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'जेनिफ़र मुझे अगले जन्म में भी मिलेंगी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब मैं 18 वर्ष का था तब मैंने शेक्सपीरियाना के साथ काम करना शुरू किया. शेक्सपीरियाना एक थिएटर कंपनी थी जिसके मालिक थे जेफ्री कैंडल. यह भी एक इत्तफ़ाक है कि जिस शहर (कोलकाता) में मैं पैदा हुआ, वहीं पर मुझे प्यार हुआ. हम लोग पृथ्वी थिएटर की ओर से कुछ नाटक करने वहाँ गए हुए थे. वहाँ अंपायर थिएटर में हम लोग अपना शो कर रहे थे. पहले कार्यक्रम तीन हफ़्ते का था पर इसे बढ़ाकर हमने पाँच हफ़्ते का कर दिया था. इसी के पास एक होटल था- फ़ेयर लॉन होटल. यह होटल आज भी है और मैं आज भी वहीं जाकर ठहरता हूँ. हम लोग आसपास ही थे और मैंने देखा कि बार-बार एक बहुत ही ख़ूबसूरत लड़की दिखाई दे रही है. मुझे वो लड़की रूसी लगी. मैंने उसे देखा, इसके पीछे की भी एक वजह है. मैं उन दिनों पृथ्वी थिएटर में सहायक स्टेज मैनेजर था और उन दिनों यह परंपरा थी कि सहायक स्टेज मैनेजर शो शुरू होने से पहले इस बात का जायज़ा लेता था कि हॉल की स्थिति क्या है और क्या हॉल भर गया है. एक लड़की को देखा तो... मैंने इसी मकसद से पर्दे के पीछे से झाँक कर देखा तो पाया कि एक बहुत ही ख़ूबसूरत लड़की आगे से तीसरी लाइन में बैठी है. फिर पता चला कि यह तो इस थिएटर के मालिक की सीटें हैं. इसके बाद पता चला कि कोई अंग्रेज़ी थिएटर कंपनी है जो हमारे जाने का इंतज़ार कर रही है कि कब हम जाएँ और फिर वो अपना शो शुरू करें. इसके बाद मैंने उस लड़की से मिलने की बहुत कोशिश की पर कामयाब नहीं हो सका. इसके बाद मैंने अपने चचेरे भाई सुबिराज जी से कहा कि वो मेरी मदद करें. सुबिराज जी बहुत हिम्मत वाले इंसान थे और उन्होंने मुझसे कहा कि वो मुझे ज़रूर मिलवा देंगे. इसके बाद वो मुझे अपने साथ पकड़कर ले गए और इसी फ़ेयरलॉन होटल में इन सभी लोगों से मिलवाया. मैंने बहुत कोशिश की कि कुछ आँख से आँख मिले, कुछ बात आगे बढ़े पर कुछ न कह सका. जेनिफ़र ने भी देखा, अभिवादन किया और फिर खाना खाने लगीं. इसके बाद हम लौट आए. बात वहीं ख़त्म हो गई. हम आगे की यात्रा पर पटना और जमशेदपुर के लिए रवाना हो लिए. उसके बाद हम मुंबई लौट गए. ...और प्यार हो गया उन दिनों मैं किसान नाटक के लिए काम कर रहा था. एक दिन सुबह मुझे रिहर्सल से पहले ही किसी ने आकर कहा कि कोई लड़की मिलने आई है. मैं पीछे की तरफ गया तो पाया कि वही ख़ूबसूरत लड़की, जेनिफ़र मेरे इंतज़ार में खड़ी है. मेरा दिल उसे देख कर धड़का, मुझे उसका आना बहुत अच्छा लगा. उन्होंने बताया कि वो अपनी कंपनी के नाटकों के प्रदर्शन के सिलसिले में मुंबई आई हुई हैं. ख़ैर, यहाँ से बातचीत आगे बढ़ी. हमें प्यार हुआ. मैं शुक्रगुज़ार हूँ जेनिफ़र जी का. उन्होंने बात आगे बढ़ाई वरना मैं तो समझ बैठा था कि अब बात आगे बढ़ने वाली नहीं है. इसके बाद वे लोग शो करने आगे चले गए. कुछ दिनों बाद जेनिफ़र के पिताजी का मेरे पिताजी के पास पत्र आया कि उनकी टीम का हीरो लंदन लौट गया है इसलिए तत्काल एक युवा लड़के की ज़रूरत है. पिताजी ने मुझसे पूछा और मैंने हाँ कर दी. हालांकि माँ इससे सहमत नहीं दिखीं. उनका कहना था कि इतने दिनों के लिए कुछ अनजान लोगों के साथ जाने की क्या ज़रूरत है पर फिर मैं इजाज़त लेकर चला गया. इसके बाद शेक्सपीरियाना के साथ मैं दो साल रहा. शादी इसके बाद 1958 में हमने तय किया कि अब शादी कर लेनी चाहिए लेकिन मैं घर वालों से छिपाकर शादी नहीं करना चाहता था. मैं अपनी माँ से ऐसा वादा कर चुका था. दरअसल, शम्मी जी ने गंधर्व तरीके से शादी कर ली थी, बिना घर वालों को बताए. इससे माँ कुछ विचलित हुई थीं. हालांकि पिताजी ने बाद में मुंबई में रिसेप्शन दिया था. मैं सिंगापुर में था और जेनिफ़र भी मेरे साथ थीं. हमारे पास भारत आने के पैसे नहीं थे. राज जी को मैंने फ़ोन पर मदद करने के लिए कहा और फिर हम दोनों भारत पहुँचे. मेरी शादी ऐसे वक्त में हुई जब पिताजी मुगले आज़म की शूटिंग में व्यस्त थे. वो जयपुर में थे. निर्देशक के आसिफ़ साहब ने मेरे पर उस वक्त बहुत मेहरबानी की थी. उन्होंने पिताजी के लिए विशेष डेकोटा प्लेन बुक किया जिससे मेरे पिताजी दिन ढलते जयपुर से शूटिंग करके निकले और मेरी शादी में रहने के बाद अगली सुबह जयपुर वापस लौट गए. रात में लौटना उनके लिए संभव था नहीं क्योंकि जयपुर में हवाई जहाज़ों के रन-वे पर रोशनी की सुविधा नहीं थी. इस तरह हमारी शादी हो गई. मुझे लगता है कि मेरा और जेनिफ़र का साथ जन्म-जन्मांतर का है. पिछले जन्म में भी वो मेरे साथ रही होंगी और शायद अगले जन्म में भी वो मेरे साथ रहें. (जानी-मानी फ़िल्मी हस्ती शशिकपूर के ज़िंदगी के तमाम पड़ावों और अनुभवों की यह बानगी शशिकपूर से हमारे साथी पाणिनी आनंद की बातचीत पर आधारित है. इस सिलसिले में अगले कुछ हफ़्तों तक हम साप्ताहिक रूप से आपको सामग्री उपलब्ध कराएंगे. यह अंक आपको कैसा लगा, इस बारे में हमें अपनी प्रतिक्रिया भेजें- hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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