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मंगलवार, 25 अप्रैल, 2006 को 06:37 GMT तक के समाचार
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संतों घर में झगड़ा भारी

बिंदास बाबू
झगड़ा भारी है. झगड़ा जारी है. परिवार में झगड़ा है. घर के भीतर झगड़ा है. दिल के भीतर हज़ार झगड़े हैं.

यह तो हमारे संतों भक्तों ने बहुत पहले ही जान लिया था कि सारे कुकर्मों की जड़ माया है. प्रॉपर्टी है.

लेकिन कलजुग में सतजुगी परिवार चलाने का दंभ भरने वालों ने नहीं जाना कि अपने ही संतों ने भक्तों ने क्या-क्या कहा है? यों अगर जानते भी होते तो क्या झगड़ा रुक जाता.

जब तक प्रापर्टी के माल पर निजी कब्ज़ा है. भाई से भाई लड़ता रहेगा. बाप बेटे से लड़ेगा, बहन भाई लड़ेंगे. ये कैपीटलिज्म है प्यारे.

प्रमोद भाई के साथ यही होना था. किसी के साथ भी हो सकता है. अपने समाज का इतिहास तो ऐसे एपीसोडों से भरा पड़ा है.

महाभारत तो सगे भाइयों की सुपर फाइट ही थी जो लड़ते लड़ते मर गए और प्रापर्टी को भोगने वाला भी कोई नहीं रहा.

प्रमोद के घर वालों की स्थिति ऐसी ही है. जुबां चुप है. वे क्या कहें, पार्टी सकते में हैं. क्या जाने क्या हुआ?

मगर प्रवीण बिना किसी अफ़सोस के कह रहा है कि वो मुझे कुत्ते की तरह ट्रीट करता था. दो हज़ार करोड़ का आसामी था. मैं फटीचर, घोर अन्याय है.

उसके नेता होने से मुझे हमेशा हीनताबोध हुआ. क्या करता. पहले से ही योजना थी कि उड़ा दिया जाए. और उड़ा दिया.

प्रमोद को देखने भाजपा के नेता अभिनेता आए. सुपर सेठ आए. नहीं आए तो सुपर परिवार के कोई संघ संचालक नहीं आए.

सब दिखे लेकिन ये नहीं दिखे. एक लाइन की ख़बर तक कहीं नहीं दिखी कि संघ जी आए थे सांत्वना देने. उमा अब तक एक शब्द शायद नहीं बोली हैं.

उनका पंगा था. दुख में हमदर्दी दिखाई जाती है, भले वह तमाशा हो. यहाँ आधी हमदर्दी दिखती है.

घर-घर की कहानी

प्रवीण घर घर हैं. बड़े परिवारों में सब बालक एक जैसे आगे नहीं बढ़ते. अक्सर छोटा पिछड़ जाता है.

बाप न रहे तो वह अनाथ सा हो जाता है. यह घर घर होता है. सामान्य जीवन में भाई भाई को रोज़ाना मारता है. समाज में क्या नहीं होता?

प्रवीण ने जो किया वह कोई अनहोना नहीं किया. लेकिन मामला दो हज़ार करोड़ वाले हाईप्रोफाइल भाई का है इसलिए बड़ी ख़बर है.

टीवी ने ऐसे मौकों पर प्रार्थना दुआ करने की रस्म चला दी है सो भाजपा के लोग हवन आदि करते दिखते हैं. महामृत्युंजय का जाप करते दिखते हैं क्या करें ?

लोग प्रवीण पर नाराज नहीं चकित हैं. दुखित हैं. घरवाले चुप हैं. अगर आगे पंगा लिया तो कही यह प्रवीण का बच्चा असल भेद न खोल दे.

पहली ख़बर तो यही आई भी कि दोनों भाइयों में प्रोपर्टी को लेकर झगड़ा था. आखिर प्रवीण प्रमोद की बढ़त के समय से उनके सब तरह के खाते मेंटेन करता रहा है.

इस त्रासद कहानी के कई सबक हैं. पहला ये कि भाजपा के मझले नेताओं में प्रमोद सबसे ताकतवर थे. खजाना वे ही देखते थे. उसका हिसाब किसके पास है? पार्टी नेतृत्व चिंतित है.

दूसरा सबक ये कि भाई हो या कि छोटा आदमी आप उसे गोली मार दें लेकिन गाली न दें. अपमानित न करें. इन दिनों आदमी गोली सह लेता है गाली नहीं.

तीसरा कि “सुपर परिवार” सही सलामत है इस गलतफहमी को निकाल दें.

कलजुग में माया रूल करती है, गुसाई जी कह गए हैं. और कोई उसे लांघ नहीं सकता, ऐसा कबीर कह गए हैं.

तो सावधान अपने परिवार का ख्याल करो भैये वरना ....

(बिंदास बाबू की डायरी का ये पन्ना आपको कैसा लगा, इस बारे में hindi.letters@bbc.co.uk पर अपनी राय भेजें.)

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