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आर्थिक विकास की होड़ में भारत | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारतीय अर्थव्यवस्था में एक गर्मी सी महसूस की जा सकती है. वर्ष 2006-7 में सकल घरेलू उत्पाद में 9.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, पिछले तीन वर्षों से भारत में आर्थिक वृद्धि की दर आठ प्रतिशत से ऊपर रही है. पिछले एक वर्ष में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में काफ़ी तेज़ी आई है. भारत के वाणिज्य मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष में पूंजी निवेश 12 अरब डॉलर रहा है. यह पहला वर्ष है जब भारत में प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश संस्थागत पोर्टफ़ोलियो निवेश से ऊपर निकल गया है. अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लगातार चर्चा हो रही है कि भारत ने भी अब चीनी रफ़्तार पकड़ ली है. चीन से तुलना चीन से भारत की लगातार तुलना हो रही है और यह तुलना मुझे काफ़ी दिलचस्प लगी क्योंकि मैं दिसंबर महीने में चीन से होकर सीधे भारत पहुँचा.
चीन में आर्थिक वृद्धि का ज़ोर इतना है कि उसे साबित करने के लिए किसी आँकड़े की ज़रूरत नहीं रह गई है. चीन के हिसाब से मामूली और छोटा एयरपोर्ट है ज़ियामेन लेकिन वह बिल्कुल अंतरराष्ट्रीय स्तर का है, मुंबई और दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे काफ़ी बड़ा और बेहतर सुविधाओं से लैस. चीन से सीधे भारत आने पर दोनों देशों के बीच का अंतर साफ़ पता चलता है. भारत में ग़रीबी ज़्यादा दिखती है और सुविधाओं का अभाव अधिक चुभता है. लेकिन इतना ज़रूर पता चलता है कि भारत उपभोग के मामले में पूरे जोश में है, हालत ये हो गई है कि भारत के 'मैटेरियलिज़्म' से बचने के लिए आपको यूरोप या अमरीका का रूख़ करना पड़ सकता है. बैंकों में लोगों का मेला लगा है जो जानना चाहते हैं कि उन्हें अपना पैसा कहाँ लगाना चाहिए, कर्ज़ लेने वालों की भी रेलमपेल है. कारों के शोरूम में भारी भीड़ है, शोरूम के एजेंट बेहाल हैं और ग्राहक अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं. यह बेचैनी सभी आँकड़ों में भी साफ़ दिखाई देती है. तरक़्की भारत की औद्योगिक विकास दर 14 प्रतिशत तक जा पहुँची है जो 1996 से अब तक सबसे ऊँची है.
भारत में अब तक आर्थिक वृद्धि की असली वजह सर्विस सेक्टर था लेकिन अब औद्योगिक क्षेत्र में आ रहे उठान से नई उम्मीद जगी है. देश बहुत निचले स्तर से औद्योगिक विकास की दिशा में जा रहा है इसलिए विकास की अपार संभावनाएँ हैं, सबसे बड़ी बात है कि इससे नए रोज़गार पैदा होने की भरपूर गुंजाइश है. देश के सरकारी खज़ाने की हालत भी काफ़ी अच्छी है. ऐसा लग रहा है कि अगर भारत 9 से 11 प्रतिशत के बीच की वृद्धि दर को बनाए रखे तो वाक़ई उसका मुक़ाबला चीन से किया उचित होगा. लेकिन यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि अर्थव्यवस्था की होड़ क्रिकेट या लड़ाई की तरह नहीं है, यानी आपके प्रतिद्वंद्वी का नुक़सान सीधे-सीधे आपके फ़ायदे-नुक़सान से नहीं जुड़ा है. बल्कि इसका ठीक उलटा भी हो सकता है, एक देश की अर्थव्यवस्था अगर गड़बड़ चल रही हो तो उसका बुरा असर ही देश पर पड़ता है, भारत और चीन की तरक़्की दोनों के लिए परस्पर लाभ का कारण बनेगी. लेकिन यहाँ ख़तरे की घंटी को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक हो सकता है, भारत में आर्थिक असमानता बहुत बुरी तरह से बढ़ रही है जो कि राजनीतिक-सामाजिक अस्थिरता का कारण बन सकती है. जिस तेज़ी से आर्थिक विकास हो रहा है उसी तेज़ी से इस दिशा में भी काम करना होगा कि अंतर को पाटा जा सके, आर्थिक विकास कोई चुनौती नहीं है असली चुनौती है उसका लाभ एक बड़े वर्ग तक पहुँचाने की. | इससे जुड़ी ख़बरें नूई बनीं अब पेप्सीको की अध्यक्ष06 फ़रवरी, 2007 | कारोबार शेयरों में निवेश पर लगाम लगाएगा चीन06 फ़रवरी, 2007 | कारोबार 'मँहगाई घटाना सरकार की प्राथमिकता'03 फ़रवरी, 2007 | कारोबार मँहगाई पर लगाम कसने की कोशिश31 जनवरी, 2007 | कारोबार अधिग्रहण का फ़ायदा होगा: रतन टाटा31 जनवरी, 2007 | कारोबार कोरस का सौदा टाटा के पक्ष में30 जनवरी, 2007 | कारोबार 'व्यापार वार्ता शुरू होनी चाहिए' 27 जनवरी, 2007 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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