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मंगलवार, 04 अप्रैल, 2006 को 13:36 GMT तक के समाचार
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कलियुग की त्याग लीला
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

इस घनघोर कलयुग में जब कभी कोई व्यक्ति गैरकलयुगी हरकतें करता नज़र आता है तो लगता है कि सतयुग का कोई एंटीक आइटम किसी कब्र से निकल आया है.

जया बच्चन की सदस्यता जाने के बाद सोनिया जी की नैतिकता की जान निकली हुई थी.

उन्हें अपनी बेदाग़ छवि पर एक दाग़ अचानक लगने की चिंता हुई और उन्होंने दो दिन की नोक-झोंक के बाद लोकसभा की सीट छोड़ दी. छवि बची, जान बची.

मगर काँग्रेसी चेले चाटियों ने कहा- धन्य-धन्य. क्या त्याग है? सोनिया इसीलिए तो महान हैं कि वे पद लोलुप नहीं है. पहले पीएम होना ठुकराया. अब संसद को त्यागा.

त्याग लीला का ऐसा महात्म्य देख अन्य काँग्रेसी, सेमी-काँग्रेसी जनों की आत्मा कुलबुलाई और वे त्यागने के लिए कसमसाने लगे.

कर्ण सिंह ने सीट त्याग दी. उधर संस्कृति और कलाओं की धरोहर की हिफ़ाजत करने वाली कपिला जी ने एकदम कल परसों मिली सदस्यता त्याग दी.

काँग्रेस की आत्मा ऐसी ही है वह यों तो सोई पड़ी रहती है. अचानक सबसे पहले नेता की आत्मा जगती है. रे मूरख तू क्या कर रहा? कोई त्याग लीला नहीं की? धिक्कार है.

नेताजी जानते होते हैं कि भारत की जनता को चाहे आप रोटी कपड़ा मकान दें न दें बस एक ठो ‘त्याग’ दे दें. लोग आपको कलयुग में सतयुगी अवतार कहेंगे पूजेंगे कि देखो आज भी त्यागता है, संग्रह नहीं करता.

इन दिनों यह आत्मा कभी क़ानून कभी कंट्रोवर्सी कभी विपक्ष के दवाब में त्याग लीला करती है. मगर त्याग का कलयुगी महात्म्य यही है.

त्याग की गारंटी

इधर त्याग किया जाता है उधर उसके एवज में कुछ पाने की गारंटी कर ली जाती है.

 पानी बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम, दो हाथ उलीचिए, यहै सयानो काम

तभी तो ज्यों ही त्याग की बात हुई त्यों ही रायबरेली में जनता सड़कों पर आ गई और कहने लगी सोनिया तुम त्याग करो हम तुम्हारे साथ हैं.

कभी आडवाणी जी ने भी सदस्यता छोड़ दी थी वे कुछ दिन के लिए महान हो गए थे. गाँधी जी ने सत्ता कभी चाही ही नहीं. उनके चेले जेपी ने भी सत्ता बनवाई-बिगाड़ी लेकिन चाही कभी नहीं. हैं न सुपर त्यागी आत्माएँ.

इसे भारतीय संस्कृति में ‘भोग से त्याग’ करने की संस्कृति कहते हैं. पहले भोग लगा लो. मन भर जाए तो त्याग दो. भोग करने के कई लेवल होते हैं कोई सीधे भोग करते हैं कोई अपने बाल बच्चों को भोग लगाते देख आनंदित होते हैं.

कभी विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी त्याग कर डाला था. इस्तीफा लिए घूमते थे. दे दिया. बाद में बड़ा बड़ा पछताए. एक कवि ने उनकी व्यंग्य किया था- वीपी कह रहे हैं कि ‘मेरा इस्तीफ़ा लौटा दो वरना इस्तीफा दे दूंगा.’

रिसर्च बताती है कि इस्तीफ़ा देने के बाद सब मन ही मन कहते हैं मेरा इस्तीफ़ा लौटा दो वरना इस्तीफा दे दूंगा. इस्तीफ़ा देकर सोनिया ने रायबरेली से यही कहा है.

आने वाले दिनों में लोग जरा सी बात पर त्याग त्याग खेला करेंगे. त्याग होने लगेगा. किसी ने ‘तू’ कह दिया तो इस्तीफा दे दिया.

दाल में नमक कम हुआ तो इस्तीफा दे दिया... ये पद पदारथ क्या चीज हैं ? कलयुग में अपने यहाँ ‘सत्य हरिचंद्रों’ की भरमार है.

जब राजनीति गोल गप्पे की तरह मजेदार और फुटबॉल की तरह गोल हो जाती है तो उसे त्यागना बड़ा सुखकर लगता है.

आप कितना भी त्यागो सत्ता लौटकर आती आपके पास ही है. इतनी इतनी सत्ता है प्रभु ? त्यागें नहीं तो क्या करें?

पानी बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़ै दाम
दो हाथ उलीचिए, यहै सयानो काम.

कलयुग में त्याग की लीला इसी तरह चलती है.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह कॉलम आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में [email protected] पर अपनी राय भेजें.)

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