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शनिवार, 24 फ़रवरी, 2007 को 16:49 GMT तक के समाचार
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भारतीय अर्थव्यवस्था: एक नज़र

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी देश की अहमियत उसकी आर्थिक शक्ति के बल पर आँकी जाती रही है. सो इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि तेज़ी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था का ज़िक्र इन दिनों हर बड़े मंच पर होता है.

मुद्रास्फ़ीति दर के ये आँकड़े ग्राफ़ में दिखाई तिथि को ख़त्म हुए सप्ताह के आँकड़ें हैं.

आँकड़ों पर नज़र दौड़ाएँ, तो ये भारतीय अर्थव्यवस्था की सफलता की कहानी ख़ुद ब ख़ुद बयां करते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2006-07 के दौरान आर्थिक विकास दर 9.2 फ़ीसदी रहने की संभावना है.

ऐसा नहीं है कि विकास दर का ये बेहतरीन आँकड़ा सिर्फ़ इसी वित्त वर्ष में हासिल किया गया है. भारत में पिछले तीन सालों से आर्थिक वृद्धि की दर आठ फ़ीसदी से ज़्यादा ही रही है.

वित्त मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक जनवरी 2007 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 173 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है और अप्रैल-दिसंबर 2006 के बीच निर्यात में 36.25 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

और शेयर बाजा़र का सूचकांक भी अर्थव्यवस्था की ही तरह लगातार बढ़ रहा है-अगर समय-समय पर बाज़ार में होने वाले सुधार या करेक्शन को छोड़ दें.

पिछले वर्ष बजट से पहले बीएसई के सूचकांक ने छह फ़रवरी 2006 को 10 हज़ार छुआ था वहीं इस वर्ष बजट से पहले ये साढ़े चौदह हज़ार छू चुका है. विश्लेषक अब 15 हज़ार के इंतज़ार में है.

महँगाई की मार

अर्थव्वयस्था से जुड़े कुछ तथ्य
विकास दर 9.2 रहने की उम्मीद
महँगाई दो साल के शीर्ष स्तर पर पहुँची( 6.73-तीन फ़रवरी 2007)
शेयर बाज़ार ने 14 हज़ार का आँकड़ा पार किया(दिसंबर 2006)

लेकिन एक सच ये भी है कि गाँव-कस्बों में रहने वाले आम आदमी के लिए शायद सूचकांक और आर्थिक आँकड़ों के तामझाम से परे ये बात ज़्यादा अहम है कि उसकी रोज़मर्रा की ज़रूरत वाली चीज़ें, दाल-रोटी और सब्ज़ी के दाम किस ओर जा रहे हैं.

पिछले कुछ महीनों के मुद्रास्फ़ीति दर के आँकड़ें जो तस्वीर पेश करते हैं वो निराशाजनक ही है. इस वर्ष तीन फ़रवरी को ख़त्म हुए सप्ताह को मुद्रस्फ़ीति की दर 6.73 पहुँच गई थी जो पिछले दो वर्षो में सबसे ज़्यादा है.

आर्थिक सर्वेक्षण में वित्र मंत्री ने स्वंय स्वीकार किया है कि बढ़ती महँगाई पर तुरंत रोक लगा पाना संभव नहीं है

दरअसल कई विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थव्यवस्था बहुत तेज़ी से बढ़ रही है और साथ ही महँगई भी यानी ‘ अर्थव्यवस्था की ओवरहीटिंग’ हो रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक तेज़ी से हो रहे आर्थिक विकास और कुछ वर्गों की बढ़ती आमदनी के चलते बाज़ार में माँग बढ़ी है जिससे महँगाई बढ़ने की आशंका बनी रहती है.

विकास की गति

निर्माण
औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में विकास के लिए बेहतर आधारभूत ढाँचे का होना ज़रूरी है

भारतीय उद्योग संघ फ़िक्की के सलाहकार विवेक भारती कहते हैं कि अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या नौ फ़ीसदी की विकास दर को भारत बरकरार रख पाएगा.

विवेक भारती कहते हैं," इस समय जो आर्थिक गति है वो पहले कभी नहीं रही लेकिन साथ ही सीमेंट, स्टील और कृषि उप्पाद जैसी चीज़ों की सप्लाई पर बेहद दबाव है और इसके लिए निवेश की आवश्यकता है."

 अर्थव्यवस्था के लिहाज़ से सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या नौ फ़ीसदी की विकास दर को आगे भी भारत बरकरार रख पाएगा. इस समय जो आर्थिक गति है वो पहले कभी नहीं रही लेकिन साथ ही सीमेंट, स्टील जैसी मूलभूत चीज़ों और कृषि उत्पादों की सप्लाई पर बेहद दबाव बन गया है
विवेक भारती

ज़ाहिर है विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने और औद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त आधारभूत ढाँचे का होना ज़रूरी है- ऐसी मूलभूत सुविधाएँ जिनकी गुणवत्ता अच्छी हो और कीमत भी कम.

वरना भारत विदेशी निवेश की दौड़ में ऐसे प्रतियोगियों से पिछड़ सकता है जो भारत से बेहतर सुविधाएँ प्रदान करते हैं.

वैसे विदेशी निवेश के मामले में भारत का प्रदर्शन पहले से काफ़ी अच्छा रहा है. पिछले दो वर्षों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में करीब-करीब 100 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है. नवंबर 2006 तक एफ़डीआई सात अरब डॉलर का आँकड़ा छू चुका है.

विदेशी निवेश के साथ-साथ देश में हो रहे औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में विकास के लिए भी मूलभूत सुविधाओं का होना ज़रूरी है. वित्त मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक 2006-07 में उद्योग क्षेत्र में 10 फ़ीसदी की दर से विकास हुआ है तो सेवा क्षेत्र में 11.2 की दर से.

वहीं सूचना तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत की मिली बढ़त को बरकरार रखने के लिए भारत में हुनरमंद और प्रशीक्षित लोगों की लगातार सप्लाई भी काफ़ी अहम है.

विवेक भारती कहते हैं कि आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी समीकरणों में शिक्षा और स्वास्थ्य को भी स्थान मिलना चाहिए.

सो यहाँ भारत के लिए चुनौती दोहरी है -आर्थिक विकास की तेज़ रफ़्तार बनाए रखना और ये सुनिश्चित करना कि इसका फल समाज के हर वर्ग तक पहुँचे.

समान विकास

विशेषज्ञों का मानना है कि विकास का फ़ायदा शहरों में ही गाँवों को भी पहुँचना चाहिए

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये सुनिश्चित करना है कि आर्थिक विकास का लाभ ग्रामीणों तक भी पहुँचे, तो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कृषि क्षेत्र को मज़बूत करना होगा.लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र के नतीजे निराशाजनक रहे हैं. आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2006-2007 में कृषि क्षेत्र में केवल 2.7 रहने की उम्मीद है.

कृषि में विकास इसलिए अहम बन जाता है क्योंकि एक तो आज भी 60 फ़ीसदी जनसंख्या खेती-बाड़ी पर निर्भर है और दूसरा ये कि कृषि क्षेत्र में विकास के बगैर नौ फ़ीसदी की विकास दर को बरकरार रखना मुश्किल साबित हो सकता है.

 अर्थव्यवस्था से जुड़ी समस्याओं का निदान एक दिन में नहीं हो सकता. इसके लिए नीति, निवेश, आधारभूत ढाँचे और सही रणनीति की ज़रूरत है
विवेक भारती

यानी जहाँ एक ओर ज़रूरत इस बात की है कि भारत कृषि जैसे पारंपरिक क्षेत्रों को नज़रअंदाज़ न करे और गाँवों-कस्बों को भी विकास यात्रा का हिस्सा बनाए.

वहीं ये भी ज़रूरी है कि सेवा और सूचना तकनीक जैसे क्षेत्र जिनमें भारत को पहले से बढ़त हासिल है, उनमें विकास बदस्तूर जारी रहे- आधारभूत ढाँचे,निवेश, प्रशिक्षण और सही आर्थिक नीतियों के स्तर पर.

अर्थव्यवस्था से जुड़ी समस्याओं के बारे में अर्थशास्त्री विवेक भारती कहते हैं कि इनका निदान एक दिन में नहीं हो सकता और इसके लिए दीर्घकालिक नीति, निवेश, आधारभूत ढाँचे और सही रणनीति की ज़रूरत है.

अर्थव्यवस्था में तेज़ी
भारतीय अर्थव्यवस्था उम्मीद से कहीं तेज़ वृद्धि दर के साथ बढ़ रही है.
रुपयाभारतीय अर्थव्यवस्था
भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र.
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