|
'सैस से आख़िरकार महंगाई बढ़ेगी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वित्तमंत्री ने इस बार बहुत होशियार से सैस के उस्तरे से करदाता की हजामत का इंतज़ाम किया है. भले ही वह कहें कि एक्साइज और सर्विस टैक्स में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है. पर सच यह है कि एजुकेशन सैस में एक प्रतिशत की बढ़ोत्तरी का असर फ़ोन के बिल के समेत तमाम सेवाओँ की बढ़ोत्तरी की शक्ल में आएगा. सैस हर टैक्स पर चिपकता है. वित्तमंत्री को अगर शिक्षा की इतनी चिंता थी, तो वह इसका इंतज़ाम बजट की आय से कर सकते थे, पर नहीं उन्होने शिक्षा को सैस के सहारे डाल दिया है. इसके चलते महंगाई के पिछले रास्ते से आने की आशंकाएँ हो गई हैं. सर्विस टैक्स में एजुकेशन सैस जुड़कर लोगों की परेशानियां बढ़ाएगा. वैसे इस स्थिति का अंदाज पहले ही था. सर्विस टैक्स सर्विस टैक्स के रुप में वित्त मंत्री को एक दुधारु गाय मिल गई है. जिसे जमकर दुहा जा सकता है. बजट 2007-08 ने भी यही किया है. सर्विस टैक्स को सरकार दुधारु गाय नहीं पूरी डेरी मानकर चल रही है, इस बात का अंदाज़ एक दिन पहले आर्थिक सर्वेक्षण से मिल गया था. आर्थिक सर्वैक्षण के पेज नंबर 25 पर दर्ज है कि '1994-95 से शुरु किये गये सेवा कर का दायरा धीमे-धीमे बढ़ाया गया. ...... यह राजस्व का उत्साहवर्धक स्त्रोत रहा है.' 1994-95 में तीन सेवाओं पर कर लगाया गया. 1996-97 में इनकी संख्या छह तक लाई गई फिर 2006-07 में इन्हे 99 कर दिया गया. पहले यह कर आठ प्रतिशत था, फिर दस प्रतिशत हुआ और फिर 12 प्रतिशत हुआ. 2005-06 में इस मद से 23,055 करोड़ रुपये वसूले गए थे. अनुमान के मुताबिक़ 2006-07 में यह वसूली 34,500 करोड़ रुपए की है. यानी एक साल में क़रीब पचास प्रतिशत की बढ़ोत्तरी. ऐसी बढ़ोत्तरी वाले क्षेत्र को वित्त मंत्री आसानी से छोड़ देंगे, ऐसी उम्मीद किसी को नहीं थी. आर्थिक सर्वैक्षण ने यह साफ संकेत दिया था कि सर्विस क्षेत्र से वसूली को ज़ोर-शोर से जारी रखा जायेगा. अब इसके परिणाम पूरे साल सामने आयेंगे. कई सेवाओं के बढ़े हुए कर अंतत उपभोक्ताओं की जेब से ही जायेंगे. उम्मीद यह की जा रही थी कि महंगाई की ऐसी मार के दौर में सर्विस टैक्स के मामले में कुछ राहत देंगे. लोग सब्जी, अनाज की महंगाई से जूझ रहे हैं और उस मोर्चे पर कोई बड़ी राहत देना सरकार के हाथ में नहीं था. सरकार रातों-रात प्याज़ या अरहर या उड़द को नहीं पैदा कर सकती थी. पर सरकार इतना तो कर सकती थी कि आम इस्तेमाल की सेवाओं पर सर्विस टैक्स को कम कर देती या ख़त्म कर देती. आम आदमी ब्रोकर सेवाओं पर सर्विस टैक्स समझ में आता है. ब्रोकर के ज़रिये निवेश करने वाला व्यक्ति एक न्यूनतम आर्थिक स्तर रखता है.
पर फ़ोन की सेवाओं को प्रयोग करने वाले सारे व्यक्ति साधन संपन्न व्यक्ति नहीं हैं. इसे कर से मुक्त रखकर महंगाई से परेशान लोगों को कुछ राहत दी जा सकती थी. सरकार रोज़मर्रा की चीजों की एक्साइज़ में कमी करके कुछ राहत दे सकती थी, पर वित्तमंत्री ने ऐसा नहीं किया. कुत्ते-बिल्लियों के इंपोर्टेड फ़ूड पर इंपोर्ट ड्यूटी कम हुई है. हीरों पर कस्टम ड्यूटी कम हुई है. इन पर कम ना भी होती, तो ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ता. जहाँ आदमियों की दाल-रोटी महंगी हो रही हो, वहाँ कुत्तों के इंपोर्टेड खाने का सस्ता होना बहुत खऱाब लगता है. कुल मिलाकर यह बजट महंगाई से कोई राहत नहीं देता, उलटे सैस के परिणामस्वरुप और अधिक महंगाई सामने आयेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें शेयर बाज़ारों में दूसरे दिन भी हड़बड़ी28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार महँगाई के इर्द गिर्द घूमा आम बजट28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार बजट से यूपीए के सहयोगी भी नाख़ुश28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार बाज़ार को नहीं भाया बजट, सेंसेक्स लुढका28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार रक्षा बजट में फिर बड़ी बढ़ोत्तरी28 फ़रवरी, 2007 | कारोबार सर्वेक्षण में उत्साह के साथ चेतावनी भी27 फ़रवरी, 2007 | कारोबार भारतीय अर्थव्यवस्था: एक नज़र24 फ़रवरी, 2007 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||