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'साहित्य में ही है मूल्यों की राजनीति' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिंदी के कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी आगे-आगे चलते हैं और विवाद उनसे भी आगे चलता है. वे प्रशासनिक अधिकारी रहे और भारत सरकार के सांस्कृतिक सचिव भी. अब वे रियाटर हो गए हैं. सौभाग्य से कोई विवाद न उनके आगे चल रहा है और न ही उनका पीछा कर रहा है. पिछले दिनों लंदन आए अशोक वाजपेयी ने सत्ता और साहित्य के रिश्ते पर बीबीसी से खुल कर बात की. आप बार-बार विवादों में पड़ते रहे हैं. क्या कभी लगता है कि इस कारण आप अकेले रह गए हों? मेरे शत्रु भी हैं और उनकी संख्या इतनी कम भी नहीं है. वे भी इस बात को मानेंगे कि मैंने अपनी बात कभी अस्पष्टता से नहीं कही है. मैं उन लोगों में से हूँ जो अकेले हो जाने को बड़ी ट्रेजेडी नहीं मानते. मैं अकेला पड़ जाऊँ भले ही मेरे साथ कोई न हो लेकिन अगर मैं अपने सच पर अडिग रहूँ तो मुझे ये ज़्यादा ठीक लगता है. बजाए इसके कि मेरे साथ एक भजन कीर्तन मंडली हो. आलोचना कितना अकेला करती है. अप्रभावित तो कोई नहीं रह सकता क्योंकि हम सब लोग इंसान हैं. थोड़ी देर के लिए बुरा तो लगता है. ये भी लगता है कि अगर कोई नुक्स है, कोई गड़बड़ी है तो उसे ठीक कर लें. आत्मालोचना कर लें. लेकिन उसके बाद अगर फिर आप उसी सच पर लौटेंगे तो ज़ाहिर है कि अकेले होंगे पर ज़्यादा सशक्त भी होंगे. वो अकेलापन आपको नष्ट नहीं करेगा आपको बल देगा. साहित्यकार और सत्ता प्रतिष्ठान के बीच किस तरह के संबंध की हिमायत करते हैं आप? ये संबंध तो तनाव का ही हो सकता है. ये संबंध जब तब सहकार का हो तो भी कुल मिलाकर ये तनाव का संबंध ही हो सकता है.
क्योंकि प्रतिष्ठान की अपनी मर्यादाएँ हैं अपनी बंदिशे हैं अपनी विवशताएँ हैं. दूसरी तरफ लेखकों का अपना स्वाभिमान, गरिमा और स्वतंत्रता का बोध है. इसलिए तनाव तो रहेगा ही. लेकिन क्या ये तनाव शत्रुता में बदलता है. ऐसे अवसर आते हैं जब शत्रुता में बदलना ज़रूरी हो जाता है जैसे गुजरात में नरसंहार के बाद सत्ता प्रतिष्ठान से हम लेखकों का – यद्यपि मैं तब भी एक तरह से सरकार में था, एक विश्वविद्यालय का कुलपति था – हमारा संबंध खुले विरोध, प्रतिकार का बना. हमने उसका विरोध किया. ऐसे अवसर कभी-कभी आएँगे. सत्ता को तीखी आलोचनात्मक नज़र से देखना ज़रूरी है. सत्ता की प्रजातांत्रिकता के लिए भी ज़रूरी है और ऐसी तीखी नज़र रखने वाले लोग साहित्यकार और बुद्धिजीवी होते हैं. ये उनका काम है. ये वो करते हैं तो ठीक करते हैं. सरकारी अधिकारी होने के साथ-साथ साहित्य रचना और फिर सत्ता के सहभागी होने का आरोप. संतुलन बनाना मुश्किल नहीं रहा? देखिए, मैंने तो हमेशा कोशिश की सत्ता के बरअक्स लेखक और कलाकार की स्वतंत्रता, स्वाभिमान और गरिमा सुरक्षित रहे. एक भी मौक़ा ऐसा नहीं आया जब मैंने इसके साथ समझौता किया हो. ये बात सही है कि मैं सत्ता प्रतिष्ठान में था. मैंने सत्ता प्रतिष्ठान और उसकी प्रक्रियाओं को झुकाने की कोशिश की कलाओं की ओर, संस्कृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी की ओर. और एक हद तक शायद मैं कामयाब भी हुआ. इसके बावजूद बहुत अरसे तक मुझे ग़लत समझा जाता रहा तो इसे मैंने व्यवसायिक मजबूरी मानकर स्वीकार कर लिया. मैं ये तो नहीं कह सकता कि मैं अफ़सर नहीं हूँ. लोग मुझे अफ़सर कवि कहते रहे. अब नहीं कहते. ये भी सोचने और देखने की बात है कि एक व्यक्ति पिछले 45 साल से साहित्य के ऊपर ज़िद करके अड़ा हुआ है. प्रशासन उसके पास हो या न हो. अब नहीं है लेकिन कलाओं के प्रति झुकाव और साहित्य के प्रति अनुराग में कमी नहीं आई है.. हिंदी समाज में पढ़ने-लिखने की परंपरा धूमिल क्यों हो रही है? दूसरी भारतीय भाषाओं के समाज मसलन कन्नड़, बांग्ला वो साहित्य पढ़ने लिखने वाले समाज हैं. वो साहित्यकारों का आदर करने वाले समाज हैं. तो हिंदी का समाज सिर्फ़ टेलीविज़न देखने वालों का समाज है? हिंदी का समाज दुर्भाग्य से अगर पुस्तकों से एकदम मुँह फेरने वाला समाज नहीं है, तो भी पुस्तकों, साहित्य और साहित्यकारों में उतनी दिलचस्पी लेने वाला समाज नहीं है. क्या ये साहित्य रचने वालों की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वो समाज के लोगों के लिए ऐसी रचनाएँ प्रस्तुत करे... जैसे तुलसी और कबीर ने व्यापक समाज को प्रभावित किया था. आपकी कविताएँ समाज के लिए हैं या सिर्फ़ कवियों के लिए है? अव्वल तो मेरी कविताएँ हिंदी समाज के लिए हैं, कवियों के लिए नहीं हैं. मुझे संप्रेषण की कभी कोई कठिनाई नहीं हुई है.
जब भी ऐसा अवसर आया है कि समाज के बड़े वर्ग ने उनको सुनने की थोड़ी मोहलत दी है. मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है. लेकिन ये ज़िम्मेदारी सिर्फ़ साहित्य की नहीं हो सकती. साहित्य तो अपनी शर्तों पर लिखा जाता है. महान साहित्य इस बात को ध्यान में रखकर नहीं लिखा जा सकता, या लिखा गया है कि पाठक क्या करेंगे, दर्शकों पर इसका क्या प्रभाव होगा. अगर ऐसा हुआ होता तो साहित्य में बड़े परिवर्तन हुए ही नहीं होते. मसलन, हमारे बड़े कवि हैं प्रसाद और निराला. प्रेमचंद के समकालीन रहे. प्रेमचंद अधिक लोकप्रिय थे, अधिक समाज प्रतिष्ठित रहे लेकिन प्रसाद और निराला नहीं थे. यद्यपि आज वो बड़े माने जाते हैं लेकिन हिंदी समाज में उन्हें पढ़ने-समझने वाले कितने लोग होंगे. ये कहना कठिन है. लेकिन इससे निराला या प्रसाद की साहित्यिक उपलब्धि में कोई कटौती नहीं होती. उन्होंने साहित्य के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाई या नहीं... ये भी तय नहीं होता. ये एक ज़्यादा कठिन या जटिल प्रश्न है. हिंदी समाज ने अपने साहित्य के लिए उसके मुक़ाबले बहुत कम किया है जो हिंदी साहित्य ने अपने समाज के लिए किया है. साहित्य में आपने अपने हस्ताक्षर स्थापित किए. हिंदी कवि श्रीकांत वर्मा गले तक राजनीति में डूबे थे. कभी आपने भी राजनीति में हिस्सेदारी की बात सोची? नहीं. श्रीकांत वर्मा की ही पंक्ति है: जो मुझसे नहीं हुआ, वो मेरा संसार नहीं. क्योंकि इस समय की राजनीति – सारे संसार की राजनीति ही लगभग – प्रबंध, चातुर्य और एक तरह की मूल्य विमुख राजनीति है. क्या साहित्यकार अपना ओहदा, अपना महत्व खोने के डर के कारण राजनीति में नहीं जाना चाहता? ये भय भी एक ईमानदार भय है. इसके अलावा अब असल में मूल्यों की राजनीति सिर्फ़ साहित्य और कला में हो रही है. जो झगड़े साहित्य में हैं. हमीं को लेकर जो विवाद हैं. उसका एक आधार मूल्यों को लेकर है. उसमें कितना कुपाट होता है कितना सुपाट होता है ये छोड़ दें. लेकिन मूल्यों को लेकर संघर्ष साहित्य और कला में जारी है और वही असली राजनीति है. बाक़ी तो सत्ता का खेल है. |
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