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'राजकपूर में कुछ ख़ास बात थी. और शम्मी....' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं पृथ्वीराज कपूर जी के तीनों बेटों में सबसे छोटा था. सबसे बड़े थे राजकपूर, उनके बाद शम्मी कपूर और फिर मैं. मेरे व्यक्तित्व पर केवल मेरे पिता का ही प्रभाव नहीं रहा बल्कि मेरे भाई राजकपूर और शम्मीकपूर का भी रहा है. मैंने थिएटर की बहुत सारी बातें अपने पिताजी से सीखीं. थिएटर में मेरे पिता मेरे गुरू थे और फ़िल्मों में राजकपूर मेरे गुरू थे. मुझे अपने छोटे होने का हमेशा ही फायदा मिला और दोनों ही भाइयों से जब भी जो भी माँगा, उन्होंने मुझे दिया, मेरी मदद की. मेरे पास जो पहली गाड़ी थी वो मुझे शम्मीकपूर जी ने दी थी. मेरी दूसरी गाड़ी ज़रा महंगी थी. वो मुझे राज जी ने लाकर दी थी. यहाँ तक कि मेरी शादी से पहले मैं और जेनिफ़र स्विट्ज़रलैंड में थे. उन दिनों थिएटर करने वालों के पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे. मेरे पास घर से लौटने के पैसे नहीं थे. उस समय मैंने राज जी से ही ट्रंक कॉल करके पैसे माँगे थे और भारत लौटा था. महान शो-मैन हम तीनों भाइयों में सबसे गुणी थे राज जी. उनमें कुछ ख़ास बात थी. एक बहुत अच्छे इंसान तो वो थे ही साथ ही एक बहुत अच्छे फ़िल्मकार भी थे. दूसरी सबसे अच्छी बात थी उनका म्यूज़िक सेंस. राजकपूर मेरे लिए पिता समान ही थे. राजकपूर साहब मेरे होश संभालने से पहले ही बहुत बड़े स्टार हो चुके थे और बहुत ही बड़ी-बड़ी फ़िल्मों में काम कर चुके थे. उन्होंने ख़ुद भी फ़िल्में बनाना शुरू कर दिया था. उनकी ही एक फ़िल्म में मैंने भी शुरुआती दिनों में काम किया था. फि़ल्म का नाम था 'आग'. यह 1947 में बनी थी और 1948 में रिलीज़ हुई थी. उस समय मैं काफ़ी छोटा था. चाहे कोई मुझे.... शम्मीकपूर भी एक जाने-माने कलाकार रहे. हालांकि शुरुआती दौर में उनका काम कुछ दूसरी तरह का था पर बाद में पिताजी ने ही उन्हें एक ऐसा रोल दिया जिससे उनकी एक नई छवि उभरकर सामने आई.
नासिर हुसैन उन दिनों अपनी पहली फ़िल्म बना रहे थे. उसी दौरान वो पृथ्वी आए, एक नाटक देखने और शम्मीकपूर का काम देखकर उन्होंने तय कर लिया कि इस फ़िल्म में वो उन्हें मौका देंगे. और इस तरह शम्मीकपूर को नासिर हुसैन की 'तुम-सा नहीं देखा' में काम करने का अवसर मिला. हालांकि इससे पहले शम्मीकपूर कई फ़िल्मों में काम कर चुके थे पर इतने सफल नहीं रहे थे. उनके काम को ज़्यादा पसंद नहीं किया गया था. उनकी फ़िल्में हिट नहीं हुआ करती थीं पर 'तुम सा नहीं देखा' ख़ूब चली और उसके बाद तो फिर वो स्टार ही बन गए. एक से बढ़कर एक फ़िल्में उन्होंने कीं. वो दौर बस एक ही बात मुझे नागवार गुज़र रही थी. उन दिनों लोगों के अभिनय में बनावटीपन ज़्यादा देखने को मिलती थी और उसका उसर उनकी ज़िंदगी पर भी देखने को मिलता था. मेरे परिवार में भी ऐसा दौर आया था. हालांकि पिताजी के साथ ऐसा नहीं हुआ पर राज जी और शम्मी जी में यह बात देखने को मिलने लगी थी. अच्छी बात यह थी कि इन लोगों ने समय रहते इसको पहचान लिया और इससे बाहर निकल आए. इसके बाद राजकपूर एक महान फ़िल्मकार बने. एडिटिंग से लेकर निर्देशन तक और बाकी के तमाम पहलुओं पर उनका अद्भुत प्रभाव था. राजकपूर का भारतीय फ़िल्म जगत को योगदान काफ़ी बड़ा है. शम्मीकपूर का फ़िल्म जगत को सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि एक अलग क़िस्म का रोल और एक अलग क़िस्म का चरित्र उन्होंने भारतीय फ़िल्मों को अपने अभिनय से दिया था और उन्हें युवा वर्ग ने बहुत ज़्यादा पसंद किया था, अपनाया था. (जानी-मानी फ़िल्मी हस्ती शशिकपूर के ज़िंदगी के तमाम पड़ावों और अनुभवों की यह बानगी शशिकपूर से हमारे साथी पाणिनी आनंद की बातचीत पर आधारित है. इस सिलसिले में अगले कुछ हफ़्तों तक हम साप्ताहिक रूप से आपको सामग्री उपलब्ध कराएँगे. यह अंक आपको कैसा लगा, इस बारे में हमें अपनी प्रतिक्रिया भेजें- hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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