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शुक्रवार, 28 मार्च, 2008 को 11:15 GMT तक के समाचार
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भारत में महंगाई ने पाँव पसारे
सब्ज़ी मंडी
कुछ महीने पहले तक मुद्रास्फीति की दर चार फ़ीसदी के आसपास ही थी
धातुओं और खाद्य पदार्थों की क़ीमतों में बढ़ोत्तरी के चलते भारत के लोग इस समय पिछले एक साल की सबसे बड़ी महंगाई का सामना कर रहे हैं.

15 मार्च को समाप्त सप्ताह में मुद्रा स्फ़ीति की दर 6.68 रिकॉर्ड की गई है जो पिछले 59 सप्ताह में सबसे ऊँची दर है.

इससे पिछले सप्ताह मुद्रा स्फ़ीति की दर 5.92 दर्ज की गई थी. व्यापारियों को उम्मीद थी कि यह दर 5.9 पर आकर ठहरेगी.

इस दौरान सब्ज़ियों की क़ीमतों में 2.5 फ़ीसदी का इजाफ़ा हुआ है जबकि निर्मित उत्पादों के दाम भी 0.9 फ़ीसदी ऊपर चले गए हैं.

मुद्रा स्फ़ीति की दर के बहुत ज़्यादा चढ़ जाने के कारण निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएँ कम हो गई हैं.

कुछ महीने पहले तक यह दर चार फ़ीसदी के आसपास थी लेकिन 15 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह में यह 0.76 फ़ीसदी की बढ़त के साथ 6.68 तक पहुँच गई.

पिछले साल इसी समय मुद्रा स्फ़ीति की यह दर 6.56 रिकॉर्ड की गई थी.

चिदंबरम की चिंता

विश्लेषकों का कहना है कि छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशों और अगले वित्त वर्ष के लिए पेश बजट में सामाजिक क्षेत्र पर ख़र्च में वृद्धि के साथ ही कच्चे तेल की बढ़ती क़ीमतों ने महँगाई के चढ़ने की आशंका बढ़ा दी है.

प्राथमिकता में गड़बड़ी...
 यह एक असंतुलित प्राथमिकता की निशानी है कि कुछ देश अपनी आबादी के एक हिस्से की परिवहन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सस्ता ईंधन तैयार करने के उपायों का सहारा लें
पी चिदंबरम, भारतीय वित्तमंत्री

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने कुछ दिन पहले कहा था कि एक तरफ़ अमरीका समेत कुछ देश खाद्य फ़सलों को जैव ईंधन में बदल रहे हैं तो दूसरी तरफ़ ग़रीब लोग खाद्य सामग्रियों की भागती क़ीमतों से जूझ रहे हैं.

सिंगापुर यात्रा के दौरान एक सेमिनार में चिदंबरम ने कहा था कि मक्का और दूसरी फ़सलों को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करना 'असंतुलित प्राथमिकता' का संकेत है.

उन्होंने कहा, "यह एक असंतुलित प्राथमिकता की निशानी है कि कुछ देश अपनी आबादी के एक हिस्से की परिवहन ज़रूरतों को पूरा करने के लिए सस्ता ईंधन तैयार करने के उपायों का सहारा लें."

मक्का, सोयाबीन, गन्ने और कुछ अन्य फ़सलों को सस्ते और स्वच्छ जैव ईंधन के रूप में देखा जा रहा है.

चिदंबरम ने कहा कि मक्का, चावल और गेहूँ की क़ीमतें 2004 के बाद से अब तक दोगुनी हो चुकी हैं.

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