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मंगलवार, 04 अप्रैल, 2006 को 15:48 GMT तक के समाचार
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छूने से मर जाने का खेल!
बिंदास बाबू
(बिंदास बाबू की डायरी)

बच्चों का एक खेल है छूने से मर जाने का खेल. खेलते-खेलते अगर कोई बच्चा दूसरे को छू लेता है तो वह मर जाता है. फिर एक ख़ास प्रक्रिया में ज़िंदा भी हो जाता है. जब तक थक न जाएँ यही चलता रहता है. खेल ठहरा.

इन दिनों बड़े नेताओं ने इस ‘छूने से मर जाने के खेल’ को खेलना शुरू कर दिया है. वे लाभ के पद को छूना नहीं चाहते. जिसने छुआ वही मर गया लगता है.

देश में लाभ के पद संदेहास्पद हो उठे हैं. सरकार भी चाहती है कि मसले पर कोई क्लैरिटी हो जाए. उसे मालूम है कि पद अगर है तो हानि का नहीं लाभ का ही होता है.

सवाल ये है कि किस कोटि का है? कितना है? कोई एक व्यवस्था तो होनी चाहिए न. कल को कहीं हमारे सांसद, विधायक लाभ लेने को पाप कहते दिखें तो हम सबको डूब मरने को जगह नहीं मिलेगी.

इतिहास बता देगा कि किसका बाप लाभ के पद पर रहा था. क्या करें सार्वजनिक जीवन में देखने- दिखाने लायक शुचिता ज़रूरी है न.

जिस पूंजीवाद में ‘फ्री लंच’ कभी नहीं होता उस में लाभ के पद अपराध बन रहे हैं.

जिस देश में तिजोरी पर लाला जी शुभलाभ लिखकर खाता खोलते हों, जिस सीट पर बैठकर नेताजी हवा में से पैसे बनाने के गुर जानते हों, जहाँ हर आदमी एक प्रकार का अनाफ़िशियल ‘सेवा कर' चुकाता हो वहाँ बताया जा रहा है कि लाभ के पद पर नहीं रहना चाहिए.

पाप लगता है. सांसद हो या विधायक हो तो लाभ के पद से मीलों दूर रहना चाहिए. यह ‘उल्टे बांस बरेली’ ले जाना है. जिस दुनिया में हेलो करने के भी पैसे लगते हों, वहाँ नेता कहते है कि वे लाभ से दूर रहना चाहते हैं. ये तो जन सेवा होगी जी.

 वैसे इस देश में लाभ के प्रति इतना विराग क्यों है? जहाँ भगवान जी तक सहेतुक अवतार लेते हों अपने भक्तों को भजन कीर्तन आदि के बदले मोक्ष देते हों वहाँ लाभ अस्पृश्य कैसे हो सकता है?

हम तो सच्चे मन से जनसेवा करते हैं. हमें क्या पता कि जिस पद पर पार्टी ने बिठा दिया उससे लाभ भी होता है. हमारा तो नहीं हुआ उल्टे हानि ही हुई बदनामी हुई है जिसका लाभ हुआ वो थैंक्यू नहीं देता जिसका नहीं हुआ वो रिपोर्ट कर देता है.

सबसे अच्छा है सांसद रहें पद न लें. हर पद में लाभ है. नाममात्र का पद हो तो भी बंदे करोड़ो इधर-उधर कर डालते हैं, हाथ की सफ़ाई ठहरी. क्या ये लाभ का काम है? जी नहीं, इतना किसी निजी कंपनी के लिए करते तो अरबपति हो गए होते. लाभ क्या है सेवा-शुल्क है.

शुल्क तो मिला नहीं मिली सिर्फ़ बदनामी. आक् थू. नेता लोग नैतिकता के बारे में सोचते हैं.

वैसे इस देश में लाभ के प्रति इतना विराग क्यों है? जहाँ भगवान जी तक सहेतुक अवतार लेते हों अपने भक्तों को भजन कीर्तन आदि के बदले मोक्ष देते हों वहाँ लाभ अस्पृश्य कैसे हो सकता है?

एक तरीका है. आगे से सब ऐसे पदों पर लिख दिया जाना चाहिए ये ‘हानि के पद’ हैं. जो काम करेगा उसे इतना देना पड़ेगा. समस्या हल हो जाएगी.

साँप मर जाएगा, लाठी तेल पीकर जवान होती रहेगी. कारण, हानि के पद में भी लाभ कमाया जा सकता है. सिर्फ़ अक़्ल और हुनर, ज़रा हाथ की सफ़ाई चाहिए. और इस सफ़ाई की अपने यहाँ कमी नहीं.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह कॉलम आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में [email protected] पर अपनी राय भेजें.)

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