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मंगलवार, 03 अप्रैल, 2007 को 06:13 GMT तक के समाचार
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बढ़ती ब्याज दर और भारतीय अर्थव्यवस्था

बीएसई
रिज़र्व बैंक के फ़ैसले से अर्थव्यवस्था की विकास दर काफ़ी धीमी पड़ सकती है
भारत की अर्थ व्यवस्था के शिथिल होने की आशंका के कारण सोमवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) सेंसेक्स लगभग 600 अंक गिरा.

ऐसा उस समय हुआ जब भारतीय रिज़र्व बैंक ने छोटी अवधि के लिए वाणिज्यिक बैंकों को देय ऋणों पर ब्याज दर बढ़ाई है ताकि महँगाई पर काबू पाया जा सके. हाल में महँगाई पिछले दो साल में सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गई है.

भारतीय कंपनियों को भविष्य में होने वाले मुनाफ़े के बारे में निवेशकों की चिंता के कारण सोमवार को सेंसेक्स में ये भारी गिरावट देखी गई.

निवेशकों को डर है कि ब्याज दर में वृद्धि के कारण बाज़ार में पैसे की सप्लाई घटेगी और कंपनियों के लिए कर्ज़ा लेना महँगा हो जाएगा.

सेंसेक्स में आई गिरावट से सबसे ज़्यादा नुकसान बैंकों के शेयरों में दिखा क्योंकि निवेशकों का मानना था इसे कर्ज़ देने और बैंकों के मुनाफ़े पर असर पड़ेगा.

वाहनों, घर निर्माण और प्रापर्ट कंपनियों के शेयर भी इसी कारण से गिरे.

धीमी होगी अर्थव्यवस्था

जहाँ रिज़र्व बैंक ने ब्याज दर महँगाई पर काबू पाने के लिए बढ़ाई ताकि 9.2 प्रतिशत की विकास दर से बढ़ रही अर्थव्यवस्था 'ओवरहीट' न हो यानि अनियंत्रित ढंग से न बढ़े.

लेकिन पर्यवेक्षक मानते हैं कि रिज़र्व बैंक के फ़ैसले से अर्थव्यवस्था की विकास दर काफ़ी धीमी पड़ सकती है.

मुंबई स्थित एक शेयर दलाल सुशील चौक्से का कहना था, "ब्याज दर की 24 अप्रैल को होने वाली निर्धारित समीक्षा से लगभग एक महीना पहले अचानक ब्याज दर बढ़ने शेयर बाज़ार के लिए हैरानी की बात थी और स्थिर कायम होने तक बाज़ार और गिर सकता है."

 ब्याज दर की 24 अप्रैल को होने वाली निर्धारित समीक्षा से लगभग एक महीना पहले अचानक ब्याज दर बढ़ने शेयर बाज़ार के लिए हैरानी की बात थी और स्थिर कायम होने तक बाज़ार और गिर सकता है
शेयर दलाल सुशील चौक्से

बाज़ार के विश्लेषकों में इस बात को लेकर ज़्यादा चिंता है कि ब्याज दर ने जिती ऊँचाई छूनी थी, उसे पा लिया है या फिर यदि महँगाई पर काबू नहीं पाया जाता तो ब्याज दर में और वृद्धि हो सकती है.

लेकिन सरकार इस पूरे घटनाक्रम से ज़्यादा विचलित नज़र नहीं आती.

वित्त मंत्री पी चिदंबरम पिछले कई साल से 'हितकारी' ब्याज दर के पक्षधर रहे हैं लेकिन अब वे रिज़र्व बैंक की ब्याज दर बढ़ाने के फ़ैसले का समर्थन कर रहे हैं.

चुनावों का दबाव

कई पर्यवेक्षकों का मानना है कि पंजाब और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में हुई विपक्ष की जीत के बाद सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी और वित्त मंत्री
पर काफ़ी दबाव है.

आवश्यक वस्तुओं की कीमत में वृद्धि और बढ़ती महँगाई इन राज्यों में बड़े चुनावी मुद्दे बने थे. वित्त मंत्री अब महँगाई पर जल्द से जल्द लगाम लगाकर इस आलोचना से बचना चाहते हैं कि आर्थिक नीतियों के कारण कांग्रेस पार्टी की चुनावों में हार ह रही है.

इस महीने राजनीतिक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश राज्य में चुनाव हो रहे हैं.

आशा की किरण

लेकिन कुछ विश्लेषक इस समय ब्याज दर में वृद्धि होने में एक आशा की किरण भी देख रहे हैं.

एबीएन-ऐम्रो बैंक के वरिष्ठ अर्थशास्त्री गौरव कपूर ने बीबीसी को बताया कि ब्याज दर में वृद्धि से महँगाई का काबू पाया जाएगा जिससे पैसे के लिए असली और काल्पनिक माँग में अंतर हो सकेगा.

इसी के कारण अर्थव्यवस्था के 'अनियंत्रित' तरीक़े से बढ़ना बंद होगा और भारतीय शेयर बाज़ार में यथार्थवादी रुझान देखने को मिलेंगे.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो नौ प्रतिशत से कुछ कम आर्थिक विकास की दर - फिर वह चाहे साढ़े सात या आठ प्रतिशत ही क्यों न हो, और वर्तमान 6.5 प्रतिशत महँगाई दर की जगह लगभग पाँच प्रतिशत महँगाई अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर होगी.

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