|
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
'पवित्तर पापी' अब अँग्रेज़ी में भी
पंजाबी उपन्यास के पितामह माने जाने वाले लेखक नानक सिंह के बहुचर्चित उपन्यास 'पवित्तर पापी' का अँग्रेजी अनुवाद हुआ है. अंग्रेज़ी में इस उपन्यास का नाम है 'सेंटली सिनर' और इसका अनुवाद किया है नवदीप सूरी ने. नवदीप सूरी नानक सिंह के पोते हैं और लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग में राजनयिक हैं. नानक सिंह का जन्म 1897 में हुआ था और उन्होंने बहुत छोटी आयु में लिखना शुरु कर दिया था. उन्होंने 55 से अधिक पंजाबी उपन्यास लिखे और 1962 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. लंदन में 'सेंटली सिनर' का विमोचन जाने-माने फ़िल्म निर्माता-निर्देशक शेखर कपूर ने किया है. इस मौके पर नवदीप सूरी ने बीबीसी हिंदी सेवा से विशेष बातचीत की. उन्होंने कहा, "कुछ साल पहले जब अमरीका में एशियाई मूल के लोगों ने नानक सिंह की जन्म-शताब्दी मनाई तो मुझे नानक सिंह के उपन्यासों को अँग्रेज़ी जानने वाले लोगों तक पहुँचाने की प्रेरणा मिली." 'सेंटली सिनर' 'सेंटली सिनर' एक संवेदनशील युवक केदार के प्रेम की कहानी है.
'पवित्तर पापी' 1942 में लिखी गई थी. नानक सिंह के तमाम उपन्यासों की तरह ये उपन्यास भी तब के सामाजिक और मानवीय रिश्तों और मूल्यों की एक जीवंत तस्वीर खींचता है. इसका हिंदी और कई अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है और इस पर 'पवित्र पापी' नाम की फ़िल्म भी बन चुकी है. नवदीप सूरी ने बीबीसी को बताया कि नानक सिंह की औपचारिक शिक्षा तो केवल पाँचवी कक्षा तक हुई थी लेकिन उन्होंने ख़ुद को अपनी मेहनत से ही शिक्षित किया. उन्होंने 1918 में सिख गुरुओं की 'साखियाँ' लिखीं जिनकी बहुत जल्द एक लाख से ज़्यादा प्रतियाँ बिक गईं. स्वतंत्रता संग्राम नवदीप सूरी ने बीबीसी को बताया, "जब 1919 में जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर ने गोली चलाने का हुक्म दिया तो नानक सिंह अपने चार दोस्तों के साथ वहीं मौजूद थे." गोलियों की बौछार में उनके सभी मित्र मारे गए लेकिन नानक सिंह बच गए. नानक सिंह की लेखनी में राष्ट्रवाद का दौर आया और जलियाँवाला बाग़ पर उन्होंने 'ख़ूनी बैसाखी' शीर्षक से कविता लिखी. इसी दौरान 1922 में भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए उन्हें जेल में कैद कर दिया गया. उन्होंने इस दौर में 'इक मयान दो तलवाराँ' नाम का उनका उपन्यास छपा लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उनके लेख छापने पर प्रतिबंध लगा दिया. नानक सिंह के कई उपन्यास जैसे कि 'चिट्टा लहू' स्कूलों और कॉलेजों में पंजाबी पढ़ने वाले छात्रों को पढ़ाए जाते हैं. नवदीप सूरी का कहना है कि नानक सिंह के अन्य उपन्यासों का भी अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की उनकी योजना है. उनका कहना है कि दशकों पुरानी पंजाबी शब्दावली और संदर्भ का अनुवाद करना मुश्किल काम तो है लेकिन उससे तब के समाज और मूल्यों के बारे में बहुत सारी जानकारी मिलती है. |
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||