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'कुछ हटकर काम करने की कोशिश थी फ़िल्मवालाज़' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मेरी प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी में एक समय ऐसा आया जब मैं थोड़ा ऊब गया था. मुझे जिस तरह का काम फ़िल्मों में मिल रहा था उससे मैं संतुष्ट नहीं था. मैं कुछ हटकर काम करना चाह रहा था और जिस तरह का काम हो रहा था उसमें कुछ ख़ास नज़र नहीं आ रहा था. एक दिन जेनिफ़र के साथ बैठकर बातचीत हो रही थी कि उन्होंने मुझसे कहा कि अगर कुछ नया करना चाहते हो तो अपना ख़ुद का काम क्यों नहीं शुरू करते. मैंने कहा, मेरे से अकेले यह कैसे होगा पर जेनिफ़र ने समझाया कि कोशिश करके देखना चाहिए. इसके बाद मैंने 'फ़िल्मवालाज़' को ख़डा करने का नम बना लिया. यह 1977 का समय था. इसी दौरान मैंने जेनिफ़र से कहा कि वो पृथ्वी थिएटर को फिर से शुरू करें. मेरी इस बात पर पहले तो उन्होंने कहा कि शशि पागल हो गया है जो दो चीज़ें एक साथ शुरू करने की बात कह रहा है पर मैं अपने माता-पिता के लिए भी कुछ करना चाहता था और बाद में जेनिफ़र इसके लिए राजी हो गईं कि पृथ्वी थिएटर फिर से शुरू होगा. उन्होंने उसकी ज़िम्मेदारी संभाली. 'फ़िल्मवालाज़' के बारे में मैंने काफ़ी लोगों को ख़त लिखे. इनमें सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल, गिरीश कर्नाड, सथ्यू जैसे कई नाम है. जवाब में सत्यजीत रे साहब ने कहा कि कोई कहानी मिलने पर साथ काम करेंगे. उनका इतना कह भर देना ही मेरे लिए एक बड़ी बात थी, एक बड़ा सम्मान था. 'फ़िल्मवालाज़' हमने 'फ़िल्मवालाज़' का मुहुर्त बगैरह 1978 में ही कर लिया था पर काम 1979 में शुरू हो सका. पहली कहानी श्याम बेनेगल ने भेजी. नाम था 'जुनून'. यह रस्किन बाँड की कहानी पर आधारित थी. मेरे लिए यह एक नया पाठ था. 'फ़िल्मवालाज़' के बैनर तले हमने छह फ़िल्में बनाईं. इनका मैं निर्माता भी था और इनमें से कुछ में काम भी किया. जुनून बनी और उसने अपनी लागत भी निकाल लीं. हाँ मगर मेरी कुछ कमाई इसमें नहीं हुई. दूसरी फ़िल्म 'कलयुग' बनाई. अच्छी फ़िल्म थी पर चली नहीं और इसमें नुकसान भी हुआ. इसी दौरान अपर्णा ने '36, चौरंगी लेन' की कहानी सुनाई. मैंने उनसे कहा कि वो ही इस फ़िल्म को करें. उन्होंने यह फ़िल्म की. मेरी समझ में यह बहुत ही अच्छी फ़िल्म थी पर पता नहीं क्यों, फ़िल्म नहीं चली. इसके बाद बनाई 'विजेता'. उन दिनों वायुसेना के 50 वर्ष हो गए थे तो मेरे मन में यह विचार आया कि भारतीय वायुसेना पर कोई फ़िल्म आनी चाहिए. इस सिलसिले में अमित जी ने मेरी मुलाक़ात वायुसेना प्रमुख दिलबाग सिंह से कराई. उन्होंने फ़िल्म की अनुमति दे दी. फ़िल्म बनी, इसकी बहुत तारीफ़ भी हुई पर यह भी चली नहीं. इसके बाद एक फ़िल्म बनाई- 'उत्सव'. इसमें अमित जी काम करने वाले थे पर वो बीमार पड़ गए. आख़िर में वो रोल भी मुझे करना पड़ा. वो फ़िल्म भी मुझे अच्छी लगी पर वो भी नहीं चली. नाकामयाब रही कोशिश तो इस तरह 'जुनून' के बाद से चार फ़िल्में कुछ बेहतर नहीं कर पाईं. इससे हुआ यह कि मुझे आर्थिक नुकसान हुआ और मेरी हालत कुछ कमज़ोर पड़ने लगी.
इसके बाद विचार आया कि एक फ़िल्म ऐसी बनाई जाए जो कुछ हटकर भी हो और व्यावसायिक भी हो. इसके लिए हमने 'अजूबा' बनाने का फ़ैसला लिया. इसमें अमिताभ बच्चन, अमरीश पुरी, ऋषिकपूर, डिंपल जैसे कई स्टारों ने काम किया. इसका निर्देशन भी मैंने किया. पहले इसे राजकपूर साहब बनाने वाले थे पर उनकी तबीयत ख़राब हो गई और फिर फ़िल्म शुरू करने के दो महीने बाद ही वो अलविदा कह गए. अफ़सोस कि यह फ़िल्म भी नहीं चली. इसके बाद मेरी हिम्मत जवाब दे गई. जेनिफर भी छोड़कर जा चुकी थीं. उनका निधन हो गया था. हालांकि मुझे लोगों ने सुझाव दिया कि फ़िल्में बनाते रहिए पर मैं फ़्लाप फ़िल्में बनाने का सिलसिला आगे नहीं ले जाना चाहता था और इसलिए मैंने 'फ़िल्मवालाज़' को बंद कर दिया. खुशी इस बात की है कि मैंने 'फ़िल्मवालाज़' और पृथ्वी थिएटर का काम एक साथ शुरू किया था. 'फ़िल्मवालाज़' तो बंद हो गया पर पृथ्वी थिएटर आज भी चल रहा है. तब से लेकर आज तक साप्ताहिक अवकाश के अलावा पृथ्वी कभी बंद नहीं हुआ. हाँ, मुंबई में पिछले वर्ष बारिश के दौरान और फिर इस वर्ष बम धमाकों के बाद एक-दो दिन के लिए शो रोक दिए थे. उम्मीद करता हूँ कि मेरे जाने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहे.... (जानी-मानी फ़िल्मी हस्ती शशिकपूर के ज़िंदगी के तमाम पड़ावों और अनुभवों की यह बानगी शशिकपूर से हमारे साथी पाणिनी आनंद की बातचीत पर आधारित है. इस सिलसिले में अगले कुछ हफ़्तों तक हम साप्ताहिक रूप से आपको सामग्री उपलब्ध कराएँगे. यह अंक आपको कैसा लगा, इस बारे में हमें अपनी प्रतिक्रिया भेजें- hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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