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शनिवार, 24 जून, 2006 को 13:47 GMT तक के समाचार
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भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ

किसान
दामों में बढ़ोत्तरी के कारण सरकार को खाद्य सामग्री आयात करनी पड़ रही है
भारत में विरोध की आवाज़ों और राजनीतिक दलों के दबाव के बीच वित्तमंत्री पी चिदम्बरम ने गेहूँ और दलहन के आयात जैसे सुझावों की घोषणा कर दी है.

यानी अब आटा चक्की वाले और बिस्कुट और डबल रोटी बनाने वाले कम ड्यूटी देकर गेहूँ आयात कर सकेंगे. इससे पहले सरकार 22 लाख टन गेहूँ आयात करने का फैसला कर ही चुकी थी.

सरकार मुद्रास्फीति की मार को तेल की कीमतों से भी जोड़ रही थी.

यह भी कहा जा रहा था कि मुद्रास्फीति की दर साढ़े चार प्रतिशत है और सरकार इस पर नियंत्रण बनाए रखेगी.

पर इन सबके बीच जो सवाल जनता के बीच है वो यह कि उनकी जेब इतनी तेज़ी से खाली क्यों हो रही है और अगर सरकार मंहगाई का कारण जान रही थी तो समय रहते कुछ किया क्यों नहीं गया?

विशेषज्ञों का मानना है कि असल में मुद्रा स्फीति की दर इससे कहीं अधिक है क्योंकि सर्विस क्षेत्र के आंकड़े मुद्रास्फीति के मूल्यांकन में जोड़े नहीं गए हैं.

भारतवासियों को महंगाई की मार इसलिए भी ज़्यादा लग रही है क्योंकि वे पिछले सात-आठ वर्षों से मुद्रास्फीति के ज्वार से कुछ हद तक बचे रहे.

 पहले तो ख़रीद का समर्थन मूल्य बढ़ाना पड़ेगा और इसके साथ ही किसानों को भुगतान में की जाने वाली देरी को ख़त्म करना पड़ेगा
आलोक पुराणिक, अर्थशास्त्री

बैंकों में ब्याज दर और उपभोक्ता ऋण की दर कम रहने के फ़ायदे भी जनता ने उठाए. पर पूर्व कृषि राज्यमंत्री और अब मध्य प्रदेश के योजना बोर्ड के उपाध्यक्ष सोमपाल कुछ अन्य पहलुओं पर भी ध्यान देने की बात कहते हैं.

वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में कहीं न कहीं कुछ शिथिलता केन्द्रीय स्तर पर हुई है. जहाँ तक कृषि उत्पादों का सवाल है, माँग और आपूर्ति के लिए अर्थव्यवस्था और अर्थशास्त्र का जो नियम है उसकी अभिव्यक्ति होना तो स्वाभाविक है. जब माँग ज़्यादा हो जायेगी और आपूर्ति कम होगी तो दाम बढ़ेंगे ही."

नीतियों पर सवाल

उन्होंने कहा कि अगर इस तरह की परिस्थिति हो तो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान भेजे जाएँ और ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों तक उचित मूल्यों पर राशन पहुँचाया जाए.

पर इस बाबत सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं. यानी समस्या सरकार की ख़रीद प्रक्रिया में है.

 पिछले दो वर्षों से ऐसा हो रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि बहुत नगण्य है जबकि बाज़ार का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊँचा है. इसीलिए किसान अपना अनाज सरकार को नहीं बेचकर निजी व्यापारियों को बेच रहा है. इसीलिए सरकारी गोदामों में गल्ले की कमी हो गई है
यशवंत सिन्हा, पूर्व वित्तमंत्री, भारत सरकार

पूर्व वित्तमंत्री और भाजपा नेता यशवंत सिन्हा इस बारे में कहते हैं, "पिछले दो वर्षों से ऐसा हो रहा है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि बहुत नगण्य है जबकि बाज़ार का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊँचा है. इसीलिए किसान अपना अनाज सरकार को नहीं बेचकर निजी व्यापारियों को बेच रहा है. इसीलिए सरकारी गोदामों में गल्ले की कमी हो गई है."

कुछ कृषि क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि एक बड़ी शाकाहारी आबादी वाले इस देश में दलहनों की फ़सल की उपज को प्रोत्साहित करने के लिए क़दम उठाए जाने चाहिए थे.

इस क्षेत्र में अनुसंधान और किसानों को पूँजी मुहैया करवाई जानी चाहिए थी पर सरकारों ने इसे नज़र अंदाज किया है.

अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक कहते हैं कि वर्ष 2001-02 में गेहूँ उत्पादन का 30 प्रतिशत सरकार ने ख़रीद लिया था. पर वर्ष 2005-06 में हालात ये है कि सरकार केवल 20 प्रतिशत उत्पादन का हिस्सा ही ख़रीद पाई है.

तो आखिर सरकार को क्या करना चाहिए, इस बाबत पुराणिक कहते हैं, "पहले तो ख़रीद का समर्थन मूल्य बढ़ाना पड़ेगा और इसके साथ ही किसानों को भुगतान में की जाने वाली देरी को ख़त्म करना पड़ेगा."

उधर तेल की कीमतों में उछाल की मार भी सरकार को झेलनी पड़ रही है.

कौन-सा भारत

यह सब सुनकर सवाल उठता है कि आठ फ़ीसदी की विकास दर, चीन से मुकाबला करता और विश्व स्तर पर बड़ी शक्ति बनकर उभरता भारत एक सच्चाई है या फिर महंगाई की मार और आत्महत्या करते किसान इस देश की सच्चाई है.

किसान
कृषि क्षेत्र की उपेक्षा महंगी साबित हो रही है

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर अरूण कुमार चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं, "विकास आधुनिक क्षेत्रों में हो रहा है. सर्विस सेक्टर, संगठित क्षेत्र में बीपीओ, कॉल सेंटर, आईटी, और टेलीकॉम के क्षेत्र में विकास हो रहा है लेकिन कृषि पर 55 प्रतिशत लोग निर्भर करते हैं जिसमें विकास दर बहुत कम है. क़रीब 97 प्रतिशत जनता की विकास दर ऊँची नहीं है."

वहीं आलोक पुराणिक का मानना है कि तीन भारत हैं. एक इंडिया अमेरिका जैसा है जिसमें 10 से 15 करोड़ लोग ऐसे हैं जो कि वैसे ही जीते हैं जैसे कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में रह रहे लोग, फिर 25 से 30 करोड़ लोगों का भारत जो आगे बढ़ने की लड़ाई लड़ रहा है. इसे वे इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था कहते है और आख़िर में तीसरा भारत यानी 50 करोड़ लोगों का भारत जो कि बांग्लादेश या अफ़्रीका जैसा है.

तो जो लोग ऊपरी पायदान पर नहीं जा पा रहे, उनका बटुआ भारत के आगे बढ़ने की चाह का बोझ झेलता रहेगा.

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