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भाजपा पसंद है मोदी नहीं: बशीर बद्र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते, बस्तियां जलाने में", जैसे अपने शेरों के लिए जाने जाने वाले शायर बशीर बद्र को हाल ही में मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. वर्ष 2003 में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के समय बशीर बद्र ने भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए लखनऊ में चुनाव प्रचार भी किया. शायद इसीलिए कुछ लोग उनकी नियुक्ति की वजह भाजपा से उनकी निकटता भी बता रहे हैं. बशीर बद्र से आलोक प्रकाश पुतुल की एक बातचीत के अंश- बशीर बद्र के बारे में कहा जाता है कि वो अपनी प्रशंसा ख़ुद ही करते रहते हैं. सच ये है कि मैं अपने बारे में कम बोलता हूं. इस देश के हर पांचवें आदमी को मेरे शेर याद हैं. ऐसे में मुझे बोलने की क्या ज़रुरत है? लेकिन दूसरा सच ये भी है कि 19वीं शताब्दी की जो ग़ज़ल रवां- दवां है, उसका शुभारंभ मेरे ही चिराग़ों से हुआ है. ऐसे में इक़बाल जैसे शायरों की जगह कहां है, जिनकी 'सारे जहां से अच्छा' को देश का बच्चा-बच्चा जानता है? इक़बाल की 'सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा' उनकी बचपन की कमज़ोर रचना है और जब उन्होंने मुस्लिम दर्शन पढ़ा तो उससे प्रभावित होकर 'मुस्लिम हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा' लिखा और बता दिया कि हिन्दोस्तां की देशभक्ति कोई अच्छी बात नहीं है और इसमें उनकी आस्था भी नहीं है. मैं इक़बाल जैसा शायर नहीं हूं जो “इन ताज़ा ख़ुदाओं में सबसे बड़ा वतन है, जो पैरहन है इसका, मज़हब का वो कफ़न है” लिख कर देशभक्ति को धत्ता बता जाते हैं और “सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा” जैसी लड़कपन में लिखी गयी कमज़ोर रचना को बाद में काट कर “मुस्लिम हैं, हम वतन है सारा ज़हां हमारा” लिखते हैं. मुझे तो इक़बाल की जगह नीरज पसंद हैं, मीर पसंद हैं और इन सबसे बढ़ कर कबीर और मीरा पसंद हैं. मैं वतनपरस्त हूं और इक़बाल से अच्छा मुसलमान हूं. यही कारण है कि वतन में आस्था रखने वाले भाजपा को मैं प्यार करता हूं क्या गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी आपके मन में इतना ही प्यार है? मैं आपकी जानकारी के लिए एक किस्सा बताना चाहता हूं. लखनऊ में जब मैं अपने अदबी पिता, तहजीबी पिता अटल बिहारी वाजपेयी का चुनाव प्रचार कर रहा था, उसी समय नरेन्द्र मोदी के लखनऊ आने की ख़बर मिली. मैं तत्काल वहां से वापस आ गया क्योंकि मैं मानता हूं कि नरेन्द्र मोदी एक बुरे आदमी हैं और बुरे आदमी को मैं पसंद नहीं कर सकता. मोदी की तरह मुझे इस्लाम मानने वाले कई लोग भी नापसंद हैं. भाजपा की हिंदू राष्ट्रवाद की नीति को लेकर आपकी क्या राय है? कहीं न कहीं रहना तो पड़ेगा और हमारी और अटल बिहारी वाजपेयी की कोशिश ही यही है कि हिन्दू और मुसलमान के बीच कोई झगड़ा नहीं हो. मेरा दूसरा नाम अटल बिहारी वाजपेयी है और अटल बिहारी वाजपेयी का दूसरा नाम भारत है. जो मुझ पर हमला करता है, वो अटल बिहारी वाजपेयी पर हमला करता है, भारत पर हमला करता है. आपकी शायरी को जितना उर्दू की दुनिया में पसंद किया जाता है, उससे कहीं ज़्यादा आप हिंदी में पढ़े जाते हैं. आप अपने को उर्दू का शायर मानेंगे या हिंदी का? मैं तो संस्कृत का शायर हूं. संस्कृत की परंपरा का ज्ञान होने के बाद मेरी ज़बान पवित्र हो गई है. संस्कृत की आख़िरी शक्ल में मैं शेर कहता हूं और ये हिन्दी और उर्दू नाम की दो लिपियों में लिखी जा रही है. लेकिन मैं 3000 साल पुरानी संस्कृत नहीं बोलता, मेरी संस्कृत ज़्यादा अपटूडेट, ज़िंदगी के ज़्यादा क़रीब और ज़माने के हिसाब से ज़्यादा बेहतर है. जो कुछ आप बोल रहे हैं, क्या यह सब भाजपा का असर है? "आंसुओं से धुली ख़ुशी की तरह, रिश्ते होते हैं शायरी की तरह, जानता हूं कि एक दिन मुझको, वो बदल देगा डायरी की तरह”. भाजपा ने मुझे इंसान बना दिया. "मैं हर लम्हे में सदियां देखता हूं, तुम्हारे साथ एक लम्हा बहुत है". मैं ही इस समय कालिदास हूं, मैं ही इस समय मीर हूं और मैं ही बशीर बद्र हूं, ये इंसानियत की रोशनी मुझे भाजपा ने दी है. अटल बिहारी वाजपयी की कविताओं के बारे में आपकी क्या राय है? एक बेटा अपने बाप के बारे में जैसी राय रखता है, वही राय मेरी अपने अदबी बाप के बारे में है. अटल जी मेरे अदबी पिता हैं. मैं तो उनकी कविताओं का कायल हूं. उनकी कविताओं को पढ़ कर मुझे एक नई रोशनी मिली है. आपकी पसंद के शायर कौन हैं? बशीर बद्र ! ग़ज़ल को ज़माने के हिसाब से चलना होगा और मेरी ग़ज़लें इस पर पूरी तरह से खरी हैं. यही कारण है कि दूसरों की जगह मुझे अपनी ग़ज़ल ही ज़्यादा पसंद आती है. "ग़ज़लें अब तक शराब पीती थीं, नीम का रस पिला रहे हैं हम". और यह काम इतना आसान नहीं है. शायर के लिए ग़ज़लें लिखना बेहद मुश्किल काम है. कुछ यूं कि "नफ़रत को मुहब्बत का एक शेर सुनाता हूं, मैं लाल पिसी मिर्च पलकों से उठाता हूँ". |
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