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गुरुवार, 22 मई, 2008 को 13:15 GMT तक के समाचार
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अनाज आयात एक खरब डॉलर का
गेहूँ की फ़सल
कुछ फ़सलों पर भी असर पड़ा है
संयुक्त राष्ट्र की एक अहम रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों की वजह से अनेक देशों के आयात बजट बढ़ रहे हैं और वर्ष 2008 में खाद्य पदार्थों के आयात के लिए एक खरब डॉलर यानी क़रीब 528 अरब ब्रिटिश पाउंड रखा गया है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एएफ़ओ) की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों की वजह से देशों के बजट में इज़ाफ़ा करना पड़ रहा और वर्ष 2007 के मुक़ाबले इसमें 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होने की संभावना है.

रिपोर्ट कहती है कि इस स्थिति का एक अन्य पहलू ये भी है कि पहले से ही संवेदनशील परिस्थितियों का सामना कर रहे कुछ देशों पर इस महंगाई का ज़्यादा असर पड़ेगा और उनकी बजट बढ़ोत्तरी लगभग 40 प्रतिशत रहने की संभावना है, दूसरी तरफ़ विकसित देशों का आयात बजट बढ़ेगा तो सही लेकिन इस हद तक नहीं.

विश्व खाद्य और कृषि संगठन की इस रिपोर्ट में कहा गया है, "पिछले कुछ सप्ताहों में चावल की महंगाई सुर्ख़ियों में रही है लेकिन दुग्ध उत्पादनों से लेकर गेहूँ तक, सोयाबीन से लेकर चीनी तक सभी चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं और बाज़ार की हालत ऐसी हो गई है जिसके बारे में किसी ने अंदाज़ा भी नहीं लगाया था."

"खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों की वजह से गंभीर परेशानियाँ हो रही हैं, ख़ासतौर से उन लोगों को जिन्हें खाने-पीने की चीज़ों पर अपनी आमदनी का ख़ासा बड़ा हिस्सा ख़र्च करना पड़ता है."

कम आयात

विश्व खाद्य और कृषि संगठन ने कहा है कि हाल के दिनों में कुछ ऐसे संकेत मिले हैं कि खाने-पीने की कुछ चीज़ों के दाम नीचे आ रहे हैं और आने वाले कुछ दिनों में क़ीमतें कुछ और कम होने का अनुमान है लेकिन यह भी कहा गया है कि क़ीमतें पिछले वर्षों के स्तर पर पहुँचने की उम्मीद नहीं की जा रही है.

रिपोर्ट कहती है कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि खाने-पीने की चीज़ें तैयार करने में आने वाली लागत बढ़ रही है और उसकी एक प्रमुख वजह तेल और ईंधन का महंगा होना भी है.

धान की फ़सल
चावल की क़ीमतें भी काफ़ी बढ़ी हैं

ख़ाली हो गए भंडारों को फिर से भरना, उपभोक्ता माँग में बढ़ोत्तरी होना कुछ ऐसी वजहें हैं जिनसे माँग ऊँची रहने की संभावना है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य पदार्थों की बढ़ती क़ीमतों की वजह ये रही है कि कुछ देशों में निर्यात करने के लिए खाद्य पदार्थों की कमी रही है. इस स्थिति में पहले से मौजूद भंडारों का इस्तेमाल कर लिया गया है और नई फ़सलें भी उस कमी को पूरा नहीं कर पाई हैं.

संगठन ने कहा है कि ऐसे हालात में किसानों ने ख़ासतौर से गेहूँ की फ़सल बड़े उत्साह के साथ उगाई है क्योंकि उन्हें अच्छे दाम मिलने की उम्मीद है और इसी वजह से वर्ष 2008 में फ़सल उत्पादन अच्छा रहने की उम्मीद जताई गई है.

इन कारणों की वजह से हाल के कुछ सप्ताहों में क़ीमतें कुछ नीचे आई हैं लेकिन संगठन ने आगाह भी किया है कि अगर फ़सल उत्पादन में कुछ कमी हुई तो बाज़ार में फिर से अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो सकती है.

संगठन ने अनुमान व्यक्त किया है कि चावल के दामों में कुछ कमी आ सकती है, बशर्ते कि कुछ देशों को भारी फ़सलों की स्थिति में लगाए गए प्रतिबंध हटाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए.

ग़ौरतलब है कि कुछ देशों में फ़सल उत्पादन में ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ोत्तरी को रोकने के लिए फ़सल उत्पादन पर ही प्रतिबंध लगाए गए हैं जिससे फ़सलों की एक निश्चित मात्रा बनाए रखी जा सके और अनाज इतना ना पैदा हो जाए कि उसे नष्ट करने की नौबत आ जाए या फिर उसकी वजह से खाद्य पदार्थों की क़ीमतें इतनी नीचे गिर जाएँ कि लागत भी वसूल ना हो सके.

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