विराट कोहली: भारत के सबसे कामयाब टेस्ट कप्तान और ऐसी विदाई, वजह क्या?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
विराट कोहली ने शनिवार को सोशल मीडिया पर लिखी पोस्ट के माध्यम ने टेस्ट कप्तानी छोड़ने की घोषणा कर दी.
ऐसी घोषणा की अटकलें दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ सिरीज़ से पहले से लगाई जाने लगी थी. विराट कोहली के लिए कप्तानी बचाने के लिए हर हाल में टेस्ट सिरीज़ जीतना ज़रूरी था. पहले टेस्ट में टीम इंडिया ने 113 रनों के ज़ोरदार अंतर से जीत भी हासिल की, लेकिन जीत की लय टीम कायम नहीं रख सकी और पहला टेस्ट जीतने के बाद अगले दो टेस्ट मैच हार गई.
इसके बाद क्या होता, इस बारे में वरिष्ठ खेल पत्रकार चंद्रशेखर लूथरा बताते हैं, "इस सिरीज़ के नतीजे से पहले ही यह तय हो चुका था कि बीसीसीआई कोहली को कप्तानी से बाहर का रास्ता दिखाती, उससे पहले कोहली ने समझदारी दिखाते हुए खुद ही इस्तीफ़ा दे दिया. आप इसे कोहली बनाम बीसीसीआई की लड़ाई भी कह सकते हैं. इसमें सत्ता के सामने किसी एक व्यक्ति की नहीं चलती है. यह एक बार फिर से ज़ाहिर हो गया है."
इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.
पोस्ट YouTube समाप्त
कोहली बनाम बीसीसीआई?
क्या वाक़ई में यह लड़ाई विराट कोहली बनाम बीसीसीआई की बन चुकी थी?
इसको समझने से पहले विराट कोहली के टेस्ट टीम के कप्तान के तौर पर योगदान को देखा जाना चाहिए.
कोहली के इस्तीफ़े के एलान के ठीक बाद बीसीसीआई ने सोशल मीडिया पर उनके योगदान की तारीफ़ करते हुए उन्हें टेस्ट क्रिकेट का सबसे कामयाब कप्तान बताया.
अब याद कीजिएगा, इसी भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने एक महीने पहले दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ वनडे सिरीज़ से पहले विराट कोहली को कप्तानी से हटाया था तो इस बारे में टीम की घोषणा की रिलीज़ में महज दो पंक्तियों में रोहित शर्मा को कप्तानी थमाए जाने का जिक्र था, कोहली के योगदान या उनका आभार जताए जाने का कोई जिक्र नहीं था.
और उससे भी एक महीने पहले तक तो विराट कोहली भारतीय क्रिकेट के तीनों फॉर्मेट के कप्तान थे.
यानी समय के चक्र ने कोहली रूपी सूरज को उनके अस्ताचल में पहुंचा दिया है, जहां से बतौर पेशेवर क्रिकेटर वे खुद को टीम में बनाए रख पाए तो यही उनके लिए बड़ी कामयाबी होगी.

इमेज स्रोत, Getty Images
कमाल के कप्तान
अब इन बातों को विराट कोहली के कप्तानी के रिकॉर्ड के बरक्स देखिए.
विराट कोहली ने भारत के लिए कुल 68 टेस्ट मैचों की कप्तानी की, जिसमें उन्होंने 40 मैचों में जीत दिलाई, उनकी कप्तानी में भारत ने 17 टेस्ट गंवाए जबकि 11 मैच ड्रॉ.
भारत की ओर से किसी भी कप्तान ने इतने टेस्ट मैचों में जीत हासिल नहीं की. वहीं वनडे मुक़ाबले में विराट कोहली ने जिन 95 मैचों में भारत की कप्तानी की उनमें 65 मैचों में टीम इंडिया ने जीत हासिल की.
वनडे में महेंद्र सिंह धोनी (110), मोहम्मद अजहरूद्दीन (90) और सौरव गांगुली (76) मैचों में जीत हासिल करने वाले कप्तान ज़रूर रहे लेकिन इनमें से किन्हीं का विनिंग परसेंटेज 70 से ज़्यादा का नहीं रहा.
आंकड़े ही नहीं बल्कि विदेशी पिचों पर जो कामयाबी विराट कोहली की अगुवाई में टीम इंडिया ने हासिल की, वह उन्हें बेहतरीन कप्तान में शुमार करता रहेगा. और बार बार यह भी याद दिलाता रहेगा कि विराट कोहली को जिस तरह से कप्तानी से विदाई मिली है, वे उससे कहीं बेहतर बर्ताव के हक़दार थे.
वरिष्ठ क्रिकेट पत्रकार सी. शेखर लूथरा बताते हैं, "देखिए जिस दिन विराट कोहली ने सार्वजनिक तौर पर बीसीसीआई से अलग लाइन ली थी, टी-20 कप्तान से हटाए जाने के बाद उनका जो भी गुस्सा फूटा था. वह अप्रत्याशित था. लेकिन यह स्पष्ट था कि वे मिस कैलकुलेट कर गए थे. देर सबेर उनको जाना ही था. टेस्ट सिरीज़ हारने के बाद उनको हटाया ही जाता. इन सबके बीच यह ध्यान रखना होगा कि बीते दो साल से कोहली का अपना बल्ला भी उस धमक से चल नहीं रहा था जिसके लिए वे जाने जाते रहे हैं."

इमेज स्रोत, Ani
किन हालात में मिली कप्तानी?
वैसे विराट कोहली की टेस्ट कप्तानी का सिलसिला पहली बार अचानक ही 2014 में भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे में शुरू हुआ था, एडिलेड टेस्ट के मुक़ाबले से पहले टीम के कप्तान एमएस धोनी के अंगूठे की चोट पूरी तरह से ठीक नहीं हुई थी और कोहली को पहली बार टेस्ट टीम में कप्तानी का मौका मिला था.
कप्तान के तौर पर विराट कोहली क्या कुछ कर सकते थे, ये उन्होंने पहले ही मुक़ाबले में ज़ाहिर कर दिया था.
एडिलेड की तेज तर्रार पिच पर मिचेल जॉनसन, पीटर सिड्ल और रेयान हैरिस की गेंदों के सामने विराट कोहली ने पहली पारी में 115 रन ठोके और चौथी पारी में 364 रनों के लक्ष्य का पीछा करते हुए उन्होंने 141 रनों की पारी खेली थी. अगर दूसरे छोर पर मुरली विजय के अलावा दूसरे बल्लेबाज़ों ने साथ दिया होता तो कोहली पहले ही टेस्ट में इतिहास रच देते.
उनकी इस शानदार बल्लेबाज़ी के बाद भी भारत ये मैच 48 रनों से हार गया था. अगले दो मैच में महेंद्र सिंह धोनी ने कप्तानी की लेकिन चौथे टेस्ट से ठीक पहले उन्होंने टेस्ट से संन्यास की घोषणा कर दी.
सिडनी में खेले गए इस टेस्ट मुक़ाबले की पहली पारी में कोहली ने 147 रन ठोके और दूसरी पारी में 46 रन बनाए. हालांकि यह मुक़ाबला टीम ने ड्रॉ करा लिया था.
लेकिन कोहली ने वहां से जो शुरूआत की, उसकी चमक हाल के दिनों में ग़ायब दिखने लगी थी. लेकिन बतौर बल्लेबाज़ फॉर्म हासिल करते उन्हें ज़्यादा वक्त नहीं लगने वाला था. यह दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ सिरीज़ में भी नज़र आया.
विराट कोहली ने जिन 68 टेस्ट मैचों में भारत की कप्तानी की, उसमें उन्होंने 20 शतक लगाए. यह किसी भी भारतीय कप्तान के लिए रिकार्ड्स है.
बतौर कप्तान टेस्ट मैचों में उनसे ज़्यादा शतक केवल ग्रीम स्मिथ के नाम हैं, जिन्होंने दक्षिण अफ़्रीका के लिए 109 टेस्ट मैचों की कप्तानी में 25 शतक बनाए थे. कोहली अपनी मौजूदा दर से ही शतक बनाते तो भी 90 टेस्ट तक पहुंचते-पहुंचते ये रिकॉर्ड उनके नाम होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इमेज स्रोत, Getty Images
भारतीय क्रिकेट के लिए योगदान
कोहली ने अपनी कप्तानी से बीते सात सालों में भारतीय टीम को एक मज़बूत टीम बनाए रखा. इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि कोहली की कप्तानी में अगस्त, 2016 से मार्च, 2020 तक लगातार 42 महीने मतलब तीन साल छह महीने तक भारतीय टीम टेस्ट की नंबर वन साइड बनी रही.
उनकी कप्तानी में टीम ने ऑस्ट्रेलिया को उनके ही मैदानों में सिरीज़ में हराया और टीम वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फ़ाइनल तक पहुंची.
इस दौरान घरेलू मैदानों पर टीम का प्रदर्शन और भी शानदार रहा. पिछले 14 टेस्ट सिरीज़ में घरेलू मैदान पर टीम को हार का सामना नहीं करना पड़ा. घरेलू मैदानों पर कोहली ने 24 टेस्ट मैचों में जीत हासिल की और महज दो मैचों में भारत को हार का सामना करना पड़ा.
कोहली की कप्तानी में भारत के तेज़ गेंदबाज़ों की वह बैटरी तैयारी की, जिसके सामने दुनिया भर के बल्लेबाज़ों के पांव डगमगाने लगे थे. कभी स्पिन गेंदबाजों की चौकड़ी भारतीय टेस्ट टीम की पहचान हुआ करती थी, लेकिन कोहली की अगुवाई में तेज़ गेंदबाज़ों की चौकड़ी ने ले ली.

इमेज स्रोत, Ani
हाथ नहीं आई आईसीसी ट्रॉफ़ी
हालांकि कोहली की कप्तानी में सबकुछ ठीक ही रहा हो, ऐसा भी नहीं था. विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंडिया कोई भी बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीत सकी और यह विराट कोहली के सीने में किसी शूल की तरह चुभता रहेगा.
2017 में चैंपियंस ट्रॉफ़ी के फ़ाइनल से टीम इंडिया हारी और 2019 के वर्ल्ड कप में सेमीफ़ाइनल में न्यूज़ीलैंड ने टीम को हराया. 2021 के वर्ल्ड टी-20 में टीम सेमीफ़ाइनल तक नहीं पहुंच सकी.
विराट कोहली को ये मलाल भी रहेगा कि आईपीएल में अपनी कप्तानी में वे रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरू को कभी चैंपियन नहीं बना पाए.
लेकिन कोहली की इन नाकामियों से ज़्यादा दुश्मन उनकी अपनी आक्रामकता बन गई थी. खेल के मैदान में उनके प्रदर्शन से ज़्यादा चर्चा उनकी आक्रामकता की भी होने लगी थी. केपटाउन टेस्ट के तीसरे दिन डीआरएस फ़ैसले का विरोध करते हुए उनकी आक्रामकता हम सबने देखी.
बतौर कप्तान न तो वे ख़ुद खेल की भावना का सम्मान करते नज़र आए और न ही टीम के दूसरे खिलाड़ियों को ऐसा करने के लिए प्रेरित कर सके. एक हद तक ऐसा लगने लगा था कि उनके लिए जीत ही सब कुछ है और हार को पचा पाने की काबिलियत वो भूल चुके हैं.
वे अपने आगे किसी की सुनते नहीं थे. इसकी मिसाल इस रूप में भी देखने को मिली, जब अनिल कुंबले जैसे बेहतरीन क्रिकेटर को कोहली और शास्त्री की जोड़ी के सामने विदा होना पड़ा.
लेकिन समय हमेशा एक समान नहीं रहता और जब तक आपका प्रदर्शन बोल रहा है, तब तक सारे अवगुण दबे रहते हैं. लेकिन समय बदलते ही वे आपके लिए मुसीबतों का सबब बन जाते हैं.
यही वजह है कि जब बीसीसीआई ने टीम के प्रमुख कोच के तौर पर राहुल द्रविड़ का आवेदन स्वीकार किया था, तभी से यह कयास लगाए जाने लगे थे कि बतौर कप्तान कोहली बहुत दिन तक नहीं चल पाएंगे.
हालांकि कई लोगों के मन में ये सवाल ज़रूर उठ सकता है कि बीसीसीआई के अध्यक्ष सौरव गांगुली या फिर टीम के कोच राहुल द्रविड़ के रहते क्या भारतीय क्रिकेट के एक लाजवाब सितारे विराट कोहली को बेहतर अंदाज़ में विदाई नहीं मिल सकती थी.
ये सवाल आम क्रिकेट प्रेमी के मन में तो आ सकता है लेकिन भारतीय क्रिकेट को फॉलो करने वाले लोग बखूबी जानते हैं कि बीसीसीआई के सामने स्टार खिलाड़ियों की क्या हैसियत रही है.
अगर एक सचिन तेंदुलकर को छोड़ दें तो किसी भी भारतीय क्रिकेटर की यादगार विदाई का लम्हा आपको याद नहीं आएगा, यहां यह भी मत भूलिएगा कि सचिन तेंदुलकर ने अपने पूरे करियर में बीसीसीआई से अलग कभी कोई लाइन नहीं ली.

इमेज स्रोत, Ani
आगे की राह और चुनौतियां
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या विराट कोहली में अभी भी क्रिकेट बाक़ी है, निश्चित तौर पर विराट कोहली में काफ़ी क्रिकेट बाकी है.
पिछले दो सालों में उनके बल्ले से शतक भले नहीं निकले हों लेकिन वे लगातार रन बनाते रहे हैं. रनों के लिए संघर्ष नहीं करते दिखे हैं. आज भी सचिन तेंदुलकर के सौ शतकों के रिकॉर्ड को तोड़ने वाले वे सबसे उपयुक्त दावेदार लगते हैं. लेकिन इसके लिए उन्होंने टीम में अपनी जगह बचाकर रखनी होगी.
टेस्ट क्रिकेट में 27 और वनडे क्रिकेट में 43 शतक के साथ उनके कुल 70 शतक हैं. लेकिन यह चुनौती अब आसान नहीं रहने वाली है.
सी. शेखर लूथरा कहते हैं, "बतौर बल्लेबाज़ उन्हें अब पहले से कहीं ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन करना होगा और इतना ही नहीं नए कप्तान के साथ उन्हें तालमेल भी बिठाना होगा. एक ख़राब सिरीज़ उन्हें हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा सकती है. जबकि टीम में बने रहने के लिए उन्हें लगातार बेहतर खेल दिखाना होगा."
हालांकि क्रिकेट गलियारों में यह चर्चा भी चल रही है कि विराट कोहली ने अपनी ओर से बीसीसीआई से सुलह सफ़ाई की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन इस बार अरुण जेटली के कद का बीसीसीआई के अंदर उनका बचाव करने वाला कोई कद्दावर मौजूद नहीं था. ज़ाहिर तौर पर विराट कोहली को अब एक नयी शुरुआत करनी होगी.
हालांकि बल्लेबाज़ी तकनीक के सहारे वे अभी भी दो तीन साल तक क्रिकेट खेल सकते हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि शनिवार से ही बतौर ब्रैंड उनकी वैल्यू घटती जाएगी. वह वैल्यू कितनी कम होगी यह भी उनके बल्ले पर निर्भर करेगा.
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












