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झुनझुनवाला की नज़र में महंगाई... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
महंगाई बढ़ने का मूल कारण मांग और आपूर्ति का असंतुलन माना जाता है. जब माँग बढ़ जाती है और आपूर्ति कम हो जाती है तो महंगाई बढ़ जाती है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में ये कितना सही है? क्या किसी वस्तु की सप्लाई कम हुई है? देश में सीमेंट, स्टील या खाद्यान्न का उत्पादन पिछले सालों के मुकाबले में कम नहीं हुआ है. देश में महँगाई बढ़ने का प्रमुख कारण अधिक विदेशी पूँजी निवेश का आगमन है और अर्थव्यव्यवस्था में आई तेज़ी है. देश में पहले की तुलना मे, पिछले तीन-चार महीनों में लगभग दस अरब डालर का विदेशी निवेश हुआ है. जबकि शेयर बाज़ार में 3-4 अरब डॉलर की ही बिकवाली हुई है. विदेशी पूँजी का यह प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी बना रहा है और मांग पैदा कर रहा है, जिससे महंगाई बढ़ रही है. इस समस्या का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू ये है कि भारत सरकार आय़ात-निर्यात के असंतुलन को हल करने की कोशिश से केवल घरेलू और विश्व बाज़ार के मूल्यों में संतुलन बना सकती है. लेकिन जिन वस्तुओं के दाम दुनिया भर में बढ़ रहे हैं उन पर सरकार के उठाए कदमों का कोई प्रभाव नहीं पडे़गा. अमरीकी आर्थिक मंदी का असर जैव ईंधन का भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ रहा है क्योंकि यहाँ जैव ईंधन का उत्पादन बहुत कम होता है लेकिन वैश्विक दृष्टि से यह काफ़ी महत्वपूर्ण है. क्योंकि खाद्यान की क़ीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बढ़ रही हैं. अमरीकी अर्थव्यवस्था में आई मंदी के भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर को लेकर भारतीय अर्थशास्त्री एकमत नहीं हैं. अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग यह मानता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अमरीकी अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई है. इसे हम पिछले कुछ महीनों में भारतीय शेयर बाज़ारों में आई गिरावट के रूप में देख सकते हैं, जब अमरीकी बाज़ार में मंदी आई तो अमरीकी बैंकों ने अपने घाटे की भरपाई के लिए भारत शेयर बाज़ार में बिक्री की, जिससे भारतीय शेयर बाज़ार औंधे मुँह गिर गए. वहीं दूसरी ओर कुछ लोग यह मानते हैं कि अमरीकी अर्थव्यवस्था के संकट में आने पर मध्य पूर्व और शेष विश्व की पूंजी का प्रवाह भारत की ओर होगा, जिसका भारत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. छह महीने से एक साल के बीच यह दूसरा असर ज़्यादा प्रभावी होगा. शेष विश्व की पूंजी के भारत में निवेश से शेयर बाजार और मार्केट में उछाल आएगा और अर्थव्यवस्था में भी तेज़ी आएगी. भारत के शेयर बाज़ारों में आई मंदी अस्थायी है. सरकारी उपाय क्यों सफल नहीं? महंगाई को रोकने के लिए भारत सरकार ने जो क़दम उठाए हैं, उनमें अहम है कि जिन वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं उनका निर्यात बंद कर दिया या उनके आयात पर लगने वाले कर कम कर दिए जाएँ, जिससे विदेशों से अधिक मात्रा में माल भारत आ सके. इस तरह आय़ात-निर्यात के संतुलन को समायोजित करने से केवल घरेलू और विश्व बाज़ार के मूल्यों में संतुलन बनाया जा सकता है. लेकिन जिन वस्तुओं के दाम दुनिया भर में बढ़ रहे है उन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडे़गा. इस तरह कहा जा सकता है कि भारत सरकार के क़दम बहुत प्रभावी नहीं होंगे. दूसरी ओर रिज़र्व बैंक भी महंगाई पर नियंक्षण रखने के लिए कुछ कोशिशें कर रहा है. रिज़र्व बैंक ने कैश रिज़र्व रेश्यो (सीआरआर) बढ़ाया है. रिज़र्व बैंक की इस क़वायद का थोड़ा-बहुत प्रभाव पड़ सकता है. होगा यह कि बैंक घरेलू निवेशकों और उपभोक्ताओं को कम मात्रा में ऋण देंगे. इससे मांग कम होगी. इसे इस तरह समझ सकते हैं कि एक उद्यमी फैक्ट्री लगाना चाहता है, लेकिन वह ऋण न मिल पाने से फैक्ट्री नहीं लगा पाएगा. इससे सीमेंट और स्टील की मांग कम हो जाएगी. घरेलू मांग को रोकने से यह व्यवस्था भी अप्रभावी होगी क्योंकि मौलिक समस्या ये है कि सरकार विदेशी निवेश को नहीं रोक पा रही है. इस तरह भारत में उत्पादन के बावजूद विश्व की पूंजी का भारत की ओर पलायन महंगाई को और बढ़ा रहा है. (बीबीसी संवाददाता अतुल संगर से बातचीत के आधार पर) |
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