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बुधवार, 31 जनवरी, 2007 को 13:03 GMT तक के समाचार
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कोरस का सौदा टाटा के पक्ष में
टाटा
कोरस की नीलामी पर दुनिया के उद्योग जगत निगाहें लगी हुई थीं
भारत की टाटा स्टील कंपनी ने यूरोपीय स्टील कंपनी कोरस के अधिग्रहण के लिए सबसे बड़ी बोली लगाई है और ब्राज़ील की कंपनी सीएसएन को पछाड़ दिया है. इस तरह उसके कोरस के अधिग्रहण का रास्ता साफ़ हो गया है.

ब्रिटेन में अधिग्रहण पैनल का कहना था कि टाटा ने प्रति शेयर 608 पेंस की पेशकश कर कोरस की कीमत 11.3 अरब डॉलर लगाई और ब्राज़ील की कंपनी सीएसएन को पछाड़ दिया.

ब्राज़ील की कंपनी सीएसएन टाटा को इस नीलामी में पिछले कुछ महीनों से कड़ी टक्कर दे रही थी. सीएसएन की अधिकतम बोली 603 पेंस प्रति शेयर थी.

इस अधिग्रहण से संबंधित सारी औपचारिकताएँ पूरी होने के बाद टाटा दुनिया का पाँचवाँ सबसे बड़ा स्टील निर्माता बन जाएगा. कोरस के दुनिया भर में लगभग 47 हज़ार कर्मचारी हैं जिनमें से 24 हज़ार ब्रिटेन में हैं.

 यह भारत की आर्थिक ताकत का एक उदाहरण है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रति विश्वास क़ायम हुआ है और यह एक जीत है
अमित मित्रा, महासचिव- फ़िक्की

लंबी चली कोरस अधिग्रहण की लड़ाई में दोनों पक्षों के पास किसी समझौते पर पहुंचने के लिए 30 जनवरी तक का समय था. ऐसा न होने की स्थिति में कोरस का अधिग्रहण उसे मिलना था जो इसकी सबसे बड़ी बोली लगाता.

अहम पहलू

इस नीलामी पर ब्रिटेन, भारत और ब्राज़ील के कई उद्योगपतियों की निगाहें लगी हुई थीं क्योंकि इस सौदे में कई और कंपनियों का भविष्य दांव पर लगा हुआ था.

ब्रिटेन में भारतीय मूल के उद्योगपति लॉर्ड स्वराज पॉल ने इस सौदे को काफ़ी महत्वपूर्ण बताया है और कहा है कि इससे दोनों ही कंपनियों को फ़ायदा होगा.

लॉर्ड स्वराज पॉल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "मेरे ख़याल में तो बहुत अच्छा सौदा है क्योंकि कोरस यूरोप की एक मज़बूत कंपनी है. टाटा भी एक बहुत प्रतिष्ठित कंपनी है. तो दोनों के मिलने से काफ़ी फ़ायदा होगा. कोरस के पास तो तकनीक है उससे टाटा को मदद मिलेगी और टाटा की मज़बूती से कोरस को भी मदद मिलेगी."

शेयर बाज़ार में टाटा के शेयरों पर इस सौदे का असर पड़ा है तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि टाटा ने कोरस को ज़्यादा क़ीमत दे दी है, इस पर स्वराज पाल का कहना था कि इस तरह के सौदे बाज़ार क़ीमतों के आधार पर ही होते हैं.

"यह ख़रीददार कंपनी पर निर्भर है कि उसके लिए कोई सौदा कितने नुक़सान और फ़ायदे का है. इस तरह की प्रतिक्रिया इस तरह के बड़े सौदों में एक सामान्य घटना होती है और कहीं कुछ आशंका भी देखी जाती है कि कहीं ज़्यादा क़ीमत तो नहीं दे दी गई है."

टाटा की इस सफलता पर टिप्पणी करते हुए भारतीय औद्योगिक जगत के संगठन फ़िक्की के महासचिव अमित मित्रा ने कहा, "यह भारत की आर्थिक ताकत का एक उदाहरण है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के प्रति विश्वास क़ायम हुआ है और यह एक जीत है."

उन्होंने कहा कि जल्द ही भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है और यह समझौता इसकी एक झलक है.

 पहली बात तो यह है कि इससे उन्हें यूरोप के बाज़ार में प्रवेश मिलेगा. दूसरा यह कि टाटा के पास कम लागत पर स्टील तैयार करने की कला है. अगर उन्हें यूरोप के बाज़ार में प्राइज़िंग मिल जाती है तो इसका लाभ कोरस और टाटा दोनों के ही शेयरधारकों को होगा
आलोक पुराणिक, अर्थशास्त्री

भारत में आर्थिक मामलों के जानकार आलोक पुराणिक ने टाटा के नीलामी जीतने को एक सकारात्मक उपलब्धि बताया.

उन्होंने कहा, "पहली बात तो यह है कि इससे उन्हें यूरोप के बाज़ार में प्रवेश मिलेगा. दूसरा यह कि टाटा के पास कम लागत पर स्टील तैयार करने की कला है. अगर उन्हें यूरोप के बाज़ार में प्राइज़िंग मिल जाती है तो इसका लाभ कोरस और टाटा दोनों के ही शेयरधारकों को होगा."

इससे पहले टाटा ने कोरस की कीमत प्रति शेयर 500 पेंस और सीएसएन ने प्रति शेयर 515 पेंस लगाई थी और दोनों का कहना था कि ये सही क़ीमत है.

दोनों कंपनियों ने नौकरियों में कटौती नहीं करने का आश्वासन भी दिया था लेकिन जानकार मानते हैं कि ऐसा संभव नहीं है.

उधर ब्रितानी अख़बार इंडिपेंडेट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया है कि सीएसएन की तुलना में टाटा जल्दी नौकरियों में कटौती करेगा क्योंकि उसके निर्यात लक्ष्य 2008 के हैं.

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