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बुधवार, 31 जनवरी, 2007 को 09:58 GMT तक के समाचार
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मँहगाई पर लगाम कसने की कोशिश
रिजर्व बैंक
रेपो रेट बढ़ने से खुले बाज़ार में नकदी का प्रसार कम हो सकता है
रिजर्व बैंक ने मँहगाई पर रोक लगाने के मक़सद से छोटी अवधि के लिए बैंकों को दी जाने वाली उधारी पर ब्याज़ दर बढ़ाने की घोषणा की है.

चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही की मौद्रिक और कर्ज नीति की समीक्षा करते हुए रिजर्व बैंक के गवर्नर वाई वी रेड्डी ने रेपो रेट चौथाई अंक बढा कर 7.25 प्रतिशत करने की घोषणा की.

हालाँकि रिजर्व बैंक ने रिवर्स रेपो दर, बैंक दर और नकद आरक्षी अनुपात यानी सीआरआर में कोई बदलाव नहीं किया है.

ग़ौरतलब है कि छह जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान मँहगाई यानी मुद्रास्फ़ीति दर बढ़ कर 6.1 फ़ीसदी हो गई जबकि केंद्र सरकार ने इसे पाँच फ़ीसदी के भीतर रखने का लक्ष्य निर्धारित किया हुआ है.

रेपो दर

विभिन्न वाणिज्यिक बैंक अपना पैसा रिज़र्व बैंक के ख़जाने में जमा करते हैं. इस पर रिज़र्व बैंक जिस दर से ब्याज़ देता है उसे रिवर्स रेपो दर कहते हैं.

जबकि रेपो दर ठीक इसके उलट होती है. जब रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों को कम अवधि के लिए उधार देता है तो उस पर जिस दर से ब्याज लिया जाता है उसे रेपो दर कहते हैं.

रेपो दर बढ़ने से खुदरा कारोबार करने वाले बैंक रिज़र्व बैंक में ही पैसा रखना फ़ायदेमंद समझते हैं क्योंकि उन्हें अधिक ब्याज मिलता है.

दूसरी ओर रिवर्स रेपो दर बढ़ने से खुदरिया बैंकों को रिज़र्व बैंक से उधार लेने पर अधिक ब्याज का भुगतान करना पड़ता है.

दोनों तरह की ब्याज़ दरें बढ़ने से मुद्रा बाज़ार में नकदी की कमी होगी. नकदी पैसा नहीं होने पर माँग घटती है जिससे सामानों या संपत्तियों की कीमत पर अंकुश लगता है.

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