. ये फ़िल्म इसलिए मुश्किल थी क्योंकि हर सीन में बच्चों की बहुत अहम भूमिका थी. स्क्रीन पर हम बच्चों को देखने के आदी नहीं हैं. इस लिहाज़ से ये बहुत दिलचस्प रहा और बच्चों से भी काफ़ी कुछ सीखने को मिला. इस फ़िल्म की समीक्षा की बात करें तो वो बहुत उत्साहित करने वाले नहीं हैं. जब आप पढ़ते होंगे तो बुरा तो लगता होगा? नहीं मुझे बुरा नहीं लगता. सबसे बड़े समीक्षक दर्शक होते हैं. आप नहीं समझते कि आलोचना कैसी हो रही है ये भी मायने रखता है? मैं ऐसा नहीं मानता. आलोचना बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये देखना चाहिए कि आलोचना कौन कर रहा है. अगर आलोचना सही है तो इसे ध्यान से सुनना चाहिए, लेकिन पूर्वाग्रह से ग्रस्त है तो आप इसकी अनदेखी कर सकते हैं, लेकिन अगर आलोचना आपका दुश्मन कर है तो आपको बातें और गहराई से सुननी चाहिए. जब फ़िल्म कामयाब नहीं होती तो दुख होता है? बहुत दुख होता है. जो दर्द फ़िल्ममेकर को होता है, जो उस पर गुज़रती है, उसे कोई और महसूस नहीं कर सकता. जब तक अगली कामयाबी नहीं मिलती, तब तक वह इस दर्द को महसूस करता रहता है. ऐसा हर किसी के साथ होता है. मुझे लगता है कि इसी से फ़िल्ममेकर को एक ताक़त मिलती है और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती है. आप खुद ही देख लें कि काग़ज के फूल अपने जमाने की फ्लॉप फ़िल्म थी, जबकि आज उसे 'क्लासिक' की श्रेणी में रखा जाता है. यशराज फ़िल्म्स के अलावा आप किसी और बैनर के साथ काम करना चाहेंगे? मैं सिर्फ़ एक ही बैनर के साथ काम करना चाहूँगा और वो है कुणाल कोहली प्रोडक्शंस. मैं उम्मीद करता हूँ कि आगे सभी फ़िल्में कुणाल कोहली प्रोडक्शंस के लिए ही बनाऊँ. फ़िल्म इंडस्ट्री में आपके क़रीबी दोस्त कौन हैं? आदित्य चोपड़ा अच्छे दोस्त हैं, लेकिन उन्हें प्रोफेशनल दोस्त कहा जा सकता है. क़रीबी दोस्तों में प्रसून जोशी और आमिर ख़ान हैं. आमिर के बारे में कहूँगा कि वो जितने बेहतरीन कलाकार हैं, उससे कहीं बेहतर इंसान हैं. रही बात प्रसून की तो वो मेरे बहुत-बहुत क़रीबी दोस्त हैं. हम अक्सर शाम को मिलते हैं. कभी ड्रिंक और डिनर साथ करते हैं. वह बहुत कुशाग्र बुद्धि हैं, लेकिन बहुत अच्छे इंसान हैं. और आपकी दो फ़िल्मों के हीरो सैफ़ अली ख़ान का काम करने का तरीक़ा कैसा है? सैफ़ बहुत पेशेवर हैं. जैसी टाइमिंग उनकी स्क्रीन पर होती है, वैसी ही निजी ज़िंदगी में भी है. अभिनेताओं की बात करें तो आप किसके साथ काम करना चाहेंगे? अभिनेताओं में लिस्ट बहुत लंबी है. अमितजी, अभिषेक, अक्षय कुमार, सलमान ख़ान, रणवीर कपूर के साथ काम नहीं किया है. ऋतिक के साथ भी दोबारा काम करना चाहूँगा. रणवीर कपूर के बारे में आपका क्या आकलन है? रणवीर बहुत प्रतिभावान हैं और बहुत आगे जाएंगे. हरमन बवेजा और इमरान ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया है. फ़िल्मों की बात करें तो ऐसे कोई विषय हैं जो आपके दिल के बहुत क़रीब हों और जिन पर आप काम करना चाहते हैं. यानी कि आपके ड्रीम प्रोजेक्ट्स? जो मेरे ड्रीम प्रोजेक्ट्स हैं, उनमें से तीन तो मैंने पूरे कर लिए. 'हम-तुम', 'फ़ना' और ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’. अब देखना ये है कि मेरा अगला ड्रीम प्रोजेक्ट क्या होगा. दरअसल मैं जिस फ़िल्म पर काम कर रहा होता हूँ, वही मेरा ड्रीम प्रोजेक्ट होता है. आपकी पसंदीदा फ़िल्में कौन सी रही हैं? मेरी लिस्टी काफ़ी लंबी और दिलचस्प रही है. प्यासा, काग़ज के फूल, गाइड, तीसरी मंज़िल, मेरा गांव मेरा देश, मैं तुलसी तेरे आंगन की, रोटी कपड़ा और मकान, पूरब और पश्चिम, सुजाता. इसके अलावा ऋषिकेश मुखर्जी की बहुत सारी फ़िल्में मुझे पसंद हैं. जिन फ़िल्ममेकर को मैं अपना गुरू मानता हूँ उनमें - गुरुदत्त साहब, राज खोसला, यश चोपड़ा, रमेश सिप्पी, विजय आनंद, मनोज कुमार, बिमल रॉय शामिल हैं. ये ही मेरे गुरु हैं और ये ही मेरा वर्ल्ड सिनेमा हैं. वैसे भी मैं वर्ल्ड सिनेमा को नहीं मानता. मेरा मानना है कि भारत में बेहतरीन कलाकार हैं. विश्व सिनेमा में मज़रूह सुल्तानपुरी कहाँ हैं. गुलजार, आनंद बख्शी, कैफ़ी आज़मी, जावेद अख़्तर, साहिर लुधियानवी जैसे जवाहरात हैं. आज के दौर में देखिए, जावेद साहब, प्रसून जोशी, गुलज़ार साहब कितने अच्छे गाने लिख रहे हैं. आप बॉलीवुड की बात कर रहे हैं कि इसमें इतना सब कुछ है. दुनिया के नक्शे पर भारत की फ़िल्म इंडस्ट्री को कहाँ पाते हैं? मैं समझता हूँ कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री बहुत ऊँचे दर्जे की होनी चाहिए. हमने विश्वस्तर पर अपनी फ़िल्मों की मार्केटिंग नहीं की हैं. हमारी फ़िल्में किसी भी विश्व मंच पर दिखाई जा सकती हैं. अगर मार्केटिंग की होती तो मैं नहीं समझता विमल रॉय, गुरुदत्त, राज खोसला, ऋषिकेश मुखर्जी, यश चोपड़ा, राज कपूर, विजय आनंद जैसे फ़िल्ममेकर की फ़िल्में दुनिया के किसी भी फ़िल्ममेकर से कम हैं. आपकी फ़िल्मों में इतनी खूबसूरत रिश्तों की कहानियां होती हैं. आपके जीवन में भी क्या ऐसा है? मैं शादीशुदा हूँ. मैं और रवीना एक साथ काम करते थे. वो इन दिनों यशराज फ़िल्म्स का टेलीविज़न विभाग संभाल रही हैं. आने वाले समय में किस तरह की फ़िल्में बनाना चाहेंगे? मैं रिश्तों पर फ़िल्म बनाना चाहता हूँ. ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ में भी मैंने ये बताने की कोशिश की है कि रिश्ते जन्म से नहीं प्यार से बनते हैं. ये बातें मेरे दिल को अच्छी लगी और लोगों को भी पसंद आ रही है. |
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