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मंगलवार, 27 फ़रवरी, 2007 को 14:39 GMT तक के समाचार
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महँगाई, बदली रणनीति के कारण हारी कांग्रेस

अमरिंदर और बादल
अकाली-भाजपा गठबंधन ने महँगाई, बेरोज़गारी और कृषि के मुद्दे ज़ोरशोर से उठाए
पंजाब विधानसभा चुनावों में अकाली दल-भाजपा गठबंधन की जीत के अहम कारण हैं - महँगाई, स्थानीय विकास के मुद्दे और नए समर्थकों की खोज में कांग्रेस का अपने पारंपरिक आधार से दूर होना.

वर्ष 2002 में हुए चुनावों में अकाली-भाजपा गठबंधन को 44 और कांग्रेस को 62 सीटें मिली थीं और बाक़ी छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों को मिली थीं.

इस बार 117 में से 116 सीटों के लिए चुनाव हुआ. कांग्रेस को 44 सीटें, अकाली दल को 48 और भाजपा को 19 सीटें मिलीं, जबकि पाँच सीटों पर निर्दलीय सफल रहे हैं. अकाली-भाजपा गठबंधन को 67 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला है.

इन नतीजों के बाद जहाँ अकाली दल और कांग्रेस दोनो को ही अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और आधार पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत पड़ेगी वहीं भाजपा को इस चुनाव में सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ है.

एक ओर अकाली-भाजपा गठबंधन ने इस चुनाव में विकास और आर्थिक मुद्दों को प्राथमिकता दी थी और दूसरी ओर कांग्रेस ने किसानों के मुद्दे और आर्थिक विकास के साथ-साथ सिखों के लिए किए गए विशेष कार्यों की बात उठाई थी.

स्थानीय विकास और विधायकों के काम की भी मतदाताओं ने ख़बर ली है. कांग्रेस ने 18 मंत्रियों को चुनाव मैदान में उतारा था जिनमें से मुख्यमंत्री अमरिंदर के अलावा केवल चार मंत्री ही अपनी सीटों से जीत पाए. उधर अकाली दल की ओर से उतारे गए पूर्व मंत्री - बीवी जागीर कौर, तोता सिंह, एसएस मलूका, महेश-इंदर सिंह गरेवाल, गुरदेव सिंह बादल, एसएस रखड़ा और भाजपा के पूर्व मंत्री मदनमोहन मित्तल हार गए.

कांग्रेस के पारंपरिक आधार में सेंध

ये ध्यान रखना ज़रूरी है कांग्रेस को पारंपरिक तौर पर चुनावों में शहरी वोटर, दलित वोटर और कुछ हद तक ग्रमीण वोटर का समर्थन मिलता है.

लेकिन कांग्रेस ने इस बार कृषि क्षेत्र, किसानों के कर्ज़, सतलुज-यमुना नहर और कुछ सिख मुद्दों -जैसे कि अमृतसर-ननकाना साहिब बस सेवा शुरु करने पर ज़्यादा ज़ोर दिया. इस क्षेत्र में कांग्रेस के पक्ष में पंजाब की सीमा से सटे 'डेरा सच्चा सौदा' के प्रमुख की कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने की अपील ने भी भूमिका निभाई.

 कांग्रेस को अपनी आम आदमी के हित की राजनीति पर दोबारा विचार करना होगा. धार्मिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमने वाली डेरा राजनीति से उसके समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की रणनीति गड़बड़ा गई है, जिसे उसे सुधारना होगा
डॉक्टर प्रमोद कुमार

पंजाब के मालवा इलाक़े में इन मुद्दों पर कांग्रेस को पहले से कुछ ज़्यादा समर्थन मिला. ये इलाक़ा पारंपरिक तौर पर अकाली दल का समर्थन करता है.

वहाँ कांग्रेस को पिछली बार लगभग 60 में से 27 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार उसे लगभग 36 सीटें मिलीं.

लेकिन कांग्रेस के चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस का पारंपरिक वोटर - शहरी हिंदू और दलित वर्ग - पार्टी से कुछ दूर हटता नज़र आए.

राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर प्रमोद कुमार मानते हैं, "कांग्रेस को अपनी आम आदमी के हित की राजनीति पर दोबारा विचार करना होगा. धार्मिक मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमने वाली डेरा राजनीति से उसके समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की रणनीति गड़बड़ा गई है, जिसे उसे सुधारना होगा."

भाजपा तीन से 19 तक

कांग्रेस की रणनीति का सीधा प्रभाव माझा और दोआब क्षेत्रों में हुआ जहाँ लगभग 50 सीटों में से अधिकतर अकाली दल-भाजपा प्रत्याशियों के खाते में गईं.

ऐसा प्रतीत होता है कि काँग्रेस के लगातार किसानों और सिखों की बात करने से शहरी हिंदू मतदाता भाजपा के पक्ष में झुक गया. महँगाई का भी इसमें ख़ासा योगदान रहा.

उधर दलित वोट बसपा, कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच बँट गया.

जहाँ कांग्रेस की दलित वर्ग को सुविधाएँ और शहरी विकास की बातों को वोटरों ने ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया वहीं इसका सीधा फ़ायदा भाजपा को हुआ.

भाजपा को पिछली बार राज्य विधानसभा में केवल तीन सीटें मिली थीं जबकि इस बार भाजपा 19 सीटें जीती हैं.

जहाँ तक अकालियों का सवाल है तो उन्हें चाहे मालवा में उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली लेकिन विकास और आर्थिक मुद्दों पर उसे माझा और दोआब क्षेत्रों में ख़ासी सफलता मिली है.

सिख मुद्दों को इस बार ज़्यादा ज़ोर-शोर से न उठाकर अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने शहरी हिंदू वोटर को अपने साथ जोड़कर रखा जिसका उसे फ़ायदा मिला है.

बहुजन समाज पार्टी को पंजाब में कोई सफलता नहीं मिली है जो दर्शाता है कि किस तरह दलित वोट बसपा, कांग्रेस और अकाली-भाजपा गठबंधन के बीच बुरी तरह बँटा.

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