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अकबर-बीरबल संवाद | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
(बिंदास बाबू की डायरी) कभी जहाँपनाह ने अपने मुँहलगे दरबारी बीरबल से पूछा था- बीरबल ने अपने उस जन्म में तपाक से जवाब दिया था- इस पर बादशाह ने खुश होकर बीरबल को गले लगा लिया था. यह तो पुराने जन्मों की बातें रही. इस जन्म में फिर बादशाह ने बीरबल से लाख टके का सवाल किया है. जहाँपनाह ने पूछा. बीरबल बताओ- बीरबल ने कहा, "महाराज जान की ख़ैर चाहता हूँ. मामला आपकी पॉलिसी से ताल्लुक रखता है. पॉलिसी पर बोलना इस दरबारी के लिए मना है. सो आप धर्मसंकट में न डालें." बादशाह भाँप गए कि बीरबल पॉलिटिक्स मार रहा है. बोले, "हम तुम्हें एडवांस ट्रेडिंग की तरह एडवांस में माफ़ी देते हैं. अब बोलो. बेधड़क होकर जवाब दो." बीरबल ने कहा, "महाराज आपने ख़ुद ही जवाब दे दिया है. मैं क्या बोलूँ?" जहाँपनाह ने फ़िल्मी डॉयलाग बोला, "हम कुछ समझे नहीं." बीरबल ने कहा, "सर जी, आपने कहा न 'एडवांस'. सो सर जी एडवांस ट्रेडिंग की वजह से ऐसा हुआ." "एडवांस ट्रेडिंग?" बादशाह सलामत ने एडवांस बुकिंग सुनी थी. मुग़ले आज़म की पहली रिलीज़ पर एडवांस बुकिंग के चक्कर में कभी खिड़की तोड़ी थी सो चकरा गए. लगा बीरबल का बच्चा मज़ाक कर रहा है. गुस्से से बोले, "देखो पहेली न बुझाओ. समझाकर कहो." बीरबल बोला, "हे अनाथों के नाथ. बेसहारों के सहारे. आपके राज में ही तो एडवांस ट्रेडिंग का खेल हो रहा है. वायदा कारोबार का जल्वा है. जो वायदा करते हैं, वे निभाते हैं. सिर्फ़ ज़ुबानी जमा खर्च होता है. आप कह दें कि मैंने दस लाख टन चीनी इत्ते में ख़रीदी और इत्ते में बेची. टमाटर इत्ते में लिया, इत्ते में दिया." "सो सारा खेल यह है कि न अपने पास एक टमाटर, न चीनी का एक दाना मगर एडवांस ट्रेडिंग का कारोबार इसी तरह चलता है." "दूसरा कारण कॉमोडिटी एक्सचेंज का खेल है. इसे हिंदी में 'द्रव्य विनिमय' कहते हैं. बड़े-बड़े एक्सचेंज हैं. रोज़ कॉमोडिटी एक्सचेंज करते हैं. चेंज यानी परिवर्तन होता रहता है. यही प्रकृति का नियम है." "तीसरा एक्सपोर्ट का है." तभी भरे दरबार में एक पिचका हुआ टमाटर किसी तरह लुढ़कता हुआ आया और बोला, "हे बादशाह सलामत, ग़रीब नवाज. मैं धरती का आखिरी टमाटर यह फ़रियाद करता हूँ कि मुझे बचा लें. नहीं तो आगे की कौमें मुझे देखने को तरस जाएँगी. मुझे पता नहीं किस बाजार में कहाँ एक्सपोर्ट कर दिया गया. वहीं से लुढ़कता-बचता चला आ रहा हूँ. बचा लीजिए माई-बाप." एक कोने से अरहर की दाल के दाने की पहली-सी आवाज़ आई, "महाराज हमारा रेट तो बढ़ गया लेकिन वेट घट गया. लोग अब हमें खाते नहीं. फ़ोटो से दर्शन कर दूरदर्शन से काम चलाते हैं. यह जीना भी कोई जीना है. बचाइए प्रभु." बादशाह ने मौका-मुआयना करना तय किया और ड्राइवर से बीएमडब्ल्यू निकालने को कहा. ड्राइवर बोला, "महाराज उसमें पेट्रोल कहाँ है? पेट्रोल जब से चढ़ा है. बंद पड़ी है." इसके बाद बादशाह खामोश हो गए. (बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा. लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर) |
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