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बुलंदी की राह पर भारतीय अर्थव्यवस्था | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आर्थिक विकास के ताज़ा आँकड़ों से स्पष्ट है कि भारतीय उद्योग ने विश्व स्तर की गुणवत्ता हासिल कर ली है और इसका प्रमाण विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण है. पिछले दिनों कई भारतीय कंपनियों ने विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण किया है, मसलन टाटा का कोरस स्टील को ख़रीदना. वर्ष 1991 में शुरू हुई उदारीकरण की प्रक्रिया की यह सुखद उपलब्धि है. फिर भी दो समस्याएँ हैं जिन पर ध्यान देना ज़रूरी है. वर्तमान तीव्र आर्थिक विकास मुख्यतः बड़ी कंपनियों के बल पर हो रहा है. कॉरपोरेट और इनकम टैक्स की वसूली अधिक हो रही है. इस तीव्र विकास का आम आदमी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है जैसे ऑटोमेटिक कपड़ा मिल के लगने से तमाम जुलाहों का रोज़गार छिन जाता है. सरकार की नीति है कि बड़ी कंपनियों पर टैक्स लगाकर जनकल्याणकारी कार्यक्रम चलाए जाएँ जैसे रोज़गार गारंटी योजना. इस रणनीति के तहत सरकार टैक्स, जीडीपी अनुपात को बढ़ाने का प्रयास कर रही है. समस्याएँ इस नीति में दो समस्याएँ हैं. पहली यह कि सरकारी जनकल्याणकारी कार्यक्रमों का इतिहास दुखद रहा है जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली का. इसका अधिकाधिक लाभ सरकारी कर्मचारियों और संभ्रांत वर्गों को मिला है. एक अध्ययन में पाया गया कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का केवल 27 फ़ीसदी हिस्सा ग़रीब तक पहुँच रहा है. इस प्रकार तीव्र आर्थिक विकास से ग़रीब को दोहरा नुक़सान हो रहा है. जुलाहों की तरह उनका रोज़गार छिन रहा है और उनके कल्याण के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों का लाभ उच्च वर्ग को मिल रहा है. इस नीति में दूसरी समस्या है कि टैक्स अधिक लगाने से अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ती है. वैसे आर्थिक विकास दर 12 फ़ीसदी के स्थान पर केवल 9 फ़ीसदी पर बनी हुई है. इस समस्या का हल यह है कि श्रम सघन उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाए. प्रोत्साहन जिस प्रकार पिछड़े इलाक़ों में लगने वाले उद्यमों को कैपिटल सब्सिडी दी जाती थी, उसी प्रकार अधिक संख्या में रोज़गार उत्पन्न करने वाली इकाइयों को टैक्स अथवा श्रम क़ानूनों में छूट जैसे प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं.
मौजूदा दौर में सबसे अहम चिंता अमरीकी अर्थव्यवस्था पर हमारी निर्भरता है. निर्यातकों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार डॉलर के मुक़ाबले रुपए का मूल्य न्यून बनाए हुए है. इसके लिए रिज़र्व बैंक भारी मात्रा में डॉलर खरीद कर अमरीकी सरकार द्वारा जारी ट्रेजरी बांड ख़रीद रहा है. फिर भी अमरीकी डॉलर गिरता ही जा रहा है और इसकी वजह यह है कि अमरीकी अर्थव्यवस्था नए तकनीकी आविष्कारों के मामले में असफल रही है. सेवा क्षेत्र में भारत और मैनुफ़ैक्चरिंग में चीन के सामने अमरीका नहीं ठहरता. दोहरा दुष्प्रभाव भारत और चीन के केंद्रीय बैंकों द्वारा अमरीकी माँग को कृत्रिम रूप से बढ़ाया जा रहा है. इस नीति का भारत पर दोहरा दुष्प्रभाव पड़ रहा है. पहला यह कि हमारी गाढ़ी कमाई से ग्रामीण सड़क बनाने के स्थान पर अमरीकी उपभोक्ता को बासमती चावल उपलब्ध कराया जा रहा है. दूसरा यह कि टूटते डॉलर से हमारी 200 अरब डॉलर की रकम की क़ीमत गिर रही है. यदि इस रकम को यदि भारतीय उद्यमियों को ब्याज पर दे दिया जाए तो इससे हुई अतिरिक्त आय से प्रत्येक भारतीय नागरिक को लगभग 5000 रुपए प्रति वर्ष की रकम मुफ्त मुहैया कराई जा सकती है. इस समस्या का निदान यह है कि रिज़र्व बैंक डॉलर बेचे, अमरीकी अर्थव्यवस्था को टूटने दे और अपने उत्पादन को अमरीकी उपभोक्ता के स्थान पर अपने ग़रीब नागरिकों को उपलब्ध कराए. इन दोनों समस्याओं को हल कर लिया जाए तो भारत की समृद्धि में सामाजिक स्थिरता भी रहेगी और यह टिकाऊ भी होगी. | इससे जुड़ी ख़बरें अर्थव्यवस्था में नौ फ़ीसदी से ज्यादा वृद्धि31 मई, 2007 | कारोबार विकास दर 7.8 प्रतिशत रहेगी: आईएमएफ़12 अप्रैल, 2007 | कारोबार बढ़ती ब्याज दर और भारतीय अर्थव्यवस्था03 अप्रैल, 2007 | कारोबार 'मँहगाई घटाना सरकार की प्राथमिकता'03 फ़रवरी, 2007 | कारोबार अर्थव्यवस्था में उम्मीद से अधिक तेज़ी29 सितंबर, 2006 | कारोबार 'आर्थिक विकास में कंपनियाँ भी साझीदार'03 सितंबर, 2006 | कारोबार भारत 12वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था09 जुलाई, 2006 | कारोबार | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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