|
नृत्य ही मेरा जीवन है- सोनल मानसिंह | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बीबीसी हिंदी.कॉम ने उन महिलाओं से बातचीत का एक सिलसिला शुरु किया है जिन्होंने किसी क्षेत्र में अपनी पहचान क़ायम की है. इस श्रृंखला में हम उनके जीवन-संघर्ष की गाथा उन्ही की ज़ुबानी पेश कर रहे हैं. इस कड़ी में तीसरे व्यक्तित्व के रुप में नृत्यांगना सोनल मानसिंह ने अपने जीवन-संघर्ष की गाथा सूफ़िया शानी से कुछ इस तरह बयान की: मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ शिक्षा और संस्कृति पर गर्व किया जाता था. दादाजी आज़ादी के आन्दोलन में गाँधी जी के साथ थे. आज़ादी के बाद वह गवर्नर बने. माता जी कस्तूरबा के साथ जेल में रहीं. पिताजी ख़ुद पखावज बजाते थे. मुझे बचपन से नृत्य का शौक था, इसीलिए मैं डाँसर बनी. किसी भी क्षेत्र में सफलता का रास्ता आसान नहीं होता. संघर्ष करना होता है. मुश्किल फ़ैसले लेने होते हैं. मैंने भी कठिन फ़ैसले लिए. शादी के बाद मैंने नृत्य के ख़ातिर अपना घर छोड़ा और ख़ानाबदोश की ज़िंदगी अपनाई. मुझे अपने उस फैसले से कई नुकसान उठाने पड़े. राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कई दुश्मन पैदा हो गए. पुरुषों की दुनिया में एक महिला और वह भी एक डाँसर का जीना कोई आसान बात नहीं है. आप जिसके शिकंजे से बचे, उसी व्यक्ति ने आपको नज़रअंदाज़ करना शुरु कर दिया. लेकिन मेरा लक्ष्य नृत्य था. मैं पूरे तन-मन से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती गई. मेरा कला निखरती गई, मुझे लोगों का प्यार मिलता गया. लेकिन जीवन सीधी लकीर नहीं होता. उतार-चढ़ाव आते ही हैं. उतार-चढ़ाव अपनी कला के शिखर पर पहुंचने के बाद यानि 1974 में मुझे एक ज़बरदस्त सड़क दुर्घटना से दो-चार होना पड़ा. यह वक्त़ वह था जब भरतनाट्यम् में महारत हासिल करने के बाद मैंने ओडिसी नृत्य सीखना शुरू किया था. उन दिनों मैं जर्मनी में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रशिक्षण दे रही थी. कार हादसे में मेरी चार पसलियाँ और गले की हड्डी टूट गई थी. एक बार तो लगने लगा था कि अब मैं मंच पर कभी पाँव नहीं रख पाउंगी लेकिन चंद मित्र डॉक्टरों की मेहनत और मेरी इच्छाशक्ति ने मुझे एक बार फिर अपनी कला के क़रीब ला दिया और मैं एक बार फिर अपने प्रशंसकों के बीच पहुँच गई. मैं अपनी सफलता का क्रेडिट माँ जगदम्बा के बाद अपने परिवार को देती हूँ क्योंकि अगर परिवार से प्रोत्साहन नहीं मिलता, तो यह मुक़ाम पाना असंभव था. मैं नृत्यांगना हूँ, यह कहना काफी नहीं होगा क्योंकि नृत्य ही मेरा जीवन है. मुझे और नृत्य को अलग किया ही नहीं जा सकता. मेरा मानना है कि नृत्य भी अपने आस-पास की घटनाओं से प्रभावित होता है इसीलिए मैंने भरतनाट्यम् और ओडिसी के बुनियादी उसूलों के दायरे में रहकर कई प्रयोग किए हैं और यह प्रयोग आगे भी जारी रहेंगे. मैं उस घटना को कभी नहीं भूल पाती, जब मुझे तिहाड़ जेल के क़ैदियों के साथ काम करने का मौका मिला. क़ैदी मुझे "गुरूजी" कहते थे. जेल अधिकारियों को अंदेशा था कि जेल के बाहर कार्यक्रम रखने पर क़ैदी मौक़े का फ़ायदा उठाकर फ़रार होने की कोशिश करेंगे. लेकिन जब यह बात मैंने अपनी टीम के क़ैदियों से की तो उनकी आँखों में आँसू थे. उन्होंने मुझसे वादा किया कि ऐसा नहीं होगा और उन्होंने अपना वादा निभाया. उस कार्यक्रम में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मुख्य अतिथि थे. उन्होंने कार्यक्रम के बाद व्यंग्य के अंदाज़ में कहा था, "कहा तो यह गया था कि क़ैदी नृत्य करेंगे". जब उन्हें बताया गया कि नृत्य करने वाले क़ैदी ही थे, तो उन्हें बेहद आश्चर्य हुआ. मैं पिछले तीस सालों से अपनी कला नई नस्ल में बाँट रही हूँ. गाँवों में, छोटे शहरों में प्रोग्राम पेश करके और अपना स्कूल चला कर. जैसा कि मैं बता चुकी हूँ कि मेरे लिए नृत्य ही जीवन है, तो जब तक जीवन है यह सिलसिला जारी रहेगा. परिचय गुजरात में जन्मी और गुजरात में ही शिक्षित सोनल मानसिंह ने पहले भरतनाट्यम में और बाद में ओडिसी नृत्य में महारत हासिल की. पिछले पैंतालिस वर्षों में, वह देश और दुनिया के लगभग हर अहम देश में अपनी कला से लोगों का मन मोह चुकी हैं. सोनल को नृत्यांगनाओं के बीच "चिंतक" माना जाता है. 1992 में पद्म भूषण से सम्मानित सोनल मानसिंह पिछले वर्ष पद्म विभूषण सम्मान पाने वाली भारत की पहली महिला नर्तकी का दर्जा हासिल कर चुकी हैं. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||