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मंगलवार, 11 अप्रैल, 2006 को 08:20 GMT तक के समाचार
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बिंदास बाबू
अपने जनतंत्र में अनेक तंत्र हैं. छूटतंत्र, लूटतंत्र, शूटतंत्र, कूटतंत्र, झूठतंत्र, हूटतंत्र तमाम तरह के तंत्र हैं और तमाम तरह के मंत्र.

लूटतंत्र का दौर है. जिस तरह कलजुगी भक्त जाप करता है ‘राम नाम की लूट है लूट सके सो लूट’ उस तर्ज़ पर अर्जुन सिंह ने जल्दी-जल्दी भजना शुरू कर दिया है.

आरक्षण की लूट है लूटी जाए सो लूट
अंत काल पछताएगा प्राण जाएँगे छूट

इतिहास की किताबों को बदलते-बदलते अर्जुन सिंह ने इतिहास को ही बदलने की ठानी है. आख़िर ठाकुर जी का संकल्प ठहरा.

 सामंत श्रीमंत भाव के लोग जब अपने मुखारविंदों से ‘न्याय’ की बात करते हैं तो सुनते हुए डर लगता है मानों गब्बर सिंह बोल रहा हो. तुझे कितना न्याय चाहिए कालिया?
बिंदास बाबू

एक त्रासद कामिक फ़िल्म दुहर रही है. मंत्री मोहदय ने मंडल को अपने कमंडल से लेकर रिज़र्वेशन का मंत्र मार दिया है. वे टोह ले रहे हैं कि आरक्षण का ब्रह्मास्त्र चला दिया जाए तो इतिहास किस करवट बैठेगा? वे इतिहास में आने को आतुर हैं.

इतिहास में जाने का चस्का जिसे लगा वो इहलोक से तो गया ही परलोक से भी गया. एक त्रासदी पहले हो चुकी है.

मंडल राग

मंडलायित वीपी सिंह साहब ने अपनी गद्दी बचाने के चक्कर में सामाजिक न्याय का मंडल राग छेड़ा तो गद्दी गई ही. हालत ये हो गई कि अब ‘सेंतमेत’ भी कोई नहीं लेता.

पहले मंडल का रोग वीपी सिंह को लगा. अब वीरोचित उत्साही अर्जुन सिंह को लगा है. दोनों की कुंडली एक सी लगती है.

सुगति-दुर्गति भी एक सी होती है. अजीब समानता है. वे भी ठाकुर राज रहे. ये भी ठाकुर राजा रहे. वे देवीलाल से परेशान रहे तो ये मनमोहन सिंह से.

गुजरे ज़माने के सामंत लोगों को इन दिनों अपराध बोध जरा ज़्यादा ही सालता है. ये यह ज़बरदस्ती की न्यायप्रियता तंदुरुस्ती के लिए ठीक नहीं कही गई.

सामंत श्रीमंत भाव के लोग जब अपने मुखारविंदों से ‘न्याय’ की बात करते हैं तो सुनते हुए डर लगता है मानों गब्बर सिंह बोल रहा हो. तुझे कितना न्याय चाहिए कालिया?

जिस तरह बुढ़ौती का प्रेम जानलेवा होता है उसी तरह बुढ़ौती में न्याय और समानता की गुहार जानलेवा साबित होती है. हुई है. लेकिन क्या करें सत्ता जब फ़्री में आती है तो न्याय और समानता की बातें सत्ता के साथ फ़्री में मिला करती है.

भावना

आदमी इतिहास में जल्दी से जल्दी जाने को मचल उठता है. राजाजी मचल उठे हैं.

 दरअसल ये न्याय शब्द है ही ऐसा. एक मिथक की तरह पीछे लग जाता है. जितना अन्यायवादी हुआ उतना ही ज़्यादा न्याय-न्याय चिल्लाएगा.
बिंदास बाबू

ज़िंदगी भर अपने रजवाड़ों में सामंतीय रियासतों में किसी को न्याय का पानी तक न दिया. सत्ता आई तो ‘अपना क्या जाता है’ वाली फ़्री फंडिया भावना भड़क उठी. मंडल दे डाला पाप प्रक्षालन का इससे बेहतर तरीका नहीं. हर्रा लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा.

कांग्रेस के तो जितने कसीदे गाए जाए हैं कम है. जिस मंडल की कोख से लालू-मुलायम आदि निकले जिन्होंने कांग्रेस का सूपड़ा साफ़कर दिया वही कांग्रेस मंडल में अपना हिस्सा देखने लगी है.

कांग्रेस देखे तो देखे वामपंथी साथी भी ‘चील के घोसले में मांस’ देखते हैं. भूल जाते हैं कि लालू ने सीपीआई को बिहार में ठिकाने लगा दिया.

दरअसल ये न्याय शब्द है ही ऐसा. एक मिथक की तरह पीछे लग जाता है. जितना अन्यायवादी हुआ उतना ही ज़्यादा न्याय-न्याय चिल्लाएगा.

अगर रेडीकल हुआ तो ‘तू नहीं और सही और नहीं और सही’ वाली तर्ज पर ‘क्लास न सही जाति ही सही’ वाला ‘रैप’ कर डालेगा.

अपनी मांग है. ओबीसी औरतों के लिए भी बराबर का आरक्षण कर दें. न्याय का खेल औरत के प्रति न्याय से ही शुरू होना चाहिए, राजा साहब.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह कॉलम आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में hindi.letters@bbc.co.uk पर अपनी राय भेजें.)

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