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20 रुपये के ‘जनता के इलेक्टोरल बॉन्ड’ से भाकपा माले ने आरा से आरके सिंह को कैसे हराया?- ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, आरा से, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार की आरा लोकसभा सीट से भाकपा माले के सुदामा प्रसाद ने सबको चौंकाते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्री रहे आरके सिंह को 59,808 वोटों से हरा दिया.
सुदामा प्रसाद की ये जीत भले ही बाहरी दुनिया के लिए चौकाने वाली है, लेकिन आरा लोकसभा के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले सीमान्त किसान, फुटपाथी दुकानदार, निर्माण मजदूर, रिक्शा चालक, टेंपो चलाने वालों को ये जीत चौंकाती नहीं है.
इन समूहों ने तकरीबन 45 लाख का चंदा जुटाकर सुदामा प्रसाद के चुनाव का ख़र्च उठाया है.
सुदामा प्रसाद और भाकपा माले ने कूपन और सांस्कृतिक टोलियों के ज़रिए लगातार महंगे होते चुनावों को चुनौती दी और उसमें क़ामयाब हुए.
बरतना देवी कड़ी धूप में अपनी झोपड़ी की छांव में बैठी हैं. शर्माते हुए बताती हैं, “सुदामा नेता है. हमने उसको 100 रुपये चंदा दिया है.”
रजवार जाति से आने वाली बरतना देवी के पति बीघा राम निर्माण मजदूर हैं. सोन नहर के किनारे रहने वाले बीघा राम को कभी कभार ही मज़दूरी मिल पाती है.
मज़दूरी में 300 रुपये मिलते हैं. 300 रुपये की कमाई पर 100 रुपये चंदे के सवाल पर बरतना देवी कहती है, “पार्टी ने हमें झोपड़ी बनाने के लिए ज़मीन दिलवाई है तो हम वोट और चंदा उसी को देंगे.”
दरअसल बरतना, चारू ग्राम में रहती हैं. चारू ग्राम, भाकपा माले के संस्थापक चारू मजूमदार के नाम पर बसा एक टोला है जिसमें पासी, रजवार, कानू, मल्लाह, चंद्रवंशी आदि जातियों से आने वाले 78 परिवार बसे हैं.
ये सभी परिवार वो हैं जो 24 नवंबर 1989 को भोजपुर के तरारी ब्लॉक के बिहटा गांव में हुए नरसंहार के बाद बेघर हो गए थे.
साल 1989 में लोकसभा चुनाव के वक्त वोट डालने को लेकर बिहटा में दलितों और ऊंची जातियों के बीच में सुबह सात बजे झगड़ा हुआ जिसमें पांच ऊंची जाति के लोगों की हत्या हुई. बाद में शाम को 22 दलितों की हत्याएं हुईं.
चारू ग्राम में रहने वाले ददन पासवान कहते हैं, “इसके बाद 1994 में पार्टी (भाकपा माले) के नेतृत्व में 17 दिन का धरना हुआ. उस धरना में सुदामा प्रसाद भी थे. इस धरने के बाद हम सभी 78 परिवारों को ज़मीन का पर्चा मिला और हमने बिहटा से अलग अपना घर बनाया."
"हम लोगों ने इसका नाम चारू ग्राम रखा. यहां से 30,000 रुपये इकठ्ठा करके पार्टी को दिए हैं. यहां रहने वाले लोग मज़दूरी करके पालन पोषण करते हैं. ग़रीबों की पार्टी है तो उसे तो मदद करनी ही होगी.”
कूपन छपवा कर लिया चंदा
दरअसल भोजपुर का इलाका ‘बिहार के नक्सलबाड़ी’ आंदोलन के गढ़ के रूप में जाना जाता है. इस इलाके में भाकपा माले का प्रभाव 70 के दशक से ही रहा है.
भाकपा माले के राज्य सचिव कुणाल कहते हैं, “हमने लगातार ग़रीबों की लड़ाई लड़ी. उनके वोट देने के अधिकार से लेकर उनकी खेती किसानी, मज़दूरी के सवालों पर हम लड़ते रहे और यहां से विधानसभा चुनाव जीतते रहे. इससे पहले 1989 में आरा लोकसभा सीट से हमारी पार्टी के रामेश्वर प्रसाद ने जीत हासिल की थी. बीच में वक्त में अति पिछड़ों और छोटे व्यवसायियों का समर्थन हमें नहीं था. अति पिछड़े नीतीश जी के साथ थे. लेकिन इस बार वो हमारे साथ आए.”
वामपंथी पार्टियों के चुनाव लड़ने का पैटर्न देखें तो ये आम तौर पर लोगों के सहयोग से ही चुनाव लड़ती है. भाकपा माले ने इस सिस्टम को अबकी बार ज़्यादा सुनियोजित तरीक़े से किया और बाकायदा 20, 50 और 100 रुपये के कूपन छपवाए.
राज्य सचिव कुणाल कहते हैं, “ हमारी पार्टी हर बार इसी तरीक़े से चुनाव लड़ती है. लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव से पहले जब इलेक्टोरल बांड चर्चा में आया तो हमने उसी तर्ज़ पर अपने खास कूपन निकाले.”
लेकिन क्या दो बार विधायक रहे व्यक्ति को आम लोग आसानी से चंदा दे देते हैं? इस सवाल का जवाब हमें भाकपा माले के तरारी ब्लॉक स्थित दफ्तर में मिलता है.
यहां ब्लॉक कमिटी के सदस्य राम दयाल पंडित टीन की छत और एक झूलते हुए पंखे के नीचे बैठे हैं. इस भीषण गर्मी में उनकी आंखों के नीचे बार बार पसीने की बूंदें जम जा रही है.
राम दयाल पंडित बीबीसी से कहते हैं, “यहां 19 पंचायत हैं. हम लोग जाते थे तो लोगों का सवाल रहता था कि इतने दिन विधायक रहे तो चंदा काहे ले रहे. तो हमें लोगों को समझाना पड़ता था कि हम जनता के सहयोग से ही चुनाव लड़ते हैं ताकि जनता का अधिकार हम पर बना रहे. हम लोगों को हर पंचायत से 50,000 रुपये जुटाने का लक्ष्य मिला था जिसमें हम कहीं सफल हुए और कहीं असफल.”
मिठाई की दुकान से नेता बनने का सफ़र
आरा लोकसभा क्षेत्र से सांसद बने सुदामा प्रसाद, अगिआंव विधानसभा के पवना गांव के हैं. गांव की 70 साल की शांति देवी खेत मज़दूरी करती थीं.
20 रुपये का कूपन दिखाते हुए वो कहती हैं, “पहले इधर उधर जाते थे तो सामंती ताकत वाले लोग कुछ भी बोल देते थे, लेकिन अब उनका इतना पॉवर नहीं रह गया. पार्टी मज़बूत रहेगी तभी ना हम लोग ज़िंदगी जियेंगे.”
पवना गांव की ही मुन्नी देवी ने भी 20 रुपये का कूपन ख़रीदा है. अपने छोटे बच्चे को गोद में उठाए मुन्नी कहती हैं, “बरियारी (जोर ज़बरदस्ती) से पैसे नहीं दिए हैं. तीन तारा (भाकपा माले का चुनाव चिन्ह) पर वोट डाला है कि सुदामा जी खेत मज़दूरों के लिए कुछ करेंगे.”
पवना गांव में कूपन काटने की ज़िम्मेदारी विष्णु मोहन पर थी. वो बताते हैं, “पवना में यादव, कुशवाहा, राजपूत सहित कई जाति के लोग रहते हैं. हम लोग सभी का वोटिंग पैटर्न जानते हैं. उसी के हिसाब से हम कूपन काटने गए और लोगों ने खुशी खुशी हमें चंदा दिया. यहां 10,000 रुपये का चंदा इकट्ठा हुआ.”
दरअसल आरा के अरवल सड़क पर स्थित पवना बाज़ार सुदामा प्रसाद के जीवन का टर्निंग प्वाइंट है. दरअसल इसी बाज़ार में उनकी छोटी सी मिठाई की दुकान है.
1980 के आसपास उसी दुकान पर एक स्थानीय दरोगा से चाय के दाम को लेकर तक़रार हुई थी.
सुदामा प्रसाद याद करते हैं, “उस वक्त महेन्द्र सिंह नाम के दरोगा आए और आठ स्पेशल चाय के लिए बोले. उनसे चाय के चार रुपये मांगे गए तो वो नाराज हो गए कि इतनी महंगी चाय कहीं नहीं मिलती. उन्होंने पैसे तो दे दिए लेकिन साथ में धमकी भी दे गए. बाद में हमारी दुकान के सामने एक हत्या हुई जिसमें उन्होंने पिताजी, चाचाजी और मुझको जेल में डाल दिया. 81 दिन हम लोगों को जेल में रखने के बाद छोड़ दिया गया.”
इस घटना के बाद सुदामा प्रसाद ने खुद को सामाजिक जीवन में झोंक दिया. उन्होंने यूपी, बंगाल, अविभाजित बिहार में जगह-जगह मंचित होने वाले नाटकों में अभिनय किया तो सोन नहर के पक्कीकरण, आरा-सासाराम बड़ी रेल लाइन, फुटपाथ के दुकानदार, भोजपुर में विश्वविद्यालय की स्थापना के सवाल पर 1984 से ‘भोजपुर जगाओ, भोजपुर बचाओ’ अभियान चलाया.
इस दौरान वो कई बार जेल गए. 1990 में उन्होंने जेल में रहते हुए आरा विधानसभा से अपना पहला चुनाव लड़ा, जिसमें वो अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी वशिष्ठ नारायण सिंह से 4,000 वोटों से हार गए.
इसके बाद भी वो कई बार चुनाव लड़े लेकिन सफलता मिली 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में. उन्होंने आरा तरारी विधानसभा चुनाव मात्र 272 वोट से जीता, लेकिन साल 2020 के विधानसभा चुनाव में जीत का मार्जिन बढ़कर 12,000 हो गया.
कल्चरल कैपेनिंग में मतदाताओं की समस्या उभारी
कूपन के अलावा आरा लोकसभा क्षेत्र में भोजपुरी भाषी गीतों के जरिए भी भाकपा माले ने प्रचार किया. यानी पार्टी ने कल्चरल कैपेनिंग भी बहुत आक्रामक तरीके से की.
इस कैपेनिंग का ज़िम्मा समता, राजू रंजन और कृष्ण कुमार निर्मोही ने उठाया जो बीते कई दशकों से पार्टी का सांस्कृतिक संगठन संभालते रहे हैं.
कृष्ण कुमार निर्मोही गीत लिखते और गाते हैं. वो बताते हैं, “हम सालभर लोगों के बीच ही रहते हैं, इसलिए हमें लोगों की समस्या मालूम होती है. चुनाव से पहले इन्हीं समस्याओं पर गीत लिखे गए. हम लोग कहीं भी गीत गाना शुरू कर देते थे जहां दस बीस लोग बैठे हों. गीत गाने के साथ-साथ कूपन भी कटवाते जाते थे.”
पार्टी से जुड़े कलाकारों के गाने भी रिकॉर्ड कराए गए ताकि खर्च कम हो. सोशल मीडिया पर उपस्थिति बढ़ाने का भी सहारा लिया गया.
दरअसल जवाबदेही सुदामा प्रसाद की यूएसपी रही है. 2015 में विधायक बनने के बाद वो अपने विधानसभा क्षेत्र में विधायक निधि से मिली राशि और इलाके में हुए ख़र्च के ब्यौरे का रिकॉर्ड जारी करते थे.
इसके अलावा उन्होंने पुस्तकालय समिति का अध्यक्ष रहते हुए बिहार विधानसभा के 100 वर्ष के इतिहास में पहली बार पुस्तकालयों पर रिपोर्ट पेश की.
बतौर कृषि उद्योग विकास समिति के अध्यक्ष उन्होनें बटाईदार किसानों को पहचान पत्र देने की मांग की.
63 साल के सुदामा प्रसाद के इन छोटे-छोटे क़दमों से उनके पक्ष में मजबूत गोलबंदी हुई.
सहार प्रखंड के मथुरापुर के राणा प्रताप सिंह कहते हैं, “2016 तक हम अपना धान 1000 रुपये प्रति क्विंटल व्यापारी को बेच देते थे. क्योंकि बटाईदार से पैक्स धान नहीं ख़रीदता था. लेकिन विधानसभा में सुदामा के सवाल उठाने के बाद हमारा धान अब पैक्स ख़रीदता है. जनवरी 2024 में हम अपना अनाज 2,183 रुपये प्रति क्विंटल पर पैक्स को बेचा है.”
बेरोज़गारों का सवाल
सुदामा प्रसाद ने शोभा मंडल से अंतरजातीय विवाह किया है. शोभा मंडल महिला संगठन ऐपवा (ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेन्स एसोसिएशन) से जुड़ी हुई हैं.
इस दंपत्ति के दो बेटे हैं जिसमें से एक पटना हाईकोर्ट में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर हैं.
सुदामा प्रसाद के अविभाजित संयुक्त परिवार में भी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं. 27 साल के सौरभ, सुदामा प्रसाद के भतीजे हैं. सौरभ ने 2018 में बीटेक किया था और उसके बाद से ही वो बीपीएससी की तैयारी कर रहे हैं.
सौरभ बताते हैं, “उनको बेरोज़गार पर सवाल उठाते रहना चाहिए. हम लोग बाहर से पढ़ाई तो कर लेते हैं लेकिन नौकरी नहीं मिलती.”
पवना गांव के ही सुदेश कुमार चंद्रवंशी बाज़ार में मुर्गा बेचते हैं. वो कहते हैं, “ हम भी नेताजी को 20 रुपये चंदा दिए हैं. उम्मीद करते हैं कि वो शिक्षा और रोज़गार के मसले पर काम करेंगे. शिक्षा का बिहार में बहुत बुरा हाल है.”
आरा लोकसभा के लिए ब्लूप्रिंट के सवाल पर सुदामा कहते हैं, “मेरी प्राथमिकता है कि खेती को लाभदायक बनाया जाए, कृषि आधारित कल कारखाना आरा में लगवाना, नोटबंदी के चलते व्यवसायी वर्ग बहुत परेशान है तो उसके लिए व्यवसायी आयोग का गठन और शहरी – ग्रामीण ग़रीबों का जीवन गरिमामय बनाना, ये कोशिश होगी.”
'अहंकार ने हराया'
आरा लोकसभा चुनाव परिणाम को देखने से पता चलता है कि इस लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाली सात विधानसभाओं में से सिर्फ़ आरा विधानसभा पर ही आरके सिंह को बढ़त थी. उन्हें यहां 82,324 वोट तो सुदामा प्रसाद को यहां 74,053 वोट मिले.
ब्यूरोक्रेट आरके सिंह साल 2014 और 2019 से यहां के सांसद रहे हैं. आरके सिंह बिहार के समस्तीपुर में बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी का रथ रोककर चर्चा में आए थे.
आरके सिंह के हैट्रिक ना लगा पाने का अफसोस आरा शहर में उनके समर्थक मतदाताओं में दिखता है.
कुमार विश्वास कहते हैं, “आरा को आज तक ऐसा सांसद नहीं मिला था. उनके चलते ही आरा से पटना को सुबह 7.15 बजे ट्रेन चली जिसे डेली पैसेन्जर आर के सिंह ट्रेन के नाम से जानते हैं. वो मोदी के नवरत्नों में से एक थे जिनको आरा ने हरा दिया.”
वहीं उनके पास खड़े नौजवान रोहित कहते हैं, “बिजली का व्यवस्था एकदम फिट कर दिया था, अब वो जिस दिन से हारे हैं बिजली व्यवस्था ख़राब हो गई. वोटरों ने जाति के बहकावे में आकर वोट दे दिया है.”
खुद आरके सिंह भी अपनी हार के बाद घटक दल के कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों के साथ मीटिंग कर रहे हैं. बीती 16 जून को भी उन्होनें ऐसे ही मीटिंग आरा शहर में की थी. उनकी मीटिंग से निकलकर ज्यादातर लोग शहर के मशहूर रमना मैदान के पास जुटे थे.
लोजपा (आर) के जिलाध्यक्ष राजेश्वर पासवान ने बताया, “400 पार के नारे और आरक्षण – संविधान बचाने की बात दलितों के दिल तक लग गई. लेकिन फिर भी हमने लोजपा का वोट ट्रांसफ़र करा दिया था. आरके सिंह को नुकसान तो उनके अपने लोगों ने पहुंचाया है.”
बामपाली पंचायत के पूर्व मुखिया और लोजपा कार्यकर्ता प्रमोद पासवान कहते हैं, “माले वाला घर घर जाता था, चंदा लेता था और उसी के घर का खाना भी खाता था. लेकिन एनडीए के नेता लोग एसी से बाहर ही नहीं निकले. जब आप लोगों के पास ऐसे जाते हैं तो जनता का भी लगाव आपके साथ होता है.”
वहीं बीजेपी के आरा नगर मंडल से जुड़े एक कार्यकर्ता कहते हैं, “बीजेपी नहीं हारी है, बल्कि आरके सिंह की तानाशाही हारी है. कार्यकर्ता से मिलना नहीं है तो कार्यकर्ता भी घर जाकर सो गया कि आप अपने बल पर चुनाव लड़िए.”
जेडीयू के अति पिछड़ा प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद कहते हैं, “400 पार वाले नारे और हिंदू मुसलमान के चलते ये सीट बीजेपी हार गई है.”
राजद के साथ गठबंधन से भी मिली मदद
आरा डिजिटल भास्कर के वरिष्ठ संवाददाता अभिनय बाली बीबीसी से कहते है, “ आर के सिंह की कैपेनिंग में दिक्कत ये रही कि उनकेअपने लोगों ने ही उनको सहयोग नहीं दिया. यानी जहां बीजेपी से नाराज़गी थी और मामला सुलझाया जा सकता था, वहां आर के सिंह को उनके ही लोगों ने पहुंचने नहीं दिया. जबकि इंडिया गठबंधन का कैंपेन ज्यादा संगठित था.”
आरा लोकसभा क्षेत्र में 21 लाख वोटर है जिसमें करीब साढ़े तीन लाख वोटर यादव जाति के है.
जातिगत लिहाज से यादव यहां पर सबसे ज़्यादा संख्या में हैं.
1990 से भोजपुर इलाके में काम कर रहे और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रदेश कार्यसमिति सदस्य महेश सिंह यादव बीबीसी से कहते है, “ अबकी बार सुदामा प्रसाद की जीत का कारण राजद का बेस वोट और भाकपा माले का कैडर वोट मिलना है. अति पिछड़ा जो नीतीश जी के साथ जाते थे उन्होंने अबकी बार अतिपिछड़ा जाति से आने वाले सुदामा प्रसाद को वोट दिया है. इसके अलावा काराकाट में पवन सिंह की उपेन्द्र कुशवाहा के खिलाफ उम्मीदवारी से नाराज कुशवाहा जाति के लोगों ने भी भाकपा माले को वोट दिया है. इन सब फैक्टर से माले जीता है जिसमें राजद की अहम भूमिका है.”
माले की दावेदारी बढ़ी
लेकिन आरके सिंह को हराने वाले सुदामा प्रसाद कहते हैं, “अहंकार बहुत ख़राब चीज है. जनता विधायक, एमपी, मुखिया को वोट देकर अगर जिताती है तो जमीन पर ला भी पटकती है. इसलिए किसी भी जनप्रतिनिधि का नंबर एक एजेंडा होना चाहिए कि वो जनता के सुख दुख में शामिल हो. जनता आपसे सोने का महल बनवाने की अपेक्षा नहीं करती है.”
बिहार लोकसभा चुनाव परिणामों में भाकपा माले के खाते में तीन सीट आई थी. जिसमें से वो काराकाट और आरा में जीत दर्ज कर पाने में सफल रही है.
काराकाट में माले उम्मीदवार राजाराम सिंह ने निर्दलीय उम्मीदवार पवन सिंह और एनडीए उम्मीदवार पर अपनी जीत दर्ज की है.
साफ़ है कि साल 2020 के विधानसभा चुनाव में 12 सीटें और इस लोकसभा में दो सीटें जीतकर पार्टी उत्साह में है.
राज्य सचिव कुणाल संकेत देते हैं, “इस बार के विधानसभा चुनाव में 19 से ज़्यादा सीटों पर हमारा दावा होगा. हमारा स्ट्राइक रेट ज़्यादा है. इसलिए हमें ज़्यादा सीट मिलनी चाहिए.”
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