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महंगाई से लड़ने की कमज़ोर कोशिश | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 31 मार्च, 2008 को लिए गए फ़ैसले में खाने के कच्चे तेलों पर से आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिया है और खाने के रिफ़ाइंड तेलों के आयात पर शुल्क को घटाकर 7.5 प्रतिशत कर दिया है. मक्खन और घी पर लगा आयात शुल्क 40 फ़ीसदी से घटाकर तीस फ़ीसदी कर दिया गया है. पर मसला सिर्फ़ मक्खन घी और खाने के तेलों का नहीं है. उदाहरण के तौर पर मसूर की दाल के थोक भाव पिछले साल में 28.46 प्रतिशत बढ़ गए हैं. अरहर की दाल के थोक भाव एक साल में 16.10 प्रतिशत बढ़ गए हैं. आलू के थोक भाव एक साल में क़रीब 24.48 प्रतिशत बढ़ गए हैं. मूंगफली के तेल के भाव एक साल में क़रीब 10.49 प्रतिशत बढ़ गए हैं. असली तस्वीर इनके भावों में बढ़ोत्तरी का मतलब है कि सीमित आय वर्ग वाले की वास्तविक आय में कमी. वेतन में से जो हिस्सा खाने पीने की चीज़ों में जा रहा था, उसमें और बढ़ोत्तरी के आसार हैं. महंगाई की बढ़ोत्तरी का 6.68 फीसदी का आंकड़ा पूरी तस्वीर सामने नहीं रखता. इन खाने पीने की चीजों के भाव बताते हैं कि महंगाई की मार कहाँ और किस वर्ग पर पड़ रही है.
आलू के भावों में तेज़ी की रफ़्तार सेंसेक्स से आगे निकल गई है. बल्कि सेंसेक्स तो गिरावट की स्थिति में है, पर यह बात आलू के बारे में नहीं कही जा सकती है. और कमोडिटी एक्सचेंजों की कृपा से आलू भी निवेश का आइटम बना हुआ है. हाल के क़दमो के बेअसर होने की आशंका इसलिए है क्योंकि दालों और सब्जियों के भावों पर किसी भी किस्म का नियंत्रण करने में केंद्र या राज्य सरकारें असमर्थ रही हैं. खुले बाजार में किसी भी चीज़ की क़ीमत उसकी डिमांड और सप्लाई से तय होती है. अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में जब भी भारतीय अर्थव्यवस्था से इस तरह की ख़बरें आती हैं, तो भारत को खाने का कच्चा तेल बेचने वाले, रिफ़ाइंड तेल बेचने वाले अपने भाव बढ़ा लेते हैं. यानी आयात शुल्क में जो कटौती होती है, उसका फायदा यहाँ के उपभोक्ताओं को नहीं पहुँचता. माल बेचने पर दूसरे देशों के निर्यातक क़ीमत बढ़ा लेते हैं, उस क़ीमत पर घटा हुआ आयात शुल्क भी उपभोक्ताओं तक सस्ते आइटम पहुँचाने में विफल रहता है. इस समस्या का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से की ख़रीद क्षमता बहुत कमज़ोर है. कमज़ोर पर असर
मोटे तौर पर माना जा सकता है कि अर्थव्यवस्था में क़रीब चौरासी करोड़ लोग ऐसे हैं जो रोज़ बीस रुपये रोज़ पर बसर करते हैं. सेंसेक्स के उछलने का फ़ायदा इन तक नहीं पहुँचता. पर आलू के भाव और सरसों के तेल उछलने की चोट इन तक ज़रुर पहुँचती है. हाल तक की सेंसेक्स बूम में जिन्होने लाखों करोड़ों कमा लिये हैं उन्हें आलू या सरसों के तेल के कुछ ज़्यादा भाव देना नहीं अखरेगा लेकिन जिसकी दस दिन की कमाई ही दो सौ रुपये होगी उन्हे तो फ़र्क पड़ता है. इसका एक दौर में इलाज होता था राशन की दुकान, जो अपनी कुव्यवस्था में भी थोड़ी बहुत राहत देने का काम करती थी. जैसा भी सही, सस्ता गेहूँ वहाँ मिलता था. जैसे भी सही, घटिया चावल वहाँ मिलते थे. पर सार्वजनिक वितरण व्यवस्था अब ध्वस्त हो चुकी है. महंगाई से किसी क़िस्म की संस्थागत निजात अब तक समाज के कमज़ोर वर्ग को नहीं है. सार्वजनिक वितरण व्यवस्था इस मसले का एक इलाज है. लेकिन सार्वजनिक वितरण व्यवस्था किसी भी सरकार की चिंता का विषय नहीं है. |
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