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शुक्रवार, 30 जून, 2006 को 02:20 GMT तक के समाचार
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'चरण कंदुक क्रीड़ा'
बिंदास बाबू
पैर पूजने के लिए होते हैं, जो पूज्य है वह क्रीड़ा कैसे कर सकता है
(बिंदास बाबू की डायरी)

वे खेल रहे हैं. हम देख रहे हैं. वर्ल्ड कप हो रहा है. मामूली से देश मुकाबला मार रहे हैं. एक अरब से ज़्यादा वाले हम मक्खियाँ मार रहे हैं. फुटबॉल में नहीं, हम सिर फुटौव्वल में अव्वल हैं.

पिछले पखवाड़े से शर्म इधर से आ रही है और उधर से जा रही है. देश भक्ति, राष्ट्रप्रेम सब अपनी अकड़ में पानी-पानी हो रहे हैं.

इतने बड़े मुल्क में ऐसे 10-11 खिलाड़ी नहीं बनते जो डेढ़ घंटे तक खेल सकें, वर्ल्ड कप के स्तर के स्टैमिना के हों, जो एक-एक गोल के लिए जान की बाज़ी लगा दें.

दरअसल हमारी पाँच हज़ार वर्ष पुरानी परंपरा है. पाँच हज़ार वर्ष पहले ही हम विश्व गुरु बन गए. अब क्या करें? सब कुछ दे दिया. सब छोड़ दिया.

यह भी हमने बहुत पहले जान लिया कि यह जगत मिथ्या प्रपंच है. देह माया है और कीर्ति नश्वर है. आत्मा का लक्ष्य परमात्मा से मिलना भर है. ये खेलना-कूदना सब माया है.

 हे परंतप. यह जो रोनाल्डो ने गोल मारा है वह हमने ही मारा है. वर्ल्ड कप हमारा है. बॉल ब्रहमांड है. परमात्मा की कृति है. कहीं उसे लात मारी जाती है? जो मार रहे हैं परम अभद्र असभ्य हैं

तदाकारिता के परम भाव से हम कहते हैं, "हे परंतप. यह जो रोनाल्डो ने गोल मारा है वह हमने ही मारा है. वर्ल्ड कप हमारा है. बॉल ब्रहमांड है. परमात्मा की कृति है. कहीं उसे लात मारी जाती है? जो मार रहे हैं परम अभद्र असभ्य हैं."

बंगाल, केरल, तमिलनाडु, गोवा में कुछ लोग ‘चरण कंदुक’ क्रीड़ा करते हैं. बिगड़े बच्चे हैं तो भी क्लब स्तर से आगे नहीं जाते. पूरी तरह बिगड़े नहीं. अच्छी बात है.

कहावत है 'पैर नरम, पेट गरम, सिर ठंडा'. लात मारने का खेल खेलेंगे तो पैर नरम कैसे रहेंगे?

लात मारनी है तो निम्नजातियों को मारो, स्त्री को मारो. ये क्या कि कंदुक को मारते हो.

जानते नहीं हमारा राष्ट्रीय पक्षी मोर है. मोर जब नाचता है तो अपने पैरों को देख-देख रोता है. ऐसा माना जाता है. इधर पैरों को देखकर रोने की या पंडितजी लोगों के पैर पूजने-पखारने की परंपरा है. जिस राष्ट्र की राष्ट्रीय पक्षी अपने चरण देख रोता हो वहाँ के लोग पैरों से क्यों खेलेंगे जी?

 मनु स्मृति तो बता ही चुकी है कि ब्रह्म के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और चरणों से शूद्र निकले हैं. चरण सब तरह से हीन हैं. उनकी क्रीड़ा भी कोई क्रीड़ा है? दरअसल हमारे चरण ही हीन है. तब ‘कंदुक क्रीड़ा’ कैसे करें?

पैर पूजने के लिए होते हैं. पैर बड़े लोगों के होते हैं. वही पखारे जाते हैं. वंदना की जाती है. ऐसे चरण पूज्य हैं. जो पूज्य है वह क्रीड़ा कैसे कर सकता है.

मनु स्मृति तो बता ही चुकी है कि ब्रह्म के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट से वैश्य और चरणों से शूद्र निकले हैं. चरण सब तरह से हीन हैं. उनकी क्रीड़ा भी कोई क्रीड़ा है? दरअसल हमारे चरण ही हीन है. तब ‘कंदुक क्रीड़ा’ कैसे करें?

वर्ल्ड कप के ब्राजील-घाना के मुकाबले के बाद घाना के एक समर्थक ने कहा, हम गरीब देश हैं. लेकिन हमारे पास जो कुछ महान है वो हमारे पैर हैं. क्या बात है.

वे अपने चरणों की ताकत से दुनिया के विकसित देशों से मैदान में टकराते हैं. हमारे पैर हैं कहाँ? वे तो शरीर के सबसे हीन अंग हैं? क्या हीन का भी कोई रोल होता है?

तो हे परंतप. हम विश्व स्तर की फुटबॉल इसीलिए नहीं खेलते क्योंकि चरणों से शुद्र निकले हैं. चरण क्रीड़ा करना शूद्रों को लिफ्ट देना हो जाएगा न.

(बिंदास बाबू की डायरी का यह पन्ना आपको कैसा लगा. लिखिए hindi.letters@bbc.co.uk पर)

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