T20 विश्व कप में भारत की हार की 5 वजहें

रोहित शर्मा

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    • Author, नितिन श्रीवास्तव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, एडिलेड से

ऑस्ट्रेलिया में जारी टी-20 विश्व कप में सेमीफ़ाइनल में भारत को इंग्लैंड से एक करारी हार का सामना करना पड़ा है.

जहां क़यास और उम्मीदें इस पर लग रहीं थी कि मेलबर्न में शायद भारत और पाकिस्तान का फ़ाइनल हो, वहीं भारतीय टीम इंग्लैंड के सामने पूरी तरह ढेर होती चली गई.

टी-20 गेम में भारतीय फ़ैन्स को नापसंद आने वाला एक रिकार्ड भी बना क्योंकि लगातार दूसरे विश्व कप में पूरे 10 विकेट से दो बार हारने वाली टीम भारत ही है. 

तो अब जहां मेलबर्न में पाकिस्तान और इंग्लैंड का फ़ाइनल होगा.

भारत में इस बात पर बहस तेज़ होगी कि क्या ग़लत हुआ और क्या सही. 

आइए एक नज़र दौड़ाते हैं उन पांच वजहों पर जो टीम इंडिया की नाक़ामी का सबब बनीं. 

पावरप्ले की नाकामी

रोहित शर्मा

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टी-20 गेम में शुरुआती छह ओवर सबसे अहम इसलिए होते हैं क्योंकि ये मान के चला जाता है कि बल्लेबाज़ गेंदबाज़ों पर अटैक करेंगे ही करेंगे.

वजह ये की इन छह ओवरों में फ़ील्डिंग साइड सिर्फ़ दो फ़ील्डर 30 गज़ के दायरे से बाहर तैनात कर सकती है और लोफ़्टेड शॉट्स की भरमार देखने को मिलती है.

भारतीय टीम इस पूरी प्रतियोगिता में पावरप्ले के सबसे ख़राब प्रदर्शन करने वाली टीमों में पहले भी शुमार थी और सेमीफ़ाइनल में भी वही हुआ.

भारत ने मैच की पहली 36 गेंदों में एक विकेट गँवा कर मात्र 38 रन बनाए जिसे इंग्लैंड की टीम ने सिर्फ़ 3.2 ओवरों में ही पूरा कर लिया, बिना कोई विकेट खोए.

अगर पूरे टूर्नामेंट का औसत निकाला जाए तो पावरप्ले में भारतीय औसत 6 रन प्रति ओवर का निकलता है.

अब ये टी-20 नहीं बल्कि 50 ओवर वाले एक-दिवसीय क्रिकेट का औसत हो सकता है, इस फ़ॉर्मैट का क़तई नहीं. 

पूर्व भारतीय क्रिकेटर के श्रीकांत ने बीबीसी से कहा, “प्रतियोगिता में लगा ही नहीं कि इंडियन टीम शुरुआती छह ओवरों में टी-20 क्रिकेट खेल रही है. शायद विकेट न खोने के प्रेशर से वे धीमे रहे और ये मॉडर्न क्रिकेट तो बिल्कुल भी नहीं है.”

सलामी बल्लेबाज़ों का ख़राब फ़ॉर्म

केएल राहुल औऱ रोहित शर्मा

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सलामी बल्लेबाज़ों की नाक़ामी न सिर्फ़ पावरप्ले में दिखी बल्कि विपक्षी गेंदबाज़ी पर बिल्कुल भी हावी न हो जाने के मामले में भी दिखी.

नीदरलैंड्स और ज़िम्बाब्वे के ख़िलाफ़ हुए मैच के अलावा रोहित शर्मा और केएल राहुल अपने शॉट चुनने और उन्हें अंजाम तक पहुँचाने के लिए तरसते रहे लेकिन टाइमिंग ने साथ ही नहीं दिया.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हुए पहले मैच में जिस तरह दोनों तेज गेंदबाज़ी से असहज दिखे वो तक़रीबन पूरे टूर्नामेंट जारी रहा.

कोशिश भी कम दिखी कि अगर बड़े शॉट्स नहीं लग रहे हैं तो विकेट के बीच रनिंग को तेज़ किया जाए और फ़ील्डिंग साइड पर दबाव बनाए जाए कि वो फ़ील्डर्स को पास लाएं जिससे लॉफ़्टेड शॉट्स सुरक्षित रहें.

निश्चित तौर पर आने वाले सालों में भारतीय चयनकर्ताओं के सामने एक ठोस सलामी जोड़ी को तैयार करने की चुनौती रहेगी क्योंकि रोहित 35 और राहुल 30 वर्ष के हो चुके हैं.

एडिलेड में मौजूद ‘द गार्डियन’ अख़बार के क्रिकेट कॉरेस्पॉंडेंट साइमन बर्नटन के मुताबिक़, “मुझे उम्मीद थी कि ये दोनों वैसे ही खुल कर खेलेंगे जैसे आईपीएल में खेलते हैं. मगर यहां कुछ ज़्यादा ही दबाव दिख रहा था. आम तौर पर बड़े प्लेयर्स बड़े मैच के लिए अपना सबसे बेहतर बचा कर रखते हैं. बटलर और हेल्स ने वही किया”.

मध्यक्रम पर ज़रूरत से ज़्यादा भार

हार्दिक और विराट

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अपनी मज़बूत बैटिंग के लिए जानी जाने वाली टीम इंडिया के इस टूर्नामेंट में सिर्फ़ तीन बल्लेबाज़ चले.

विराट कोहली, सूर्यकुमार यादव और हार्दिक पंड्या. कोहली और सूर्यकुमार को कई दफ़ा पहले तीन ओवर में ही क्रीज़ पर आना पड़ा.

यक़ीनन, इस बात का दबाव कोहली की बैटिंग पर भी दिखा और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ हुए मैच के अलावा वो उतना खुल कर नहीं खेल सके जिसके लिए वे जाने जाते हैं.

सेमीफ़ाइनल में उन्होंने भले ही पारी सम्भालने वाली 50 रनों की इनिंग्स खेली लेकिन उसके लिए उन्होंने 40 गेंदें भी इस्तेमाल कीं.

तुलना इंग्लैंड के बल्लेबाज़ों से करें तो कोई मुक़ाबला ही नहीं क्योंकि जोस बटलर ने 80 रन सिर्फ़ 49 गेंदों में बनाए और एलेक्स हेल्स ने 86 रन मात्र 47 गेंदों में ही जड़ डाले.

सूर्यकुमार अच्छे फ़ॉर्म में लग रहे थे लेकिन हर मैच में उनसे पहले जैसी पारी की उम्मीद करना भी ग़लत होगा.

सेमीफ़ाइनल में उनका भूमिका हार्दिक पंड्या ने अपने कंधों पर ली और कम से कम भारत को 150 रनों के पार तो ले गए. हालांकि ये भी काफ़ी नहीं था. 

खिलाड़ियों को रोटेट न करने की हिचक

आश्विन

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पिछले क़रीब एक साल से भारतीय टीम खिलाड़ियों को रोटेट करने की जुगत में लगी रही है लेकिन अभी भी सब कुछ पहले सा ही दिखता है.

जसप्रीत बुमराह और रवींद्र जाडेजा का टूर्नामेंट से पहले चोटिल हो जाना एक बड़ा झटका था.

सेमीफ़ाइनल की हार पर बात हो तो अक्षर पटेल के लगातार नाक़ाम होते रहने के बावजूद उनको फिर से मौक़ा देना क्या रिस्क लेने से बचने का संकेत था?

अगर इंग्लैंड के स्पिनर आदिल राशिद इस पिच पर सफल साबित हुए तो क्या पता युज़वेंद्र चहल भी अपनी लेग स्पिन से कुछ विकेट ले पाते.

जानकरों का ये भी मानना है कि अगर ऋषभ को खिलाना ही था तो उनसे बैटिंग ओपन करवा के पावरप्ले में तेज़ खेलने का निर्देश दिया जाना था. भले ही केएल राहुल को एक मैच में थ्री-डाउन या फ़ोर-डाउन आना होता. ऋषभ का इस्तेमाल वैसे भी आख़िरी ओवरों में हो नहीं सका जो वे शुरू में बड़े हिट्स लगा कर सकते थे. 

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विकेटकीपर-बैट्समैन एडम गिलक्रिस्ट मानते हैं कि, “टीम का रवैया थोड़ा और आक्रामक होना चाहिए था”.

उन्होंने कहा, “हर विपक्षी टीम एक सी नहीं हो सकती. अगर आपके पास 15 खिलाड़ियों की मज़बूत टीम है तो उसको विकेट और विपक्षी टीम के लेहाज़ से रोटेट करने में कोई हर्ज़ नहीं. टी-20 फ़ॉर्मैट में सरप्राइज़ एलिमेंट होना ज़रूरी है”. ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप: सूर्यकुमार-अर्शदीप का कमाल नहीं आया भारत के काम, दक्षिण अफ़्रीका ने हराया

लचर गेंदबाज़ी का नुक़सान

उमरान मलिक

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इमेज कैप्शन, क्या 150 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से गेंद फ़ेंकने वाले उमरान मलिक को भारतीय टीम में होना चाहिए था?

जसप्रीत बुमराह के टूर्नामेंट से बाहर होते ही ये मान सा लिया गया कि भारतीय गेंदबाज़ी में धार नहीं रहेगी.

ये भी साफ़ था कि मोहम्मद शमी पिछले क़रीब एक साल से राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा की टी-20 टीम के लिए उपयुक्त नहीं माने जा रहे थे और बीच में चोट से भी उबरे थे और कोविड से भी.

सवाल ये उठता है कि क्या 22 साल के तेज गेंदबाज़ उमरान मालिक को बड़े स्टेज पर अपने को साबित करने का चांस देना ग़लत होता?

अगर पिछले आईपीएल की कामयाबी पर दिनेश कार्तिक और केएल राहुल टीम में जगह बना सकते हैं तो फिर उसी आईपीएल में कई दफ़ा 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंद फेंकने वाले और 14 मैचों में 22 विकेट लेने वाले उमरान का टीम में न होने के नुक़सान ज़रूर दिखा. 

ख़ासतौर पर ऑस्ट्रेलिया में ज़्यादातर ख़राब मौसम में हुए इस टूर्नामेंट की तेज़ विकटों पर.

सेमीफ़ाइनल की ही बात हो तो न सिर्फ़ भुवनेशवार कुमार और शमी बुरी तरह पिटे, बल्कि अश्विन को भी इंग्लैंड की सलामी जोड़ी ने अपनी लय में नहीं आने दिया.

मैच ख़त्म होते ही कमेंट्री बॉक्स से नीचे मैदान पर जाते हुए हर्षा भोगले ने अपनी निराशा ज़ाहिर करते हुए कहा, “कुछ ज़्यादा ही संभल कर खेलने का यही नुक़सान होता है. बल्लेबाज़ी मज़बूत है लेकिन पूरी तरह नहीं चल रही तो गेंदबाज़ी कैसे चलेगी”.

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